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कफ़न - मुंशी प्रेमचंद

कफ़न - मुंशी प्रेमचंद 1 झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा…

ननिहाल बब्बू का - डाक्टर संदीप नारद

ननिहाल बब्बू का तीन भाईयो और चार बहनों में सबसे छोटी थी बब्बू की अम्मा, इतनी छोटी कि जब उसका जन्म हुआ तब तक उसकी बड़ी बहन के दो बच्चे हो चुके थे। मां बाप ने नाम भी रखा छोटी बाई। पता नही , मां बाप की लाडली थी या नहीं लेकिन भाईयों से कभी प्यार न पा स…

रज्जन चाचा - संदीप नारद ( कहानी )

रज्जन चाचा आज डब्बू के आपरेशन को एक साल होने को है। डाक्टर की सलाह के कारण शुरूआत से आराम कर रहा डब्बू अब पूरी तरह से थक चुका था। सोचते सोचते उसकी नींद लग गई। उसकी पत्नी ने भी कमरे की सारी लाइट बंद कर दी और फिर धीरे से चद्दर उड़ा दिया। गहरी नींद म…

गोपाल की बुद्धि (कहानी) - विष्णु प्रभाकर

गोपाल की बुद्धि (कहानी) - विष्णु प्रभाकर Gopal Ki Buddhi - Vishnu Prabhakar एक था लड़का। उसका नाम था गोपाल। वह बहुत ही चतुर और समझदार था। एक बार उसकी प्यारी माँ बीमार पड़ी, बहुत बीमार। बहुत दिन हो गए, पर वह अच्छी नहीं हुई। बड़े-बड़े वैद्यों ने …

जामुन का पेड़ - कृष्ण चंदर

जामुन का पेड़ रात को बड़े जोर का अंधड़ चला। सेक्रेटेरिएट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर पडा। सुबह जब माली ने देखा तो उसे मालूम हुआ कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है। माली दौड़ा दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी दौड़ा दौड़ा क्‍लर्क के पास गया, क्‍ल…

गुप्तकथा - गोपालराम गहमरी

गुप्तकथा - गोपाल राम गहमरी पहली झाँकी जासूसी जान पहचान भी एक निराले ही ढंग की होती है। हैदर चिराग अली नाम के एक धनी मुसलमान सौदागर का बेटा था। उससे जासूस की गहरी मिताई थी। उमर में जासूस से हैदर चार पाँच बरस कम ही होगा, लेकिन शरीर से दोनों एक ही …

एक प्लेट सैलाब - मन्नू भंडारी

एक प्लेट सैलाब - मन्नू भंडारी मई की साँझ! साढ़े छह बजे हैं। कुछ देर पहले जो धूप चारों ओर फैली पड़ी थी, अब फीकी पड़कर इमारतों की छतों पर सिमट आई है, मानो निरंतर समाप्त होते अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए उसने कसकर कगारों को पकड़ लिया हो। आग…

बंजारा - जयशंकर प्रसाद

बंजारा - जयशंकर प्रसाद धीरे-धीरे रात खिसक चली, प्रभात के फूलों के तारे चू पडऩा चाहते थे। विन्ध्य की शैलमाला में गिरि-पथ पर एक झुण्ड बैलों का बोझ लादे आता था। साथ के बनजारे उनके गले की घण्टियों के मधुर स्वर में अपने ग्रामगीतों का आलाप मिला रहे थे। …

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