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आप को देख कर देखता रह गया - वसीम बरेलवी
आप को देख कर देखता रह गया - वसीम बरेलवी

यहाँ ग़ज़ल अज़ीज़ क़ैसी साहब की आपको देखकर देखता रह गया  ग़ज़ल की ज़मीन पर ही लिखी गई है आप को देख कर देखता रह गया क्या कहुँ और कहने को क...

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हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का - नज़ीर अकबराबादी
हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का - नज़ीर अकबराबादी

हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का किसी के दिल को मज़ा ख़ु...

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दिवाली के दीप जले हैं  - हैदर बयाबानी
दिवाली के दीप जले हैं - हैदर बयाबानी

सभी पाठको को दीपो के पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए  दिवाली के दीप जले हैं यार से मिलने यार चले हैं चारों जानिब धूम-धड़ाक...

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काली शलवार - सआदत हसन मन्टो
काली शलवार - सआदत हसन मन्टो

दिल्ली आने से पहले वो अंबाला छावनी में थी जहां कई गोरे उसके गाहक थे। उन गोरों से मिलने-जुलने के बाइस वो अंग्रेज़ी के दस पंद्रह जुमले सीख गई ...

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अपनी लाश का बोझ उठाऊँ, नामुमकिन - अमन चांदपुरी
अपनी लाश का बोझ उठाऊँ, नामुमकिन - अमन चांदपुरी

अपनी लाश का बोझ उठाऊँ, नामुमकिन ! मौत से पहले ही मर जाऊँ, नामुमकिन ! दुनिया ने इतने खानों में बाँट दिया फिर ख़ुद को यकजा कर पाऊँ, ना...

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 नाम से गाँधी के चिढ़ बैर आज़ादी से है - ज़फ़र कमाली
नाम से गाँधी के चिढ़ बैर आज़ादी से है - ज़फ़र कमाली

नाम से गाँधी के चिढ़ बैर आज़ादी से है नफ़रतों की खाद हैं उल्फ़त मगर खादी से है आलिमों का इल्म से वो रब्त है इस दौर में रब्त धोबी के ...

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