मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ - जगन्नाथ आज़ाद
मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ मुमकिन नहीं कि बज़्म-ए-तरब फिर सजा सकूँ अब ये भी है बहुत कि तुम्हें याद आ सकूँ ये क्या तिलिस्म है कि तिरी जल्वा-गाह से नज़दीक आ सकूँ न कहीं दूर जा सकूँ ज़ौक़-ए-निगाह और बहारों के दरमियाँ पर्दे गिरे ह…