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अपने किरदार से ऊंचे नहीं बोला करते - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

अपने किरदार से ऊंचे नहीं बोला करते अपने किरदार से ऊंचे नहीं बोला करते पास दरिया हो तो क़तरे नहीं बोला करते सब ने ले ली है हुकूमत से यहाँ पर पदवी अब मेरी बात पे सारे नहीं बोला करते हम गवाहों को भला कैसे कहाँ से लाते  जब मेरे पाँव के छाले नहीं…

खुले में छोड़ रखा है मगर सलीक़े से - राज़िक़ अंसारी

ले में छोड़ रखा है मगर सलीक़े से खुले में छोड़ रखा है मगर सलीक़े से बंधे हुए है परिंदों के पर सलीक़े से हमीं पे फ़र्ज़ नहीं सिर्फ़ हक़ पड़ोसी का तुम्हे भी चाहिए रहना उधर सलीक़े से कभी से हालते बिमारे दिल संभल जाती इलाज करते अगर चारागर सलीक़े…

ख़्वाहिशें बे पनाह करने में - राज़िक़ अंसारी

ख़्वाहिशें बे पनाह करने में ख़्वाहिशें बे पनाह करने में हम हैं ख़ुद को तबाह करने में हमने कितने उसूल तोड़ दिए एक तुझ से निबाह करने में हम अदालत में केस हार गये दोस्तों को गवाह करने में कितनी लाशें बिछाई हैं तुमने ख़ुद को आलम पनाह करने में…

दम में नहीं है दम कोई फिर भी नहीं है कम - निज़ाम फतेहपुरी

दम में नहीं है दम कोई फिर भी नहीं है कम वज़्न- 221 2121 1221 212 अरकान - मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन दम में नहीं है दम कोई फिर भी नहीं है कम हर शख़्स कह रहा है कि आगे रहेंगे हम शेरो सुख़न की दुनिया में कुछ ऐसे खो गया सुख में रहा न खुश कभी …

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे - शाहिद ज़की

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे जड़ उखड़ने से झुकाओ है मिरी शाख़ों में दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए आप जिस तख़्त का हक़दार समझत…

ये हम को कौन सी दुनिया की धुन आवारा रखती है - अब्बास ताबिश

ये हम को कौन सी दुनिया की धुन आवारा रखती है ये हम को कौन सी दुनिया की धुन आवारा रखती है कि ख़ुद साबित-क़दम रह कर हमें सय्यारा रखती है अगर बुझने लगें हम तो हवा-ए-शाम-ए-तन्हाई किसी मेहराब में जा कर हमें दोबारा रखती है चलो हम धूप जैसे लोग ही उ…

दिल-ए-बीमार को सब देखने आए - राज़िक़ अंसारी

दिल-ए-बीमार को सब देखने आए दिल-ए-बीमार को सब देखने आए जिन्हें आना था वो कब देखने आए हिक़ारत से मुझे देखा था जिसने उसे कहना मुझे अब देखने आए उसे मैं भी समन्दर का लक़ब दूं मेरे सूखे हूए लब देखने आए मेरे टूटे हुए ख़्वाबों के टुकड़े कोई आँखों …

ख़्वाब, सच के रुबरु करते रहे - राज़िक़ अंसारी

ख़्वाब, सच के रुबरु करते रहे ख़्वाब, सच के रुबरु करते रहे ज़ख़्म आँखों के रफ़ू करते रहे काटना था रात का तन्हा सफ़र ख़ुद से हम ख़ुद गुफ़्तगू करते रहे खोल कर लब दोस्तों के सामने दर्द को बे आबरु करते रहे आपके बख़्शे हुए हर ज़ख़्म को आँसुओं स…

ये जान व दिल ये मंसब हारना है - राज़िक़ अंसारी

ये जान व दिल ये मंसब हारना है ये जान व दिल ये मंसब हारना है मोहब्बत में चलो अब हारना है अना, ख़ुद्दारयाँ, ईमान, इज़्ज़त सियासी खेल में सब हारना है नज़र आने लगे आँखों में आँसू यक़ीनन दर्द को अब हारना है लगा बैठे तेरे आने की शर्तें हमें फिर…

