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बहरूपनी - कैफ़ी आज़मी

बहरूपनी एक गर्दन पे सैकड़ों चेहरे और हर चेहरे पर हजारों दाग़ और हर दाग़ बंद दरवाज़ा रौशनी इन से आ नहीं सकती रौशनी इन से जा नहीं सकती तंग सीना है हौज़ मस्जिद का दिल वो दूना पुजारियों के ब'अद चाटते रहते हैं जिसे कुत्ते कुत्ते दूना जो चाट…

कदम रात के डगमगाते नहीं - कैफ़ी आज़मी

कदम रात के डगमगाते नहीं कदम रात के डगमगाते नहीं कभी राह मंजिल की पाते नहीं हमारे कमल मुस्कुराते नहीं लहू से जो मशआल जलाते नहीं शरर हुर्रियत के भडकने लगे हजारों खज़फ़ भी चमकने लगे बयाबाँ में गुलशन लहकने लगे सितारे यहाँ जगमगाते नहीं गुला…

कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है - कैफी आज़मी

कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है जहाँ को अपनी तबाही का इंतज़ार सा है मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़जा कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ कि आज दामने-यज़्दाँ …

वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बाद - कैफी आज़मी

वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बाद वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बाद दाद-ए-सुख़न मिली मुझे तर्क-ए-सुख़न के बाद दीवानावार चाँद से आगे निकल गए ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बाद होंटों को सी के देखिए पछ्ताइएगा आप हंगामे जाग उठते हैं …

इक दिया नाम का आज़ादी के - कैफी आज़मी

इक दिया नाम का आज़ादी के एक दो भी नहीं छब्बीस दिए एक एक करके जलाये मैंने इक दिया नाम का आज़ादी के उसने जलते हुए होठो से कहाँ चाहे जिस मुल्क से गेहूं माँगो हाथ फ़ैलाने की आज़ादी है इस दिया नाम का खुशहाली के उस के जलते ही यह मालूम हुआ कितनी बद…

दूसरा बनवास - कैफ़ी आज़मी

दूसरा बनवास राम बनवास से जब लौट के घर में आये याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये रक्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा छह दिसंबर को श्री राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये? जगमगाते थे जहां राम के क़दमों के निशां प्यार की कहकश…

दायरा - कैफी आज़मी

दायरा रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं जिस्म से रूह …

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है - कैफी आज़मी

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँ है यही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँ है इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन उन के स…

औरत - कैफ़ी आज़मी

औरत - कैफ़ी आज़मी उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज जिस में जलता हूँ उसी आग में …

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं - कैफ़ी आज़मी

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है उस एक…

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