निर्मला (उपन्यास) (भाग 18) - मुंशी प्रेमचंद

निर्मला (उपन्यास) (भाग 18) - मुंशी प्रेमचंद

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निर्मला (उपन्यास) (भाग 18) - मुंशी प्रेमचंद चिन्ता में नींद कब आती है! निर्मला चारपाई पर पड़ी करवटें बदल रही थी। कितना चाहती थी कि नींद आ जाय; पर नींद

निर्मला (उपन्यास) - मुंशी प्रेमचंद

भाग 18

अनुक्रम
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चिन्ता में नींद कब आती है! निर्मला चारपाई पर पड़ी करवटें बदल रही थी। कितना चाहती थी कि नींद आ जाय; पर नींद ने आने की कसम सी खाली थी। चिराग बुझा दिया था, खिड़की के दरवाजे खोल दिये थे, टिक-टिक करने वाली घड़ी भी दूसरे कमरे में रख आई थी; पर नींद का नाम न था। जितनी बातें सोचनी थीं, सब सोच चुकी-चिन्ताओं का भी अन्त हो गया; पर पलकें न झपकी, तब उसने फिर लैम्प जलाया; और एक पुस्तक पढ़ने लगी। दो ही चार पृष्ठ पढ़े होंगे कि झपकी आ गई। किताब खुली रह गई।

सहसा जियाराम ने कमरे में कदम रक्खा। उसके पाँव थर-थर काँप रहे थे। उसने कमरे में ऊपर-नीचे देखा। निर्मला सोई हुई थी,उसके सिरहाने ताक पर एक छोटा-सा पीतल का सन्दूकचा रक्खा हुआ था। जियाराम दबे पाँव गया, धीरे से सन्दूकचा उतारा और बड़ी तेजी से कमरे के बाहर निकला! उसी वक्त निर्मला की आँखें खुल गई। चौंक कर उठ खड़ी हुई। द्वार पर आकर देखा। कलेजा धक से हो गया! क्या यह जियाराम है? मेरे कमरे में क्या करने आया था? कहीं मुझे धोखा तो नहीं हुआ? शायद दीदी जी के कमरे से आया हो। यहाँ उसका काम ही क्या था? शायद मुझसे कुछ कहने आया हो; और सोता देख कर चला गया हो; लेकिन इस वक्त क्या कहने आया होगा? इसकी नीयत क्या है? उसका दिल काँप उठा!

मुन्शी जी ऊपर छत पर सो रहे थे। मुंडेर न होने के। कारण निर्मला ऊपर न सो सकती थी। उसने सोचा, चल कर उन्हें जगाऊँ; पर जाने की हिम्मत न पड़ी। शक्की आदमी हैं, न जाने क्या समझ बैठें; और क्या करने पर तैयार हो जायँ! आकर फिर वही पुस्तक पढ़ने लगी। सबेरे पूछने पर आप ही मालूम हो जायगा। कौन जाने मुझे धोखा ही हुआ हो। नींद में कभी धोखा हो जाता है; लेकिन सबेरे पूछने का निश्चय करने पर भी उसे फिर नींद नहीं आई।

सबेरे वह जल-पान लेकर स्वयं जियाराम के पास गई, तो वह उसे देख कर चौंक पड़ा। रोज़ तो भुङ्गी आती थी, आज यह क्यों आ रही हैं? निर्मला की ओर ताकने की उसकी हिम्मत न पड़ी।

निर्मला ने उसकी ओर विश्वासपूर्ण नेत्रों से देख कर पूछारात को तुम मेरे कमरे में गए थे?

