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कफ़न - मुंशी प्रेमचंद

कफ़न - मुंशी प्रेमचंद 1 झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा…

निर्मला (उपन्यास) (भाग 23) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 23 अनुक्रम पिछला भाग दिन गुज़रने लगे। एक महीना पूरा निकल गया; लेकिन मुन्शी जी न लौटे। कोई ख़त भी नहीं भेजा। निर्मला को अब नित्य यही चिन्ता बनी रहती कि वह लौट कर न आए तो क्या होगा? उसे इसकी चिन्ता न होती थी क…

निर्मला (उपन्यास) (भाग 22) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 22 अनुक्रम पिछला भाग निर्मला सारी रात रोती रही। इतना बड़ा कलंक! उसने जियाराम को गहने ले जाते देखने पर भी मुँह खोलने का साहस नही किया। क्यों? इसीलिए तो कि लोग समझेंगे कि वह मिथ्या दोषारोपण करके लड़के से बैर स…

निर्मला (उपन्यास) (भाग 21) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 21 अनुक्रम पिछला भाग मुन्शी जी पाँच बजे कचहरी से लौटे; और अन्दर आकर चारपाई पर गिर पड़े। बुढ़ापे की देह उस पर आज सारे दिन भोजन न मिला। मुँह सूख गया था। निर्मला समझ गई, आज दिन खाली गया। निर्मला ने पूछा—आज कु…

निर्मला (उपन्यास) (भाग 20) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 20 अनुक्रम पिछला भाग निर्मला न बिगड़ कर पूछा-इतनी देर कहाँ लगाई? सियाराम ने ढिठाई से कहा-रास्ते में एक जगह सो गया था। निर्मला-यह तो मैं नहीं कहती;पर जानते हो कै बज गए हैं? दस कभी के बज गए। बाजार कुछ दूर …

निर्मला (उपन्यास) (भाग 19) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 19 अनुक्रम पिछला भाग इक्कीसवाँ परिच्छेद रूक्मिणी ने निर्मला से त्योरियाँ बदल कर कहा-क्या नङ्गे पाँव ही मदरसे जायगा? निर्मला ने बच्ची के बाल गूँथते हुए कहा-मैं क्या करूँ,मेरे पास रुपए नहीं हैं। रुक्मिणी…

निर्मला (उपन्यास) (भाग 18) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 18 अनुक्रम पिछला भाग चिन्ता में नींद कब आती है! निर्मला चारपाई पर पड़ी करवटें बदल रही थी। कितना चाहती थी कि नींद आ जाय; पर नींद ने आने की कसम सी खाली थी। चिराग बुझा दिया था, खिड़की के दरवाजे खोल दिये थे, टिक…

निर्मला (उपन्यास) (भाग 17) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 17 अनुक्रम पिछला भाग अब की सुधा के साथ निर्मला को भी आना पड़ा। वह तो मैके में कुछ दिन और रहना चाहती थी, लेकिन शोकातुरा सुधा अकेले कैसे रहती। उसकी खातिर आना ही पड़ा। रुक्मिणी ने भुङ्गी से कहा-देखती है, बहू …

निर्मला (उपन्यास) (भाग 16) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद भाग 16 अनुक्रम पिछला भाग जब हमारे ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आ पड़ती है, तो उससे हमें केवल दुख ही नहीं होता—हमें दूसरों के ताने भी सहने पड़ते हैं। जनता को हमारे ऊपर टिप्पणियाँ करने का वह सुअवसर मिल जाता है, जिसके लिए…

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