अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए - उबैदुल्लाह अलीम
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रा…