जियाराम ने विस्मय दिखा कर कहा-मैं! भला मैं रात को क्या करने जाता? क्या कोई गया था? निर्मला ने इस भाव से कहा, मानो उसे उसकी बात का पूरा विश्वास हो गया-हाँ, मुझे ऐसा मालूम हुआ कि कोई मेरे कमरे से निकला। मैं ने उसका मुँह तो न देखा; पर उसकी पीठ देख कर अनुमान किया कि शायद तुम किसी काम से आए हो। इसका पता कैसे चले कौन था? कोई था ज़रूर,इसमें कोई सन्देह नहीं।

जियाराम अपने को निरपराध सिद्ध करने की चेष्टा कर कहने लगा-मैं तो रात को थियेटर देखने चला गया था। वहाँ से लौटा तो एक मित्र के घर लेट रहा। थोड़ी देर हुई लौटा हूँ। मेरे साथ और भी कई मित्र थे। जिससे जी चाहे पूछ लें। हॉ भाई, मै बहुत डरता हूँ। ऐसा न हो कोई चीज़ ग़ायब हो गई हो,तो मेरा नाम लगे। चोर को तो कोई पकड़ नहीं सकता। मेरे मत्थे जायगी। बाबू जी को आप जानती हैं,मुझे मारने दौड़ेंगे।

निर्मला-तुम्हारा नाम क्यों लगेगा? अगर तुम्हीं होते तो भी तुम्हें कोई चोरी नहीं लगा सकता। चोरी दूसरे की चीज़ की जाती है,अपनी चीज़ की चोरी कोई नहीं करता।

अभी तक निर्मला की निगाह अपने सन्दूकचे पर न पड़ी थी। भोजन बनाने लगी। जब वकील साहब कचहरी चले गए,तो वह सुधा से मिलने चली। इधर कई दिनों से मुलाक़ात न हुई थी। फिर रात वाली घटना पर विचार-परिवर्तन भी करना था। भुङ्गी से कहा-कमरे में से गहनों का बक्स उठा ला।

भुङ्गी ने लौट कर कहा-वहाँ तो कहीं सन्दूक्त नहीं है। कहाँ रक्खा था? निर्मला ने चिढ़ कर कहा-एक बार में तो तेरा काम ही कभी नहीं होता। वहाँ छोड़ कर और जायगा कहाँ? आलमारी में देखा था?

भुङ्गी-नहीं बहू जी,आलमारी में तो नहीं देखा,झूठ क्यों बोलूँँ। '

निर्मला मुस्करा पड़ी। बोली-जा देख, जल्दी आ। एक क्षण में भुङ्गी फिर खाली हाथ लौट आई-आलमारी में भी तो नहीं है। अब जहाँ बताओ,वहाँ देखूँ।

निर्मला झुँझला कर यह कहती हुई उठ खड़ी हुई-तुझे ईश्वर ने आँखें ही न जाने किसलिए दी। देख उसी कमरे में से लाती हूँ कि नहीं।

भुङ्गी भी पीछे-पीछे कमरे में गई। निर्मला ने ताक पर निगाह डाली,आलमारी खोल कर देखी,चारपाई के नीचे झाँक कर देखा, फिर कपड़ों का बड़ा सन्दूक खोल कर देखा। बक्स का कहीं पता नहीं। आश्चर्य हुआ-आखिर बक्स गया कहाँ?

सहसा रात वाली घटना बिजली की भाँति उसकी आँखों के सामने चमक गई। कलेजा उछल पड़ा। अब तक निश्चित होकर खोज रही थी। अब ताप सी चढ़ आई। बड़ी उतावली से चारों ओर खोजने लगी। कहीं पता नहीं। जहाँ खोजना चाहिए था,वहाँ भी खोजा; और जहाँ नहीं खोजना चाहिए था,वहाँ भी खोजा। इतना बड़ा सन्दूकचा बिछावन के नीचे कैसे छिप जाता; पर बिछावन भी झाड़ कर देखा। क्षण-क्षण मुख की कान्ति मलिन होती जाती थी। प्राण नहों में समाते जाते थे। अन्त को निराश होकर उसने छाती पर एक घुसा मारा;और रोने लगी।

