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यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे - शाहिद ज़की

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे जड़ उखड़ने से झुकाओ है मिरी शाख़ों में दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए आप जिस तख़्त का हक़दार समझत…

मैं उसूलों में कोई ढील नहीं कर सकता - आतिश इंदौरी

मैं उसूलों में कोई ढील नहीं कर सकता मैं उसूलों में कोई ढील नहीं कर सकता दोस्ती इश्क़ में तब्दील नहीं कर सकता दोस्ती एक छलावा ही रहेगी जानाँ इश्क़ का रूप मैं तब्दील नहीं कर सकता बे-वफ़ाओं से मेरा पाला पड़ा है ता-उम्र इश्क़ को तेरे कभी फ़ील नह…

झूट को सच तो मिरे यार बना सकता है - हनीफ़ दानिश इंदौरी

झूट को सच तो मिरे यार बना सकता है झूट को सच तो मिरे यार बना सकता है ये हुनर सुन तुझे सरदार बना सकता है तुझ को भी हक़ है सियासत में चले जाने का तू अगर रेत की दीवार बना सकता है ये नया दौर-ए-तरक़्क़ी है यहाँ सिक्कों से कोई ख़िर्क़ा कोई दस्तार …

घर जलेंगे उनसे इक दिन तीलियों को क्या पता - ओमप्रकाश यती

घर जलेंगे उनसे इक दिन तीलियों को क्या पता घर जलेंगे उनसे इक दिन तीलियों को क्या पता है नज़र उन पर किसी की बस्तियों को क्या पता ढूँढ़ती हैं आज भी पहली सी रंगत फूल में ज़हर कितना है हवा में तितलियों को क्या पता हाल क्या है ? ठीक है, जब भी मिले इत…

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है - सलीम कौसर

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है …

अपनी उलझन को बढ़ाने की ज़रूरत क्या है - नदीम गुल्लानी

अपनी उलझन को बढ़ाने की ज़रूरत क्या है अपनी उलझन को बढ़ाने की ज़रूरत क्या है छोड़ना है तो बहाने की ज़रूरत क्या है लग चुकी आग तो लाज़िम है धुआँ उट्ठेगा दर्द को दिल में छुपाने की ज़रूरत क्या है उम्र भर रहना है ताबीर से गर दूर तुम्हें फिर मिरे …

दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है - हबीब जालिब

दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है दोस्तों ने भी क्या कमी की है ख़ामुशी पर हैं लोग ज़ेर-ए-इताब और हम ने तो बात भी की है मुतमइन है ज़मीर तो अपना बात सारी ज़मीर ही की है अपनी तो दास्ताँ है बस इतनी ग़म उठाए हैं शाएरी …

बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है - उबैदुल्लाह अलीम

बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है हर धूप में जो मुझे साया दे वो सच्चा साया घर में है पाताल के दुख वो क्या जानें जो सत्ह पे हैं मिलने वाले हैं एक हवाला दोस्त मिरे और एक हवाला घर में है मिरी उम…

सच मेरे यार है - अनुराग शर्मा

सच मेरे यार है 1 टिकिट, टिकिट, टिकिट... और कोई बगैर टिकिट... जल्दी-जल्दी करो... चेकिंग स्टाफ चढ़ेगा आगे से... बे कोई रियायत ना करै हैं... हाँ भाई... दिल्ली वाले... अरे जे गठरी किसकी है? इसका टिकिट लगेगा... कंडक्टर ने शोर मचा-मचा कर नाक में दम क…

कितने अंदर से दोस्ती की है - देवेन्द्र गौतम

कितने अंदर से दोस्ती की है कितने अंदर से दोस्ती की है हमने खंजर से दोस्ती की है मेरी बातों से पिघलता कैसे मैंने पत्थर से दोस्ती की है संग जीने का इरादा भी नहीं संगमरमर से दोस्ती की है फिक्र किस बात की रहे हमको जब कलंदर से दोस्ती की है अ…

