शायद मिटटी मुझे फिर पुकारे - सारा शगुफ़्ता
शायद मिटटी मुझे फिर पुकारे सुन दरिया अपनी मुट्ठी खोल रहा है सुन कुछ पत्ते और पत्तों के साथ कुछ हवा उखड़ गई है जंगल के पेड़ इरादे ज़मीन को बोसा दे रहे हैं चाहते हैं दरिया को मुट्ठी का जाल लगाएँ आँखें मंज़र तह करती जा रही हैं समुंदर मिट्टी को…