गहने ही स्त्री की सम्पत्ति होते हैं। पति की और किसी सम्पत्ति पर उसका अधिकार नहीं होता। इन्हीं का उसे बल और गर्व होता है। निर्मला के पास पाँच-छः हजार के गहने थे। जब उन्हें पहन कर वह निकलती थी, तो उतनी देर के लिए उल्लास से उसका हृदय खिला रहता था। एक-एक गहना मानो विपत्ति और बाधा से बचाने के लिए एक-एक रक्षाख था। अभी रात ही उसने सोचा था । जियाराम की लौंडी बन कर वह न रहेगी। ईश्वर न करें-वह किसी के सामने हाथ फैलाए। इस खेबे से वह अपनी नाव को भी पार लगा देगी; और अपनी बच्ची को भी किसी न किसी घाट पहुँचा देगी। उसे किस बात की चिन्ता है। इन्हें तो कोई उससे न छीन लेगा। आज ये मेरे सिङ्गार हैं, कल को मेरे आधार हो जायेंगे। इस विचार से उसके हृदय को कितनी सान्त्वना मिली थी? वही सम्मत्ति आज उसके हाथ से निकल गई! अब वह निराधार थी। संसार में उसे कोई अवलम्ब, कोई सहारा न था। उसकी आशाओं का आधार जड़ से कट गया, वह फूट-फूट कर रोने लगी। ईश्वर! तुमसे इतना भी न देखा गया! मुझ दुखिया को तुमने यों ही अपङ्ग वना दिया था, अब आँखें भी फोड़ दी! अब वह किसके सामने हाथ फैलाएगी, किसके द्वार पर भीख मांगेगी। पसीने से उसकी देह भीग गई, रोते-रोते आँखें सूज गई। निर्मला सिर नीचा किए रो रही थी, रुक्मिणी उसे धीरज दिला रही थी, लेकिन उसके आँसू न थमते थे! शोक की ज्वाला कम न होती थी।

तीन बजे जियाराम स्कूल से लौटा। निर्मला उसके आने की खबर पाकर विक्षिप्त की भाँति उठी; और उसके कमरे के द्वार पर बोली-भैया, दिल्लगी की हो तो दे दो। दुखिया को सता कर क्या पाओगे?

जियारास एक क्षण के लिए कातर हो उठा। चौर-कला में उसका यह पहला ही प्रयास था। वह कठोरता जिसे हिंसा में मनोरंजन होता है, अभी तक उसे प्राप्त न हुई थी। यदि उसके पास सन्दूकचा होता; और उसे फिर इतना मौका मिलता कि उसे उसी ताक पर रख आवे, तो कदाचित् वह उस मौके को न छोड़ता; लेकिन सन्दूकचा उसके हाथ से निकल चुका था। यारों ने उसे सराफे में पहुंचा दिया था; और औने-पौने बेच भी डाला था। चोरी की झूठ के सिवा और कौन रक्षा कर सकता है।बोला-भला, अम्माँ जी, मैं आपसे ऐसी दिल्लगी करूँगा। आप अभी तक मुझ पर शक करती जा रही हैं। मैं कह चुका कि मैं रात को घर पर न था; लेकिन आपको यकीन ही नहीं आता! बड़े दुख की बात है कि आप मुझे इतना नीच समझती हैं।

निर्मला ने आँसू पोंछते हुए कहा-मैं तुम्हारे ऊपर शक नहीं करती; भैया! तुम्हें चोरी नहीं लगाती । मैंने समझा शायद दिल्लगी की हो!

जियाराम' पर वह चोरी का सन्देह कैसे कर सकती-थी? दुनिया यही तो कहेगी कि लड़के की माँ मर गई है, तो उस पर चोरी का इल्जाम लगाया जा रहा है। मेरे मुँह में तो कालिख लगेगी।

जियाराम ने आश्वासन देते हुए कहा-चलिए मैं तो देखू, आखिर ले कौन गया? चोर आया किस रास्ते से?

भुङ्गी-भैया, तुम भी चोरों के आने को कहते हो। चूहे के विल से तो निकल ही आते हैं, यहाँ तो चारों ओर खिड़कियाँ ही हैं।

जियाराम-खूब अच्छी तरह तलाश कर लिया है?

निर्मला-सारा घर तो छान मारा; अब कहाँ खोजने कहते हो।

जियाराम-आप लोग सो भी तो जाती हैं मुर्दो से बाजी लगा कर।

चार बजे मुन्शी जी घर में आए तो निर्मला की दशा देख कर पूछा-कैसी तबीयत है? कहीं दर्द तो नहीं है? यह कह कर उन्होंने आशा को गोद में उठा लिया।

निर्मला कोई जवाव तो न दे सकी, फिर रोने लगी!