दोस्त है तो मेरा कहा भी मान - राहत इंदौरी

दोस्त है तो मेरा कहा भी मान दोस्त है तो मेरा कहा भी मान मुझसे शिकवा भी कर, बुरा भी मान दिल को सबसे बड़ा हरीफ समझ और इस संग को खुदा भी मान मैं कभी सच भी बोल देता हूँ गाहे-गाहे मेरा कहा भी मान याद कर देवताओं के अवतार हम फकीरों का सिलसिला भी …

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर - शकेब जलाली

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर दोस्तो पानी कभी रुकता नहीं ढलवान पर आज तक उस के तआ'क़ुब में बगूले हैं रवाँ अब्र का टुकड़ा कभी बरसा था रेगिस्तान पर मैं जो पर्बत पर चढ़ा वो और ऊँचा हो गया आसमा…

तेरे चेहरे की तरह और मिरे सीने की तरह - मुस्तफ़ा ज़ैदी

तेरे चेहरे की तरह और मिरे सीने की तरह तेरे चेहरे की तरह और मिरे सीने की तरह मेरा हर शेर दमकता है नगीने की तरह फूल जागे हैं कहीं तेरे बदन की मानिंद ओस महकी है कहीं तेरे पसीने की तरह ऐ मुझे छोड़ के तूफ़ान में जाने वाली दोस्त होता है तलातुम में…

खिंच के महबूब के दामन की तरफ़ - अर्श मलसियानी

खिंच के महबूब के दामन की तरफ़ खिंच के महबूब के दामन की तरफ़ आ गए और भी उलझन की तरफ़ तुम छुपाते रहो कितना उस को बिजलियाँ आएँगी ख़िर्मन की तरफ़ हर तरफ़ नूर का तड़का देखा कौन आया मिरे आँगन की तरफ़ ऐ चमन वालो रुकूँ या जाऊँ इक धुआँ सा है नशेमन…

डगमगाता, लड़खड़ाता आ रहा है - देवेन्द्र गौतम

डगमगाता, लड़खड़ाता आ रहा है डगमगाता, लड़खड़ाता आ रहा है कौन सा पर्वत उठाता आ रहा है आंख भी कोई मिला सकता नहीं हर कोई गरदन झुकाता आ रहा है पीठ पर यूं ही नहीं दरिया का हाथ साथ लहरों का निभाता आ रहा है आस्तीं में रख के वो खंजर कई दोस्ती के ग…

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इंदौरी

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस…

वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं - इरफ़ान अहमद मीर

वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं न कोई ख़ून का रिश्ता न कोई साथ सदियों का मगर एहसास अपनों सा वो अनजाने दिलाते हैं वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं ख़फ़ा जब ज़िंदगी हो…

ख़ुद को हर रोज़ इम्तिहान में रख - उमैर मंज़र

ख़ुद को हर रोज़ इम्तिहान में रख ख़ुद को हर रोज़ इम्तिहान में रख बाल ओ पर काट कर उड़ान में रख सुन के दुश्मन भी दोस्त हो जाए शहद से लफ़्ज़ भी ज़बान में रख ये तो सच है कि वो सितमगर है दर पर आया है तो अमान में रख मरहले और आने वाले हैं तीर अप…

दोस्ती पर शेर ओ शायरी | दोस्ती शायरी

दोस्ती पर कहे गए कुछ शेर / अशआर दोस्ती वो लफ्ज़ है वो अहसास है वो बिलकुल अलहदा इंसानों को आपस में जोड़े रखता है दोस्ती एक अहसास है और इस अहसास पर कई शायरों ने काफी कुछ कहा है हमने आपके लिए कुछ शे'र संग्रहित किये है आपके लिए पेश है दोस्त और दोस्त…

उसकी खुशबू मेरी गज़लों में सिमट आई है - इकबाल अशहर

उसकी खुशबू मेरी गज़लों में सिमट आई है उसकी खुशबू मेरी गज़लों में सिमट आई है नाम का नाम है रुसवाई की रुसवाई है दिल है एक और दो आलम का तमन्नाई है दोस्त का दोस्त है हरजाई का हरजाई है हिज्र की रात है और उनके तसव्वुर का चराग बज़्म की बज़्म है तन्हाई…

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