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मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता - अहमद नदीम क़ासमी

मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता एक ज़र्रा भी तो बेकार नहीं हो सकता इस क़दर प्यार है इंसाँ की ख़ताओं से मुझे कि फ़रिश्ता मिरा मेआ'र नहीं हो सकता ऐ ख़ुदा फिर ये जहन्नम का तमाशा किया है तेरा शहक…

भिखारन - अहमद नदीम कासमी

भिखारन अभी लोग पूरी तरह से जागते भी नहीं जब वो आती है इक इक गली वो सदाए लगाती है दो चार ऐसे भी दर है जिन्हें खटखटाती है फिर जैसे दिन के समुन्दर में गोता लगाती है और डूब जाती है लेकिन अभी सुबह पूरी तरह से चटखती नहीं जब वो... जैसे ज़मीन से उ…

तुझे खोकर भी तुझे पाऊ जहाँ तक देखूँ - अहमद नदीम कासमी

तुझे खोकर भी तुझे पाऊ जहाँ तक देखूँ तुझे खोकर भी तुझे पाऊ जहाँ तक देखूँ हुस्ने-यज़दां से तुझे हुस्ने-बुताँ तक देखू तुने यूँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था मै तो दिल में तेरे कदमों के निशाँ तक देखूँ सिर्फ इस शौक से पूछी है हजारों बातें मै ते…

किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ - अहमद नदीम क़ासमी

किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ सब यहां दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ वो भी क्या दिन थे की हर वहम यकीं होता था अब हक़ीक़त नज़र आए तो उसे क्या समझूँ दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे ऐस…

अंदाज हू-ब-हू तेरी आवाजे-पा का था - अहमद नदीम कासमी

अंदाज हूँ-ब-हूँ तेरी आवाजे-पा का था अंदाज हूँ-ब-हूँ तेरी आवाजे-पा का था देखा निकलके घर से तो झोका हवा का था उस हुस्ने-इत्तिफाक पे लूटकर भी शाद हूँ तेरी रजा जो थी, वो तकाज़ा वफ़ा का था दिल राख हो चुका तो चमक और बढ़ गई यह तेरी याद थी कि अमल कीमिय…

कौन कहता है मौत आई तो मर जाऊँगा - अहमद नदीम कासमी

कौन कहता है मौत आई तो मर जाऊँगा कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा घर में घिर जाऊँगा, सहरा में बिखर जाऊँगा तेरे पहलू से जो उठूँगा तो मुश्किल ये है सिर्फ़ इक शख़्स को …

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