भुङ्गी ने कहा-ऐसा कभी नहीं हुआ था। मेरी सारी उमर इसी घर में कट गई। आज तक एक पैसे की चोरी नहीं हुई। दुनिया यही कहेगी कि भुङ्गी का काम है,अब तो भगवान ही पत-पानी रक्खें।

मुन्शी जी अचकन के बटन खोल रहे थे। फिर बटन बन्द करते हुए बोले क्या हुआ? क्या कोई चीज चोरी हो गई? भुङ्गी-बहू जी के सारे गहने उठ गए।

मुन्शी जी-रक्खे कहाँ थे?

निर्मला ने सिसकियाँ लेते हुए रात की सारी घटना बयान कर दी; पर जियाराम की सूरत के आदमी को अपने कमरे से निकलने की बात न कही। मुन्शी जी ने ठण्ढी साँस भर कर कहा-ईश्वर भी बड़ा अन्यायी है; जो मरे हैं, उन्हीं को मारता है। मालूम होता है, अदिन आ गए हैं। मगर चोर आया तो आया किधर से? कहीं सेंध नहीं पड़ी, और किसी तरफ से आने का रास्ता नहीं। मैंने तो कोई ऐसा पाप भी न किया था, जिसकी मुझे यह सजा मिल रही हो। बार-बार कहता रहा-गहने का सन्दूकचा ताक पर मत रक्खो; लेकिन कौन सुनता है।

निर्मला-मैं क्या जानती थी कि यह ग़ज़ब टूट पड़ेगा।

मुन्शीजी-इतना तो जानती थीं कि सब दिन बराबर नहीं जाते। आज बनवाने जाऊँ, तो दस हजार से कम न लगेंगे; और आजकल अपनी जो दशा है, वह तुमसे छिपी नहीं, खर्च भर को मुश्किल से मिलता है, गहने कहाँ से बनेंगे। जाता हूँ पुलिस में इत्तिला कर आता हूँ; पर मिलने की कोई उम्मीद न समझो।

निर्मला ने आपत्ति के भाव से कहा-जब जानते हैं कि पुलिस में इत्तिला करने से कुछ न होगा, तो क्यों जा रहे हैं?

मुन्शी जी-दिल नहीं मानता;और क्या? इतना बड़ा नुकसान उठा कर चुपचाप तो नहीं बैठा जाता। निर्मला-मिलने वाले होते तो जाते ही क्यों? तक़दीर में न थे, तो कैसे रहते?

मुन्शी जी-तक़दीर में होंगे,तो मिल जाँयगे,नहीं तो गए तो हैं ही।

मुन्शी जी कमरे से निकले। निर्मला ने उनका हाथ पकड़ कर कहा-मैं कहती हूँ मत जाओ;कहीं ऐसा न हो लेने के देने पड़ जायँ।

मुन्शी जी ने हाथ छुड़ा कर कहा-तुम भी कैसी बच्चों की सी ज़िद कर रही हो। दस हजार का नुकसान ऐसा नहीं है,जिसे मैं यों ही उठा लूँँ। मैं रो नहीं रहा हूँ; पर मेरे हृदय पर जो कुछ बीत रही है, वह मैं ही जानता हूँ। यह चोट मेरे कलेजे पर लगी है! मुन्शी जी और कुछ न कह सके। गला फँस गया। वह तेजी से कमरे से निकल आए; और थाने पर जा पहुँचे। थानेदार उनका बहुत लिहाज़ करता था। उसे एक बार रिशवत के मुकद्दमे से बरी करा चुके थे। उनके साथ ही तफतीश करने आ पहुँचा। नाम था अलायार खाँ।

शाम हो गई थी। थानेदार ने मकान के अगवाड़े-पिछवाड़े घूम-घूम कर देखा। अन्दर जाकर निर्मला के कमरे को गौर से देखा। ऊपर की मुडेर की जाँच की। मुहल्ले के दो-चार आदमियों से चुपके-चुपके कुछ बातें कीं;और तब मुन्शी जी से बोला-जनाब, खुदा की कसम यह किसी बाहर के आदमी का काम नहीं। खुदा की कसम अगर कोई बाहर का आदमी निकले,तो आज से थानेदारी करना छोड़ दूँ। आप के घर में कोई मुलाजिम तो ऐसा नहीं है,जिस पर आप को शुबहा हो?

