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राखी - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

राखी जिसमें केवल बसती श्रद्धा रहता निर्मल प्यार भाई और बहन का ख़ालिस ये राखी त्यौहार कहीं हो भाई लेकिन इस दिन बहना के घर आते अपने हाथ बढ़ा देते हैं और राखी बंधवाते नहीं ये केवल एक धागा है इसमें है विश्वास भाई उसका एक रक्षक है जगी है उस…

न कमरा जान पाता है, न अँगनाई समझती है - मुनव्वर राना

न कमरा जान पाता है, न अँगनाई समझती है न कमरा जान पाता है, न अँगनाई समझती है कहाँ देवर का दिल अटका है भौजाई समझती है हमारे और उसके बीच एक धागे का रिश्ता है हमें लेकिन हमेशा वो सगा भाई समझती है तमाशा बन के रह जाओगे तुम भी सबकी नज़रों में ये द…

किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा - मुनव्वर राना

किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा जहां लड़की की इज़्ज़त लुटना एक खेल बन जाए वहां पर ऐ कबूतर तेरे चिट्ठी कौन बांधेगा ये बाज़ार-ए-सियासत है यहां ख़ु…

राखी की चुनौती - सुभद्राकुमारी चौहान

राखी की चुनौती बहिन आज फूली समाती न मन में। तड़ित आज फूली समाती न घन में॥ घटा है न झूली समाती गगन में। लता आज फूली समाती न बन में॥ कहीं राखियाँ हैं, चमक है कहीं पर, कहीं बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं। ये आई है राखी, सुहाई है पूनो, बधाई उन…

राखी - मसूदा हयात

राखी उस के धागों में दिल के ख़ज़ाने निहाँ उस के फूलों में दरिया-ए-उल्फ़त रवाँ ये बहन भाई की चाहतों का निशाँ ये है राखी का बंधन मिरे भाइयो इस की तस्वीर में है अजब बाँकपन इस की तारीख़ में एकता का चलन इस की अज़्मत का क़ाइल है सारा चमन ये है र…

राखी - नज़ीर अकबराबादी

राखी - नज़ीर अकबराबादी चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी अयाँ है अब…

रक्षाबंधन पर बेहतरीन शायरी | राखी पर शायरी

रक्षाबंधन पर बेहतरीन शायरी | राखी पर शायरी राखी / रक्षाबंधन भाई बहन के प्रेम का त्यौहार है मानवीय भावनाओ का त्यौहार है | आज हम आपके लिए उन चुनिन्दा अशआरो को लाये है जिन्हें शायरों और कवियों ने या तो बहनों के लिए या फिर इस त्यौहार को लेकर लिखे है :…

आदमी के लिए है क्या औरत - बलजीत सिंह बेनाम

आदमी के लिए है क्या औरत आदमी के लिए है क्या औरत माँ बहन और प्रेमिका औरत वो ही सीता वही अहिल्या भी फिर क्यों सदियों से बेवफ़ा औरत लौट कर कब है आ सकी इज्ज़त घर की दहलीज़ से न जा औरत ज़िन्दगानी बनी किसी के लिए तो किसी के लिए क़ज़ा औरत आदमी और इ…

तू हर परिंदे को छत पर उतार लेता है - मुनव्वर राना

तू हर परिंदे को छत पर उतार लेता है तू हर परिंदे को छत पर उतार लेता है ये शौक़ वो है जो ज़ेवर उतार लेता है मै आसमां की बुलन्दी पे बारहा पहुचां मगर नसीब ज़मीं पर उतार लेता है अमीरे-शहर की हमदर्दियों से बच के रहो ये सर से बोझ नहीं, सर उतार लेता है…

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ - निदा फ़ाज़ली

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है चोका बासन, चिमटा फुकनी जैसी माँ चीड़ो की चाहकर में गूंजे राधामोहन अली अली मुर्गे की आवाज से खुलती घर की कुण्डी जैसी माँ बाण की खुर्री ख़त के ऊपर हर…

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