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अपने किरदार से ऊंचे नहीं बोला करते - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

अपने किरदार से ऊंचे नहीं बोला करते अपने किरदार से ऊंचे नहीं बोला करते पास दरिया हो तो क़तरे नहीं बोला करते सब ने ले ली है हुकूमत से यहाँ पर पदवी अब मेरी बात पे सारे नहीं बोला करते हम गवाहों को भला कैसे कहाँ से लाते  जब मेरे पाँव के छाले नहीं…

नयी इस रुत का मंज़र बोलता है - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

नयी इस रुत का मंज़र बोलता है नयी इस रुत का मंज़र बोलता है जिसे रोका वो बढ़कर बोलता है जरूरत पर सिमट कर रह गया जो उसे ये वक्त कायर बोलता है उसी बस्ती से में आया हुआ हूं जहां फूलों से पत्थर बोलता है सियासत इस तरह की चल रही है कोई भी अब सिमटकर…

झूट को सच तो मिरे यार बना सकता है - हनीफ़ दानिश इंदौरी

झूट को सच तो मिरे यार बना सकता है झूट को सच तो मिरे यार बना सकता है ये हुनर सुन तुझे सरदार बना सकता है तुझ को भी हक़ है सियासत में चले जाने का तू अगर रेत की दीवार बना सकता है ये नया दौर-ए-तरक़्क़ी है यहाँ सिक्कों से कोई ख़िर्क़ा कोई दस्तार …

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए - मंज़र भोपाली

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई ज़हरीली घर की हवाएँ हो गई महँगी शराब से दवाएँ हो गई जाइए आवाम को जवाब दीजिए लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गए आप तो ग़रीब से अमीर…

इस तरह से हल कोई मामले नहीं होते - डॉ. जियाउर रहमान जाफरी

इस तरह से हल कोई मामले नहीं होते इस तरह से हल कोई मामले नहीं होते झूठ -सच जो मिल जाएं फैसले नहीं होते तुमको जब भी चलना हो साथ मेरा ले लेना इक अकेले चलने से काफले नहीं होते तुमने सारी चीजों को आजज़ी से देखा है जिंदगी में इतने भी मसअले नहीं होत…

भुखमरी, बेरोजगारी, तस्करी के एहतिमाम - अदम गोंडवी

भुखमरी, बेरोजगारी, तस्करी के एहतिमाम भुखमरी, बेरोजगारी, तस्करी के एहतिमाम सन सत्तासी नज्र कर दें, मजहबी दंगों के नाम दोस्त, मलियाना के पसमंजर में जाके देखिए दो कदम हिटलर से आगे हैं ये जम्हूरी निजाम है इधर फाक़ाकशी से रात का कटना मुहाल रक़्स क…

जहाँ मन हो बिछा लेते है बिस्तर लेके चलते है - ओमप्रकाश यती

जहाँ मन हो बिछा लेते है बिस्तर लेके चलते है जहाँ मन हो बिछा लेते है बिस्तर लेके चलते है वो घर-परिवार, बर्तन, नून-शक्कर लेके चलते है यहाँ तो डर लगा रहता है बुलडोजर का ही हरदम चलो भाई यहाँ से टीन-टप्पर लेके चलते है अब उनके पास दौलत है, अब उनके…

रोटी और संसद - धूमिल

रोटी और संसद एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता हूँ— ‘यह तीसरा आदमी कौन है?’ मेरे देश की संसद मौन है। - धूमिल Roti aur Sansad ek adami …

कहने को है जनता राज - अदीबी मालिगाँवी

कहने को है जनता राज कहने को है जनता राज लेकिन जनता है मोहताज हुस्न की आँखों में आँसू बह गई उलटी गंगा आज आज है अपनों का रोना कल थे गैरों के मोहताज किस-किस की हम बात सुने हर कोई है, साहब-ए-ताज जिसके पसीने से खिरमन वह खुद रोटी को मोहताज …

आपकी हँसी - रघुवीर सहाय

आपकी हँसी निर्धन जनता का शोषण है कह कर आप हँसे लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हँसे सबके सब हैं भ्रष्टाचारी कह कर आप हँसे चारों ओर बड़ी लाचारी कह कर आप हँसे कितने आप सुरक्षित होंगे मैं सोचने लगा सहसा मुझे अकेला पा कर फिर से आप हँसे …

सभी की बात सुनती हो, वही सरकार होती है - देवेंद्र गौतम

सभी की बात सुनती हो, वही सरकार होती है सभी की बात सुनती हो, वही सरकार होती है हुकूमत में लचीलेपन की भी दरकार होती है सियासत के लिए बर्बाद कर देते हो क्यों आखिर बड़ी मुश्किल से कोई नस्ल जो तैयार होती है खुली आंखों से जो तस्वीर दिखती है निगाहों…

सदा हम जान से प्यारा ये हिन्दुस्तां समझते हैं - देवेश दीक्षित

सदा हम जान से प्यारा ये हिन्दुस्तां समझते हैं सदा हम जान से प्यारा ये हिन्दुस्तां समझते हैं यहाँ हर एक ज़र्रे को भी अपनी जाँ समझते हैं कहाँ दंगे कराने हैं, कहाँ है आग लगवानी हमारे देश में इसको सियासतदाँ समझते हैं किताबें चंद पढ़ बेटे, शहर क्या …

जब भी दुश्मन बढ़ा ठिकानों तक - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

जब भी दुश्मन बढ़ा ठिकानों तक जब भी दुश्मन बढ़ा ठिकानों तक हम न महदूद थे मकानों तक जिसने अपने परों को फैलाया वो परिंदा है आसमानों तक उम्र तोहमत लगाते गुज़री है ये सियासत है बदज़ुबानों तक काम कुछ भी नज़र नहीं आया काम दिखता है बस बयानों तक पास …

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