मुन्शी जी-घर में तो आजकल सिर्फ एक महरी है।

थानेदार-अजी वह पगली है। यह किसी बड़े शातिर का काम है, खुदा की क़सम।

मुन्शी जी-तो घर में और कौन है? मेरे दोनों लड़के हैं स्त्री है; और बहन है। इनमें से किस पर शक करूँ।

थानेदार-खुदा की क़सम घर ही के किसी आदमी का काम है, चाहे वह कोई हो। इन्शाअल्लाह दो-चार दिन में मैं आप को इसकी खबर दूंगा। यह तो नहीं कह सकता कि माल भी सब मिल जायगा; पर खुदा की क़सम चोर को जरूर पकड़ दिखाऊँगा।

थानेदार चला गया,तो मुन्शी जी ने आकर निर्मला से उसकी बातें कहीं। निर्मला सहम उठी। बोली-आप थानेदार से कह दीजिए तफतीश न करे,आपके पैरों पड़ती हूँ।

मुन्शी जी-आखिर क्यों?

निर्मला-अब क्यों बताऊँ? वह कह रहा है कि घर ही के किसी आदमी का काम है।

मुन्शी जी-उसे बतने दो।

जियाराम अपने कमरे में बैठा हुआ भगवान् को याद कर रहा था। उसके मुँह पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। सुन चुका था कि पुलिस वाले चेहरे से भाँप जाते हैं। बाहर निकलने की हिम्मत न पड़ती थी। दोनों आदमियों में क्या बातें हो रही हैं, यह जानने के लिए वह छटपटा रहा था।ज्योही थानेदार चला गया; और भुङ्गी किसी काम से बाहर निकली,जियाराम ने पूछा-थानेदार क्या कह रहा था; भुङ्गी?

भुङ्गी ने पास आकर कहा-डाढ़ीजार कहता था, घर ही के किसी आदमी का काम है;वाहर का कोई नहीं है।

जियाराम-दादा जी ने कुछ नहीं कहा?

भुङ्गी-कुछ तो नहीं कहा,खड़े हूँ-हूँ' करते रहे। घर में एक भुङ्गी ही गैर है न; और तो सब अपने ही है।

जियाराम-मैं भी तो गैर हूँ,तू ही क्यों!

भुङ्गी-तुम गैर काहे को हो भैया?

जियाराम-बाबू जी ने थानेदार से कहा नहीं, घर में किसी पर उनका शुबहा नहीं है?

भुङ्गी--कुछ तो कहते नहीं सुना। बेचारे थानेदार ने भले ही कहा-भुङ्गी तो पागल है, वह क्या चोरी करेगी। बाबू जी तो मुझे फंसाए ही देते थे।

जियाराम-तब तो तू भी निकल गई। अकेला मैं ही रह गया। तू ही बता,तूने मुझे उस दिन घर में देखा था?

भुङ्गी-नहीं भैया,तुम तो ठेठर देखने गए थे।

जियाराम-गवाही देगी न? भुङ्गी-यह क्या कहते हो भैया। बहू जी तपतीस बन्द करा देंगी। जियाराम-सच?

