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शायद मिटटी मुझे फिर पुकारे - सारा शगुफ़्ता

शायद मिटटी मुझे फिर पुकारे सुन दरिया अपनी मुट्ठी खोल रहा है सुन कुछ पत्ते और पत्तों के साथ कुछ हवा उखड़ गई है जंगल के पेड़ इरादे ज़मीन को बोसा दे रहे हैं चाहते हैं दरिया को मुट्ठी का जाल लगाएँ आँखें मंज़र तह करती जा रही हैं समुंदर मिट्टी को…

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है - सारा शगुफ़्ता

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है चराग़ ने फूल को जन्म देना शुरूअ' कर दिया है दूर बहुत दूर मेरा जन्म दिन रहता है आँगन में धूप न आए तो समझो तुम किसी ग़ैर-आबाद इलाक़े में रहते हो मिट्टी में मेरे बदन की टूट-फूट पड़ी है हमारे ख़्वाबों में चाप कौन छो…

मौत की तलाशी मत लो - सारा शगुफ़्ता

मौत की तलाशी मत लो बादलों में ही मेरी तो बारिश मर गई अभी अभी बहुत ख़ुश लिबास था वो मेरी ख़ता कर बैठा कोई जाए तो चली जाऊँ कोई आए तो रुख़्सत हो जाऊँ मेरे हाथों में कोई दिल मर गया है मौत की तलाशी मत लो इंसान से पहले मौत ज़िंदा थी टूटने वाले ज़…

दूसरा पहाड़ - सारा शगुफ़्ता

दूसरा पहाड़ ये दूसरा पहाड़ था जहाँ चीज़ों में मेरी उम्र के कुछ हिस्से पड़े थे मैं यहाँ से कितनी बे-तरतीब गई थी और मैं अपना दिन गर्द कर के आ रही थी सारी चीज़ों ने मुझे गले लगाया मैं ने छोटे जूते छाबड़ी वाले को फ़रोख़्त कर दिए और सिक्के हैंगर म…

औरत और नमक - सारा शगुफ़्ता

औरत और नमक इज़्ज़त की बहुत-सी क़िस्में हैं घूंघट, थप्पड़, गंदुम इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मैंखें ठोंकी गई हैं घर से लेकर फुटपाथ तक हमारा नहीं इज़्ज़त हमारे गुज़ारे की बात है इज़्ज़त के नेज़े से हमें दागा जाता है इज़्ज़त की कनी हमारी ज़बान से शुरू होती …

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