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बेटी पर शायरी और कविता

बेटी पर शायरी | बेटियों पर शायरी बेटियां घर की रौनक होती हैं और माता-पिता खासकर पिता के दिल के बेहद करीब भी होती हैं | हम आपके लिए लाए है बेटियों पर लिखे चुनिन्दा बेहतरीन शेरो और कवितांश का संकलन जिसमे शायरों और कवियों ने बेटियों को लेकर अपने जज़्…

फ़रवरी का स्वागत - वीरेन डंगवाल

फ़रवरी का स्वागत आओ हे फ़रवरी! पोते जा रहे तुम्हारे लिए कंपनी बाग़ के रेलिंग खिल रहे दनादन फूल खुल गया, वहाँ भी, तुम्हारे लिए मुग़ल गार्डन का द्वार लेकिन आओ-आओ घुटनों चलती हमारी बेटी पहले हमारे पास आओ। पंख दो हवा को मुलायम-मुलायम छतरी की …

सहमे स्वप्न - सुशील शर्मा

सहमे स्वप्न काँधे पर टंगा बस्ता चॉकलेट की बचपनी चाहत और फिर बाँबियों-झाड़ियों में से निकलते वे सांप, भेड़िये और लकड़बग्घे मासूम गले पर खूनी पंजे देह की कुत्सित भूख में बज़बज़ाते लिज़लिज़ाते कीड़े कर देते हैं उसके जिस्म को तार-तार। एक अहसास चीख कर…

ज़िंदगी में ग़म उठाने का मज़ा कुछ और है - देवेश दीक्षित देव

ज़िंदगी में ग़म उठाने का मज़ा कुछ और है ज़िंदगी में ग़म उठाने का मज़ा कुछ और है चोट खाकर मुस्कराने का मज़ा कुछ और है कौन कहता, है ज़रूरी जंग जीती जायें सब प्यार में तो हार जाने का मज़ा कुछ और है ख़ुशगुवारी में ग़ज़ल गाना कोई हैरत नहीं रंज-ओ-ग…

उठ मेरी बेटी सुबह हो गई - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

उठ मेरी बेटी सुबह हो गई पेड़ों के झुनझुने, बजने लगे; लुढ़कती आ रही है सूरज की लाल गेंद। उठ मेरी बेटी सुबह हो गई। तूने जो छोड़े थे, गैस के गुब्बारे, तारे अब दिखाई नहीं देते, (जाने कितने ऊपर चले गए) चांद देख, अब गिरा, अब गिरा, उठ मेरी बेटी…

ईद का चाँद - हफीज़ जालंधरी

ईद का चाँद जीती रहो, मगर मुझे आता नहीं नज़र ? बेटी कहाँ है चाँद ? मुझे भी बता, किधर ? अफ़सोस, अब निगाह भी कमज़ोर हो गई नेमत खुदा ने दी थी बुढ़ापे में खो गई मीनारे-खानकाह के ऊपर ? कहाँ? कहाँ? कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं वहां कहाँ? हां, डालियो…

लेती नहीं दवाई अम्मा - प्रो.योगेश छिब्बर

लेती नहीं दवाई अम्मा लेती नहीं दवाई अम्मा, जोड़े पाई-पाई अम्मा दुःख थे पर्वत, राई अम्मा हारी नहीं लड़ाई अम्मा इस दुनिया में सब मैले हैं किस दुनिया से आई अम्मा दुनिया के सब रिश्ते ठंडे गरमागर्म रजाई अम्मा जब भी कोई रिश्ता उधड़े करती है…

उसमें आवाज़ कुछ तुम्हारी लगे - डॉ जियाउर रहमान जाफरी

उसमें आवाज़ कुछ तुम्हारी लगे उसमें आवाज़ कुछ तुम्हारी लगे मुझको कोयल की कूक प्यारी लगे मैंने सीखा है जबसे सच कहना मेरी हर बात ही कटारी लगे खीर घर घर में क्यों बंटा आख़िर मुझको दुल्हन का पांव भारी लगे बस कि बदनाम हो गये हम - तुम मेरी खिड़की ते…

कली का वो मसलना देखा - शकुंतला सरुपरिया

कली का वो मसलना देखा रात के पिछले पहर मैंने वो सपना देखा खि‍लने से पहले, कली का वो मसलना देखा एक मासूम कली, कोख में मां के लेटी सिर्फ गुनाह कि नहीं बेटा, वो थी इक बेटी सोचे बाबुल कि जमाने में होगी हेटी बेटी आएगी पराए धन की एक पेटी सुबह-सां…

मुझको ही ऐसा लगता है या सचमुच ही हो जाता है - मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

मुझको ही ऐसा लगता है या सचमुच ही हो जाता है मुझको ही ऐसा लगता है या सचमुच ही हो जाता है मै बातें तुमसे करता हूं चांद गुलाबी हो जाता है उस दिल के क्या कहने जिसमे गम के कांटे डूब गए हों ऐसा ही दिल और किसी के दिल से नत्थी हो जाता है कोयल को उकसा…

ना जाने क्यूं लड़कियों के अपने घर नहीं होते_शकुंतला सरुपरिया

ना जाने क्यूं लड़कियों के अपने घर नहीं होते ना जाने क्यूं लड़कियों के अपने घर नहीं होते जो उड़ना चाहें अंबर पे, तो अपने पर नहीं होते आंसू दौलत, डाक बैरंग, बंजारन-सी जिंदगानी सिवा गम के लड़कियों के जमीनो-जर नहीं होते ख्वाब देखे कोई वो, उनपे रस…

न मै कंघी बनाता हूँ, न मै चोटी बनाता हूँ - मुनव्वर राना

न मै कंघी बनाता हूँ, न मै चोटी बनाता हूँ न मै कंघी बनाता हूँ, न मै चोटी बनाता हूँ ग़ज़ल मै आप बीती को मै जग बीती बनाता हूँ ग़ज़ल वो सिंफे-नाजुक है जिसे अपनी रफाक़त से वो महबूबा बना लेता है मै बेटी बनाता हूँ मुझे इस शहर की सब लड़किया आदाब करती है …

शहरे वफ़ा का आज ये कैसा रिवाज है - चाँद शेरी

शहरे वफ़ा का आज ये कैसा रिवाज है शहरे वफ़ा का आज ये कैसा रिवाज है मतलब परस्त अपनों का खालिस मिजाज़ है फुटपाथ से गरीबी ये कहती है चीख कर क्यू भूख और प्यास का मुझ पर ही राज है जलती रहेगी बेटियां यु ही दहेज पर कानून में सबुत का जब तक रिवाज है श…

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है - मुनव्वर राना

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है मै उर्दू मै ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है उछलते-खेलते बचपन में बेटा ढूंढती होगी तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है तभी जा कर कही माँ बाप को कुछ चै…

आहट हमारी सुन के वो खिड़की में आ गये - तुफ़ैल चर्तुवेदी

आहट हमारी सुन के वो खिड़की में आ गये आहट हमारी सुन के वो खिड़की में आ गये अब तो ग़ज़ल के शेर असीरी में आ गये साहिल पे दुश्मनों ने लगाई थी ऐसी आग हम बदहवास डूबती कश्ती में आ गये अच्छा दहेज दे न सका मैं बस इसलिए दुनिया में जितने ऐब थे बेटी में…

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ - निदा फ़ाज़ली

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है चोका बासन, चिमटा फुकनी जैसी माँ चीड़ो की चाहकर में गूंजे राधामोहन अली अली मुर्गे की आवाज से खुलती घर की कुण्डी जैसी माँ बाण की खुर्री ख़त के ऊपर हर…

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