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मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ - जगन्नाथ आज़ाद

मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ अब ये भी है बहुत कि तुम्हें याद आ सकूँ ये क्या तिलिस्म है कि तिरी जल्वा-गाह से नज़दीक आ सकूँ न कहीं दूर जा सकूँ ज़ौक़-ए-निगाह और बहारों के दरमियाँ पर्दे गिरे ह…

कलकत्ता मेल - जगन्नाथ आज़ाद

कलकत्ता मेल कलकत्ते से मेरे भैय्या लाए है एक रेल रेल बहुत ही अच्छी है ये इसको न समझो खेल चाबी है इस रेल का कोयला चाबी इसका तेल कलकत्ता से आई है ये है कलकत्ता मेल नन्हा-सा इंजन इसका नन्हा सा है गार्ड नन्ही-सी है पटरी इसकी नन्हा-सा है यार्ड इस…

हमारे रब्ते-बाहम की कहाँ तक बात जा पहुची - जगन्नाथ आज़ाद

हमारे रब्ते-बाहम की कहाँ तक बात जा पहुची हमारे रब्ते-बाहम की कहाँ तक बात जा पहुची हक़ीक़त से चली थी दास्ताँ तक बात जा पहुची उठी दिल से यकीने-बाहमी पर जिस की बुनियादे ताज्जुब है वही आखिर गुमां तक बात जा पहुची गुलिस्तां के किसी गोशे पे इक कौं…

बस एक नूर झलकता हुआ नज़र आया - जगन्नाथ आज़ाद

बस एक नूर झलकता हुआ नज़र आया बस एक नूर झलकता हुआ नज़र आया फिर उसके बाद न जाने चमन पे क्या गुजरी मै काश तुमको अहले-वतन बता सकता वतन से दूर किसी बे-वतन पे क्या गुजरी मेरे चमन में भी आई तो थी बहार मगर मै क्या समझाऊ कि अहले-चमन पे क्या गुजरी खाम…

खुदा तो खैर मुस्लमा था

खुदा तो खैर मुस्लमा था आज़ादी के समय के आसपास लिखे गये तीन शेरो के बारे में पढते है जिनके बारे में मशहूर शायर निदा फाज़ली लिख रहे है और विश्लेषण कर रहे है | जगन्नाथ आज़ाद भारतीय साहित्य का जाना पहचाना नाम है| शायरी विरासत में मिली| उनके पिता डाक्…

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