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चराग़ डसती हुई आंधियां भी आएँगी - डॉ. राहत इंदौरी

चराग़ डसती हुई आंधियां भी आएँगी चराग़ डसती हुई आंधियां भी आएँगी अगर सफ़र है, तो दुश्वारियां भी आएँगी अभी तो नाव किनारे है फैसला न करो जरा बढ़ोगे तो गहराइयाँ भी आएँगी मैं मौसमों का थका हूँ, मुझे हकीर न जान मेरे शज़र में कभी पत्तियां भीं आएँगी मु…

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी इख़्तियार की तराश - डॉ. राहत इंदौरी

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी इख़्तियार की तराश - डॉ. राहत इंदौरी यह लेख हमें मुज़फ़्फ़र हनफ़ी के पुत्र परवेज़ मुज़फ्फ़र के हवाले से प्राप्त हुआ है | डुबो कर ख़ून में लफ़्ज़ों को अँगारे बनाता हूँ फिर अँगारों को दहका कर ग़ज़ल पारे बनाता हूँ मुज़फ़्फ़र हनफ़ी का ये शैर मुझे अ…

मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की - राहत इंदौरी

मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की दाद लोगों की, गला अपना, ग़ज़ल उस्ताद की अपनी साँसें बेच कर मैं ने जिसे आबाद की वो गली जन्नत तो अब भी है मगर शद्दाद की उम्र भर चलते रहे आँखों पे पट्टी बाँध कर ज़िंदगी …

चराग़ों का घराना चल रहा है - राहत इंदौरी

चराग़ों का घराना चल रहा है चराग़ों का घराना चल रहा है हवा से दोस्ताना चल रहा है जवानी की हवाएँ चल रही हैं बुज़ुर्गों का ख़ज़ाना चल रहा है मिरी गुम-गश्तगी पर हँसने वालो मिरे पीछे ज़माना चल रहा है अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए तआ'रुफ़ ग़ा…

नया साल - राहत इंदौरी

नया साल एक ख़्वाब जो गुज़रा है अभी पिछले बरस का आतंक का घपलों का जुलूसों का हवस का हर रंग से एक रंग नया आँक रहा है सैलाब का तूफ़ान का बारिश का उमस का ये रेंगते मौसम ये खिसकते हुए दिन रात ये बदली हुई दुनिया बदलते हुए हालात एक टूटे हुए चाक पे ह…

बुलाती है मगर जाने का नईं - राहत इंदौरी

बुलाती है मगर जाने का नईं बुलाती है मगर जाने का नईं वो दुनिया है उधर जाने का नईं ज़मीं रखना पड़े सर पर तो रक्खो चलो हो तो ठहर जाने का नईं है दुनिया छोड़ना मंज़ूर लेकिन वतन को छोड़ कर जाने का नईं जनाज़े ही जनाज़े हैं सड़क पर अभी माहौल मर ज…

दोस्त है तो मेरा कहा भी मान - राहत इंदौरी

दोस्त है तो मेरा कहा भी मान दोस्त है तो मेरा कहा भी मान मुझसे शिकवा भी कर, बुरा भी मान दिल को सबसे बड़ा हरीफ समझ और इस संग को खुदा भी मान मैं कभी सच भी बोल देता हूँ गाहे-गाहे मेरा कहा भी मान याद कर देवताओं के अवतार हम फकीरों का सिलसिला भी …

इंसाफ जालिमों की हिमायत में जाएगा - राहत इन्दौरी

इंसाफ जालिमों की हिमायत में जाएगा इंसाफ जालिमों की हिमायत में जाएगा ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा दस्तार नोंच-नाच के अहबाब ले उड़े सर बच गया है ये भी शराफ़त में जाएगा दोज़ख के इंतजाम में उलझा है रात दिन दावा ये कर रहा है के जन्नत में जाएगा…

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा - राहत इंदौरी

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा इसी गली में वो भूका फ़क़ीर रहता था तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से…

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ - राहत इंदौरी

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ वो इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है हैं उतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है …

ज़ुबाँ तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे - राहत इंदौरी

ज़ुबाँ तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे ज़ुबाँ तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साकी, ये जिंदगी क्या है? जवाब द…

दिल बुरी तरह से धड़कता रहा - राहत इंदौरी

दिल बुरी तरह से धड़कता रहा दिल बुरी तरह से धड़कता रहा वो बराबर मुझे ही तकता रहा रोशनी सारी रात कम ना हुई तारा पलकों पे इक चमकता रहा छू गया जब कभी ख़याल तेरा दिल मेरा देर तक धड़कता रहा कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में और घर देर तक महकता रहा …

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है - राहत इंदौरी

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है एक दीवाना मुसाफ़िर है मिरी आँखों में वक़्त-बे-वक़्त ठहर जाता है चल पड़ता है अपनी ताबीर के चक्कर में मिरा जागता ख़्वाब रोज़ सू…

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे - राहत इंदौरी

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का इरादा मैं ने किया था कि छोड़ दूँगा उसे बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन उसे ये डर …

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं - राहत इंदौरी

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं मय-कदा ज़र्फ़ के मेआ'र का पैमाना है ख़ाली शीशों की तरह लोग उछलते क्यूँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के …

मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया - राहत इंदौरी

मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया एक पागल ने बहुत लोगों को पागल कर दिया अपनी पलकों पर सजा कर मेरे आँसू आप ने रास्ते की धूल को आँखों का काजल कर दिया मैं ने दिल दे कर उसे की थी वफ़ा की इब्तिदा …

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इंदौरी

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस…

सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा - राहत इंदौरी

सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा हज़ार पर्दों में ख़ुद को छुपा के बैठ मगर तुझे कभी न कभी बे-न…

जब मैं दुनिया के लिए बेच के घर आया था - राहत इंदौरी

जब मैं दुनिया के लिए बेच के घर आया था जब मैं दुनिया के लिए बेच के घर आया था उन दिनों भी मेरे हिस्से में सिफ़र आया था लोग पीपल के दरख़्तों को ख़ुदा कहने लगे मैं ज़रा धूप से बचने को इधर आया था इत्तिफाक़ ऐसा के मैं घर से ना निकला वरना ख़ून उस शख़्स क…

बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते - राहत इंदौरी

बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते एक सच के लिए किस किस से बुराई लेते आबले अपने ही अँगारों के ताज़ा हैं अभी लोग क्यूँ आग हथेली पे पराई लेते बर्फ़ की तरह दिसम्बर का सफ़र होता है हम उसे साथ न लेते तो रज़ाई ले…

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