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मुज़फ़्फ़र हनफ़ी इख़्तियार की तराश - डॉ. राहत इंदौरी

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी इख़्तियार की तराश - डॉ. राहत इंदौरी यह लेख हमें मुज़फ़्फ़र हनफ़ी के पुत्र परवेज़ मुज़फ्फ़र के हवाले से प्राप्त हुआ है | डुबो कर ख़ून में लफ़्ज़ों को अँगारे बनाता हूँ फिर अँगारों को दहका कर ग़ज़ल पारे बनाता हूँ मुज़फ़्फ़र हनफ़ी का ये शैर मुझे अ…

ये सच है कोई रहनुमा ठीक नहीं - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

ये सच है कोई रहनुमा ठीक नहीं ये सच है कोई रहनुमा ठीक नहीं मिरे भाई तू भी चला ठीक नहीं अदीबों को सच बोलना चाहिए सियासत की आब-ओ-हवा ठीक नहीं निगाहों से मेला न हो जाए वो उसे देर तक देखना ठीक नहीं हमें तो वही सम्त मर्ग़ूब है बला से उधर रास्ता…

उस ने हम को झील तराई और पहाड़ दिए - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

उस ने हम को झील तराई और पहाड़ दिए उस ने हम को झील तराई और पहाड़ दिए हम ने इन सब की गर्दन में पंजे गाड़ दिए ज़ंजीरों में जकड़ी उस मुँह-ज़ोर हवा ने फिर तोड़ दिए खिड़की दरवाज़े पर दे फाड़ दिए शबनम शबनम मोती बो कर आशा बैठी थी लश्कर आया खेत जलाए …

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब के 25 बेहतरीन शे'र

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब के 25 बेहतरीन शे'र मुझ से मत बोलो मैं आज भरा बैठा हूँ सिगरेट के दोनों पैकेट बिल्कुल ख़ाली हैं सुनाइए वो लतीफ़ा हर एक जाम के साथ कि एक बूँद से ईमान टूट जाता है सुनता हूँ कि तुझ को भी ज़माने से गिला है मुझ को भी ये दुनिया…

वो हमारे मकान पर आया - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

वो हमारे मकान पर आया वो हमारे मकान पर आया तीर आखिर कमान पर आया रह गए दंग हाँकने वाले शेर सीधा मचान पर आया दोनों रूपोश है कई दिन से गाँव भर खानदान पर आया तार टूटा तो कायनात का बोझ मेरी नन्ही सी जान पर आया दोस्तों ने चलाये थे नेज़े इत्ति…

फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से अपनी इस कम-ज़र्फ़ी का एहसास कहाँ ले जाऊँ मैं सुन रक्खा था उलझन कुछ कम हो जाती है रोने से बाद-अज़-वक़्त पशीम…

ग़ौग़ा खटपट चीख़म धाड़ - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

ग़ौग़ा खटपट चीख़म धाड़ ग़ौग़ा खटपट चीख़म धाड़ उफ़ आवाज़ों के झंकाड़ रात घना जंगल और मैं एक चना क्या फोड़े भाड़ मजनूँ का अंजाम तो सोच यार मिरे मत कपड़े फाड़ ज़ुल्मत मारेगी शब-ख़ून रौशनियों की ले कर आड़ अपना गंजा चाँद सँभाल मेरे सर पर धू…

आग लगाने वालों में थे मेरे भाई भी - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

आग लगाने वालों में थे मेरे भाई भी आग लगाने वालों में थे मेरे भाई भी जलने वाली बस्ती में था मेरा भी घर एक सोने की हर लंका उनकी और मुझे बनवास चतुर सयाने दस दस सर के मुझ मूरख सर एक गुलशन पर दोनों का हक़ है काँटा हो या फूल टकराने की शर्त न हो तो …

यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ आ जा मिरी रूठी हुई तन्हाई इधर आ मुझ को भी ये लम्हों का सफ़र चाट रहा है मिल बाँट के रो लें ऐ मिरे भाई इधर आ ऐ सैल-ए-रवान-ए-अबदी ज़िंदगी नामी मैं कौन सा पाबंद हूँ हरजाई इधर आ …

दीवारों पर गीली रेखाएँ रोती हैं - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

दीवारों पर गीली रेखाएँ रोती हैं दीवारों पर गीली रेखाएँ रोती हैं तीनों पर घुंघरू की बूँदें नाच रही हैं पैरों में मकड़ी ने जाला तान रखा है पर फैला कर चिड़ियाँ काँधे पर बैठी हैं डोल रहे हैं आँखों में पत्थर के साए शिरयानों में बहती नदियाँ सूख चु…