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं - जिगर मुरादाबादी

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं मुझ को जगा दिया …

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए - बशीर बद्र

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर मोहब्बत …

अँधेरा जब भी गहराता है - एस. डी. तिवारी

अँधेरा जब भी गहराता है अँधेरा जब भी गहराता है। प्यार और गहरा हो जाता है। रात भर करके इंतजार ही किसी को सवेरा मिल पाता है। प्यार की गहराई क्या जाने होते ही रात जो सो जाता है। चाँद की अहमियत तब होती रात के अँधेरे में चमक जाता है। हवा के प्यार…

न राम राम की न वालेकुम सलाम की - संजय ग्रोवर

न राम राम की न वालेकुम सलाम की न राम राम की न वालेकुम सलाम की बात मैंने की अगर तो बात काम की दुआ और प्रार्थना में जान है अगर कहां चली जाती है अमन के नाम की अपनी ही तो शायरी को पढ़ रहे हो तुम याद-सी क्यों आ रही है तुमको बाम की मैं सेकुलर को …

रो-धो के सब कुछ अच्छा हो जाता है - प्रखर मालवीय कान्हा

रो-धो के सब कुछ अच्छा हो जाता है रो-धो के सब कुछ अच्छा हो जाता है मन जैसे रूठा बच्चा हो जाता है कितना गहरा लगता है ग़म का साग़र अश्क बहा लूँ तो उथला हो जाता है लोगों को बस याद रहेगा ताज-महल छप्पर वाला घर क़िस्सा हो जाता है मिट जाती है मिट्…

वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा - प्रखर मालवीय कान्हा

वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा मर न जाऊँ मैं कहीं ऐसा लगा रेत माज़ी की मिरी आँखों में थी सब्ज़ जंगल भी मुझे सहरा लगा खो रहे हैं रंग तेरे होंट के हम-नशीं इन पे मिरा बोसा लगा लहर इक निकली मिरी पहचान की डूबते के हाथ …

तुम किसी तौर किसी शक्ल नहीं कर सकते - राज़िक़ अंसारी

तुम किसी तौर किसी शक्ल नहीं कर सकते तुम किसी तौर किसी शक्ल नहीं कर सकते इस ज़मीं से मुझे बे-दख़्ल नहीं कर सकते ठीक है आप मिरी जान तो ले सकते हैं मेरी आवाज़ मगर क़त्ल नहीं कर सकते तुझ को नुक़सान तो पहुुँचाना बहुत दूर की बात तेरी तस्वीर को बद-…

जिस तरह शाम है गुजरी मेरी - राघव अग्रवाल

जिस तरह शाम है गुजरी मेरी जिस तरह शाम है गुजरी मेरी कट जाये रात भी उस तरह तो अच्छा मुझे इश्क नहीं किसी से, ना कोई हसरत है गुरुर ये बना रहे दुःख की धुप में भी तो अच्छा वीरानियाँ रहती है बज्मों में आजकल वीरानियाँ ये न रहे दिल में तो अच्छा का…

कुछ दर्द दिल में तुझसे दिल लगाने के बाद - नीरज आहूजा

कुछ दर्द दिल में तुझसे दिल लगाने के बाद कुछ दर्द दिल में तुझसे दिल लगाने के बाद होता है जो किसी के चले जाने के बाद आज की तो हमको कुछ भी खबर नहीं अब तो आती है बस बीते ज़माने की याद जब भी आते है कुछ सितम कर जाते है घर तोड़ जाते है मेरा, घर बनाने…

मैं उसूलों में कोई ढील नहीं कर सकता - आतिश इंदौरी

मैं उसूलों में कोई ढील नहीं कर सकता मैं उसूलों में कोई ढील नहीं कर सकता दोस्ती इश्क़ में तब्दील नहीं कर सकता दोस्ती एक छलावा ही रहेगी जानाँ इश्क़ का रूप मैं तब्दील नहीं कर सकता बे-वफ़ाओं से मेरा पाला पड़ा है ता-उम्र इश्क़ को तेरे कभी फ़ील नह…

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