
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब के 25 बेहतरीन शे'र
मुझ से मत बोलो मैं आज भरा बैठा हूँ
सिगरेट के दोनों पैकेट बिल्कुल ख़ाली हैं
सिगरेट के दोनों पैकेट बिल्कुल ख़ाली हैं
सुनाइए वो लतीफ़ा हर एक जाम के साथ
कि एक बूँद से ईमान टूट जाता है
कि एक बूँद से ईमान टूट जाता है
सुनता हूँ कि तुझ को भी ज़माने से गिला है
मुझ को भी ये दुनिया नहीं रास आई इधर आ
मुझ को भी ये दुनिया नहीं रास आई इधर आ
यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ
आ जा मिरी रूठी हुई तन्हाई इधर आ
आ जा मिरी रूठी हुई तन्हाई इधर आ
बचपन में आकाश को छूता सा लगता था
इस पीपल की शाख़ें अब कितनी नीची हैं
इस पीपल की शाख़ें अब कितनी नीची हैं
उस ने मुझ को याद फ़रमाया यक़ीनन
जिस्म में आया हुआ है ज़लज़ला सा
जिस्म में आया हुआ है ज़लज़ला सा
जब सराबों पे क़नाअत का सलीक़ा आया
रेत को हाथ लगाया तो वहीं पानी थी
रेत को हाथ लगाया तो वहीं पानी थी
काँटों में रख के फूल हवा में उड़ा के ख़ाक
करता है सौ तरह से इशारे मुझे कोई
करता है सौ तरह से इशारे मुझे कोई
मेरे तीखे शेर की क़ीमत दुखती रग पर कारी चोट
चिकनी चुपड़ी ग़ज़लें बे-शक आप ख़रीदें सोने से
चिकनी चुपड़ी ग़ज़लें बे-शक आप ख़रीदें सोने से
अपनी इस कम-ज़र्फ़ी का एहसास कहाँ ले जाऊँ मैं
सुन रक्खा था उलझन कुछ कम हो जाती है रोने से
सुन रक्खा था उलझन कुछ कम हो जाती है रोने से
फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से
वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से
वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से
खिलते हैं दिल में फूल तिरी याद के तुफ़ैल
आतिश-कदा तो देर हुई सर्द हो गया
आतिश-कदा तो देर हुई सर्द हो गया
सिवाए मेरे किसी को जलने का होश कब था
चराग़ की लौ बुलंद थी और रात कम थी
चराग़ की लौ बुलंद थी और रात कम थी
यूँ पलक पर जगमगाना दो घड़ी का ऐश है
रौशनी बन कर मिरे अंदर ही अंदर फैल जा
रौशनी बन कर मिरे अंदर ही अंदर फैल जा
रोती हुई एक भीड़ मिरे गिर्द खड़ी थी
शायद ये तमाशा मिरे हँसने के लिए था
शायद ये तमाशा मिरे हँसने के लिए था
अंदर से अच्छे होते हैं अक्सर आड़े तिरछे लोग
जैसे अफ़साना मंटो मन्टो का,जैसे शेर मुज़फ़्फ़र का
जैसे अफ़साना मंटो मन्टो का,जैसे शेर मुज़फ़्फ़र का
इस खुरदुरी ग़ज़ल को न यूँ मुँह बना के देख
किस हाल में लिखी है मिरे पास आ के देख
किस हाल में लिखी है मिरे पास आ के देख
उन पेड़ों के फल मत खाना जिनको तुमने ही बोया हो
जिन पर हों अहसान तुम्हारे उनसे आशाएं कम रखना
जिन पर हों अहसान तुम्हारे उनसे आशाएं कम रखना
हमें वो ढूंढता फिरता है सातों आसमानों में
उसे हम आँख से मिटटी लगाकर देख लेते हैं
उसे हम आँख से मिटटी लगाकर देख लेते हैं
सबकी आवाज़ में आवाज़ मिला दी अपनी
इस तरह आप ने पहचान मिटा दी अपनी
इस तरह आप ने पहचान मिटा दी अपनी
लोग शोहरत के लिए जान दिया करते हैं
और इक हम है कि मिट्टी भी उड़ा दी अपनी
और इक हम है कि मिट्टी भी उड़ा दी अपनी
आग लगाने वालों में थे मेरे भाई भी
जलने वाली बस्ती में था मेरा भी घर एक
जलने वाली बस्ती में था मेरा भी घर एक
गुलशन पर दोनों का हक़ है काँटा हो या फूल
टकराने की शर्त न हो तो शीशा पत्थर एक
टकराने की शर्त न हो तो शीशा पत्थर एक
बहुत अच्छा अगर जम्हूरियत ये है तो हाज़िर है
उन्हें आबाद कर देना, हमारे घर जला देना
उन्हें आबाद कर देना, हमारे घर जला देना
बुलंदी से हमेशा एक ही फ़रमान आता है
शगूफ़े नोच लेना, तितलियों के पर जला देना
शगूफ़े नोच लेना, तितलियों के पर जला देना