निराला गुड्डा - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

निराला गुड्डा - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी अब तक इस मकान में झाड़ू नहीं दी गई? शमीम ने रौब जमाया... तो बड़ी काम-चोर हो गई है शहनाज़। और शहनाज़ अपने फटे हुए दुपट्टे से घरौंदे को इस तरह तनदही से साफ़ करने लगी जैसे वाक़ई वो इस घर की मामा हो और शमीम उसकी मालकिन…

ख़ून के दाग़ आस्तीनों पर - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

ख़ून के दाग़ आस्तीनों पर ख़ून के दाग़ आस्तीनों पर और तमग़े उन्हीं के सीनों पर एक ज़र्रे ने ली थी अंगड़ाई आसमां आ पड़े ज़मीनों पर हम सितारे बनाके नदम हैं आप नाज़ाँ हैं आबगीनों पर है कहीं गर्द, बाद या गिर्दाब धूल उड़ने लगी सफ़ीनों पर वो तो अंगार…

होली नई बहार का पैग़ाम लाई है - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

होली नई बहार का पैग़ाम लाई है गुलशन पे रंग व नूर की बदली सी छाई है पौधों को है ख़ुमार, हवा पी के आई है फूलों को देखिये तो अजब दिलरुबाई है रंगीनियों से आज मेरी आशनाई है होली नई बहार का पैग़ाम लाई है काँटों को भी उबेर लजाती हुई कली उड़ता हुआ गुल…

याद उस को न कर बात बढ़ जायेगी - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

याद उस को न कर बात बढ़ जायेगी याद उस को न कर बात बढ़ जायेगी फूस बंगले में बरसात बढ़ जायेगी एक दिन सब्ज़ मौसम गुजर जायेगा ज़र्द फूलो की औकात बढ़ जायेगी मेरी आँखों के तारे न टूटे अगर चाँद घट जायेगा रात बढ़ जायेगी अपने हिस्से की बत्ती जलाये रखो व…

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब के कुछ अनसुने शेर

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब के कुछ अनसुने शेर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब इस 10-Oct-2020 को इस दुनिया-ए-फानी से कुंच कर गए | पर उनका कलाम आज भी हर उर्दू अदब के चाहने वाले के ज़ेहन में बसता है | आप हनफ़ी साहब का जीवन परिचय यहाँ पढ़ सकते है उनके कुछ अनसुने और बेज…

वक़्त के हमाम में दो नंगे - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

वक़्त के हमाम में दो नंगे ठीक पंद्रह साल बाद वो मुझे कल शाम इक भटियाखाने में मिला था देर तक इक दुसरे से हम गले मिलते रहे और लंगड़ी याद को सिगरेट से सुलगाते रहे उस ने कहा : याद है वो ऊट जो इंग्लिश पढाता था हमें ? वो चने के खेत वाला वाकिया? रात…

बेसबब रूठ के जाने के लिए आए थे - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

बेसबब रूठ के जाने के लिए आए थे बेसबब रूठ के जाने के लिए आए थे आप तो हमको मनाने के लिए आए थे ये जो कुछ लोग खमीदा हैं कमानोँ की तरह आसमानोँ को झुकाने के लिए आए थे हम को मालूम था दरिया में नहीं है पानी सर को नेज़े पे चढ़ाने के लिए आए थे इखतिलाफ़…

दोस्तो नजरे फसादात नही होने की - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

दोस्तो नजरे फसादात नही होने की दोस्तो नजरे फसादात नही होने की जान दे कर भी मुझे मात नहीं होने की उन से बिछडे तो लगा जैसे सभी अपनो से आज के बाद मुलाकात नहीं होने की ये कडे कोस मसाफत के बरस दिन तक है ओर दोराने सफर रात नही होने की…

मुझको ही ऐसा लगता है या सचमुच ही हो जाता है - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

मुझको ही ऐसा लगता है या सचमुच ही हो जाता है मुझको ही ऐसा लगता है या सचमुच ही हो जाता है मै बातें तुमसे करता हूं चांद गुलाबी हो जाता है उस दिल के क्या कहने जिसमे गम के कांटे डूब गए हों ऐसा ही दिल और किसी के दिल से नत्थी हो जाता है कोयल को उकसा…

अब्दुल कावी देसनवी जीवनी

अब्दुल कावी देसनवी जीवनी अब्दुल कावी देसनवी वो उर्दू के लेखक थे जिनकी वजह से हमें आज जावेद अख्तर , मुज़फ़्फ़र हनफ़ी और इकबाल मसूद जैसे शायरो की शायरी पढने को मिली है जो कि देसनवी जी के शिष्य रहे है | अब्दुल कावी देसनवी का जन्म 1 नवम्बर 1930 क…

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