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यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे - शाहिद ज़की

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे जड़ उखड़ने से झुकाओ है मिरी शाख़ों में दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए आप जिस तख़्त का हक़दार समझत…

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