भुङ्गी-हाँ भैया,बार-बार कहती हैं कि तपतीस न कराओ। गहने गए जाने दो पर बाबू जी मानते ही नहीं।

पाँच-छः दिन तक जियाराम ने पेट भर भोजन नहीं किया। कभी दो-चार कौर खा लेता,कभी कह देता भूख नहीं है। उसके चेहरे का रङ्ग उड़ा रहता था। रातें जागते कटती। प्रति क्षण थानेदार की शङ्का बनी रहती थी। यदि वह जानता कि मामला इतना तूल खींचेगा,तो कभी ऐसा काम न करता। उसने तो समझा था-किसी चोर पर शुबहा होगा। मेरी तरफ किसी का ध्यान भी न जायगा; पर अब भण्डा फूटता हुआ मालूम होता था। अभागा थानेदार जिस ढङ्ग से छानबीन कर रहा था,उससे जियाराम को बड़ी शङ्का हो रही थी।

सातवें दिन सन्ध्या समय जियाराम घर लौटा, तो बहुत चिन्तित था। आज तक उसे बचने की कुछ न कुछ आशा थी। माल अभी तक कहीं बरामद न हुआ था; पर आज उसे माल के बरामद होने की खबर मिल गई थी। इसी दम थानेदार कॉन्सटेबिलों को लिए हुए आता होगा। बचने का कोई उपाय नहीं। थानेदार रिशवत देने से सम्भव है,मुकदमे को दबा दे। रुपए हाथ में थे; पर क्या बात छिपी रहेगी। अभी माल बरामद नहीं हुआ, फिर भी सारे शहर में अफवाह थी कि बेटे ने ही माल उड़ाया है। माल मिल जाने पर तो गली-गली बात फैल जायगी। फिर वह किसी को मुँह न दिखा सकेगा! मुन्शी जी कचहरी से लौटे,तो बहुत घबराए हुए थे। सिर थाम कर चारपाई पर बैठ गए।

निर्मला ने कहा-कपड़े क्यों नहीं उतारते? आज तो और दिनों से देर हो गई है।

मुन्शी जी क्या कपड़े उतारूँ? तुमने कुछ सुना?

निर्मला-क्या बात है? मैं ने तो कुछ नहीं सुनी।

मुन्शी जी-माल बरामद हो गया। अब जिया का बचना मुश्किल है।

निर्मला को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके चेहरे से ऐसा जान पड़ा मानो उसे यह बात मालूम थी। बोली-मैं तो पहले ही कह रही थी कि थाने में इत्तला मत कीजिए।

मुन्शी जी-तुम्हें जिया पर शक था?

निर्मला-शक क्यों नहीं था,मैंने उन्हें अपने कमरे से निकलते देखा था।

मुन्शी जी-फिर तुमने मुझसे क्यों न कह दिया?

निर्मला यह बात मेरे कहने की न थी। आपके दिल में जरूर ख्याल आता कि यह ईर्ष्या वश आक्षेप लगा रही है। कहिए, यह ख्याल होता या नहीं। झूठ न बोलिएगा।

मुन्शी जी-सम्भव है, मैं इन्कार नहीं कर सकता। उस दशा में भी तुम्हें मुझसे कह देना चाहिए था। रिपोर्ट की नौवत न आती। तुमने अपनी नेकनामी की तो फिक्र की, यह न सोचा कि परिणाम क्या होगा। मैं अभी थाने से चला आता हूँ। अलायार खाँ आता ही होगा।

निर्मला ने हताश होकर पूछा-फिर अब?

मुन्शी जी ने आकाश की ओर ताकते हुए कहा-फिर जैसी भगवान की इच्छा। हजार-दो हजार रुपए रिशवत देने के लिए होते,तो शायद मामला दब जाता; पर मेरी हालत तो तुम जानती हो। तक़दीर खोटी है; और कुछ नहीं! पाप तो मैंने किए हैं, दण्ड कौन भोगेगा? एक लड़का था उसकी वह दशा हुई, दूसरे की यह दशा हो रही है। नालायक था, गुस्ताख था, कामचोर था; पर था तो अपना ही लड़का, कभी न कभी चेत ही जाता। यह चोट अब न सही जायगी।

निर्मला-अगर कुछ दे-दिला कर जान बच सके, तो मैं रुपए का प्रबन्ध कर दूँ?

मुन्शी जी कर सकती हो? कितने रुपये दे सकती हो ? -

निर्मला-कितना दरकार होगा?

