bachpan

मै जैसा बचपन में था - मुनीर नियाजी

मै जैसा बचपन में था मै जैसा बचपन में था उसी तरह मै अब तक हूँ खिले बाग़ को देख-देख कर बुरी तरह हैरान आस-पास मिरे क्या होता है इन सब से अनजान - मुनीर नियाजी mai jaisa bachpan me tha mai jaisa bachpan me tha usi tarah mai ab tak hun khile b…

अकेला बचपन - चारुशीला मौर्य

अकेला बचपन आया बरखा का मौसम, रिमझिम फुहारों से भीगा सौंधी मिट्टी की खुशबू में डूबा याद आया बचपन वह पक्की निंबोलीओं का स्वाद, वह गुलाम डंडी का खेल उड़ रही थी रंग- बिरंगी तितलियां, दौड़ रहे थे झुंड बच्चों के, झुंड बनाकर दाम लेना, तेरे मेरे झग…

यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए - अजय सहाब

यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए फिर वो मासूम सा बचपन का ज़माना आए काश लौटें मिरे पापा भी खिलौने ले कर काश फिर से मिरे हाथों में ख़ज़ाना आए काश दुनिया की भी फ़ितरत हो मिरी माँ जैसी जब मैं बिन बात के रूठू…

अब काम दुआओं के सहारे नहीं चलते - शकील जमाली

अब काम दुआओं के सहारे नहीं चलते अब काम दुआओं के सहारे नहीं चलते चाबी न भरी हो तो खिलौने नहीं चलते अब खेल के मैदान से लौटो मेरे बच्चो ता उम्र बुजुर्गों के असासे नहीं चलते इक उम्र के बिछुडो़ का पता पूछ रहे हो, दो रोज़ यहाँ ख़ून के रिश्ते नहीं …

सफ़र से लौट जाना चाहता है - शकील जमाली

सफ़र से लौट जाना चाहता है सफ़र से लौट जाना चाहता है परिन्दा आशियाना चाहता है कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा मुस्कुराना 😊 चाहता है उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया जो दो पैसे कमाना चाहता है यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं वो पागल ज़हर …

बच्चों पर शायरी

बच्चों पर शायरी बच्चों पर कुछ शेर पेश है आशा है आप सभी को जरुर पसंद आयेंगे... इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे इक बच्चे की लाश भी थी जिस के कंधे पर बस्ता था - अंजुम तराज़ी दुख़्तर-ए-रज़ ने उठा रक्खी है आफ़त सर पर ख़ैरियत गुज़री कि अ…

कितना अच्छा था वह बचपन - अतीक इलाहाबादी

कितना अच्छा था वह बचपन उनके आँगन बरसा सावन गिनना छोडो दिल की धडकन उसके आंसू मेरा दामन गम है लाज़िम कैसी उलझन उनके चर्चे गुलशन गुलशन बस्ती में है घर-घर रावन कितना अच्छा था वह बचपन - अतीक इलाहाबादी kitna achcha tha wah bachpan u…

आसमां पर कोई सितारा है - सरदार आसिफ

आसमां पर कोई सितारा है आसमां पर कोई सितारा है जो मेरा दूसरा किनारा है एक खुद्दार आदमी के लिए मुझको मरना अभी गवारा है मेरी माँ डर रही है राजा से मुझसे शहजादा शर्त हारा है दिल वो बच्चा है जिसके हाथो में एक फूटा हुआ गुब्बारा है लालची बाप क…

हम तो बचपन में भी अकेले थे - जावेद अख़्तर

हम तो बचपन में भी अकेले थे हम तो बचपन में भी अकेले थे सिर्फ दिल की गली में खेले थे एक तरफ मोर्चे थे पलकों के एक तरफ आंसुओ के रेले थे थी सजी हसरते दुकानों पर जिन्दगी के अजीब मेले थे आज जेहन-ओ-दिल भूखो मरते है उन दिनों फाके भी हमने झेले थे…

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