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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए - उबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रा…

बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है - उबैदुल्लाह अलीम

बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है हर धूप में जो मुझे साया दे वो सच्चा साया घर में है पाताल के दुख वो क्या जानें जो सत्ह पे हैं मिलने वाले हैं एक हवाला दोस्त मिरे और एक हवाला घर में है मिरी उम…

उबैदुल्लाह अलीम के 25 बेहतरीन शेर

उबैदुल्लाह अलीम के 25 बेहतरीन शेर मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या बना गुलाब तो कांटे चुभा गया इक शख़्स हुआ चराग़ तो घर ही जला गया इक शख़्स अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मैं ये किस…

कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में - उबैदुल्लाह अलीम

कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या कोई रंग तो दो मिरे चेहरे को फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या जब हम ही न महके फिर साहब तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या इक आइना था सो टूट गया अब ख़ुद से अगर …

मैं ये किस के नाम लिखूँ जो अलम गुज़र रहे हैं - उबैदुल्लाह अलीम

मैं ये किस के नाम लिखूँ जो अलम गुज़र रहे हैं मैं ये किस के नाम लिखूँ जो अलम गुज़र रहे हैं मिरे शहर जल रहे हैं मिरे लोग मर रहे हैं कोई ग़ुंचा हो कि गुल हो, कोई शाख़ हो शजर हो वो हवा-ए-गुलिस्ताँ है कि सभी बिखर रहे हैं कभी रहमतें थीं नाज़िल …

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