मुन्शी जी-एक हजार से कम में तो शायद बातचीत न हो सके। मैंने एक मुकदमे में उससे १०००) लिए थे। वह कसर आज निकालेगा।

निर्मला-हो जायगा। आप अभी थाने जाइए।

मुन्शी जी को थाने में बड़ी देर लगी। एकान्त में बातचीत करने का बहुत देर में मौका मिला।अलायार खाँ पुराना घाघ था बड़ी मुश्किल से अण्टी पर चढ़ा। पाँच सौ रुपए लेकर भी एहसान का बोझ सिर पर लाद ही दिया। काम हो गया। लौट कर निर्मला से बोले- लो भई, बाजी मार ली। रुपए तुमने दिए; पर काम मेरी जवान ही ने किया। बड़ी-बड़ी मुश्किलो से राजी हो गया। यह भी याद रहेगी। जियाराम भोजन कर चुका है?

निर्मला-कहाँ, वह तो अभी घूम कर लौटे ही नहीं।

मुन्शी जी-बारह तो बज रहे होंगे।

निर्मला-कई दफे जा-जाकर देख आई। कमरे में अँधेरा पड़ा हुआ है।

मुन्शी जी-और सियाराम?

निर्मला-वह तो खा-पीकर सोए हैं।

मुन्शी जी-उससे पूछा नहीं जिया कहाँ गया है।

निर्मला-वह तो कहते हैं, मुझसे कुछ कह कर नहीं गए।

मुन्शी जी को कुछ शङ्का हुई। सियाराम को जगा कर पूछा'तुमसे जियाराम ने कुछ कहा नहीं,कब तक लौटेगा!गया कहाँ है?

सियाराम ने सिर खुजलाते और आँखें मलते हुए कहा मुझसे कुछ नहीं कहा।

मुन्शी जी-कपड़े सब पहन कर गया है?

सिया०-जी नहीं, कुर्ता और धोती।

मुन्शी जी-जाते वक्त खुश था?

सिया०-खुश तो नहीं मालूम होते थे। कई बार अन्दर आने का इरादा किया; पर देहरी ही से लौट गए। कई मिनिट तक सायबान में खड़े रहे। चलने लगे तो आँखें पोंछ रहे थे। इधर कई दिन से अकसर रोया करते थे।

मुन्शी जी ने ऐसी ठण्ढी साँस ली,मानो जीवन में अब कुछ नहीं रहा,और निर्मला से बोले-तुमने किया तो अपने समझ में भले ही के लिए; पर कोई शत्रु भी मुझ पर इससे कठोर आघात न कर सकता था। जियाराम सच कहता था कि विवाह करना ही मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी!

और किसी समय ऐसे कठोर शब्द सुन कर निर्मला तिलमिला जाती; पर इस समय वह स्वयं अपनी भूल पर पछता रही थी। अगर जियाराम की माता होती, तो क्या वह यह सङ्कोच करती? कदापि नहीं; बोली-जरा डॉक्टर साहब के यहाँ क्यों नहीं चले जाते?शायद वहाँ बैठे हों। कई लड़के रोज आते हैं,उनसे पूछिए, शायद कुछ पता लग जाय। फूंक-फूक कर चलने पर भी अपयश लग ही गया?

मुन्शी जी ने मानो खुली हुई खिड़की से कहा-हाँ,जाता हूँ; और क्या करूँगा?

मुन्शी जी बाहर आए तो देखा डॉक्टर सिन्हा खड़े हैं। चौंक कर पूछा-क्या आप देर से खड़े हैं?

डॉक्टर-जी नहीं, अभी आया हूँ। आप इस वक्त कहाँ जा रहे हैं? साढ़े बारह हो गए हैं।

मुन्शी जी-आप ही की तरफ आ रहा था। जियाराम अभी तक घूम कर नहीं आया। आपकी तरफ़ तो नहीं गया था? डॉक्टर सिन्हा ने मुन्शी जी के दोनों हाथ पकड़ लिए;और इतना कह पाए थे "भाई साहब,अव धैर्य से काम......" कि मुन्शी जी गोली खाए हुए मनुष्य की भाँति जमीन पर गिर पड़े!!

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जखीरा, साहित्य संग्रह: निर्मला (उपन्यास) (भाग 18) - मुंशी प्रेमचंद
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