मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता - अहमद नदीम क़ासमी
मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता एक ज़र्रा भी तो बेकार नहीं हो सकता इस क़दर प्यार है इंसाँ की ख़ताओं से मुझे कि फ़रिश्ता मिरा मेआ'र नहीं हो सकता ऐ ख़ुदा फिर ये जहन्नम का तमाशा किया है तेरा शहक…