बच्चों पर कुछ अशआर... | जखीरा, साहित्य संग्रह

बच्चों पर कुछ अशआर...

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बच्चों पर कुछ शेर पेश है आशा है आप सभी को जरुर पसंद आयेंगे... इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे इक बच्चे की लाश भी थी जिस के...

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बच्चों पर कुछ शेर पेश है आशा है आप सभी को जरुर पसंद आयेंगे...

इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे
इक बच्चे की लाश भी थी जिस के कंधे पर बस्ता था
- अंजुम तराज़ी



दुख़्तर-ए-रज़ ने उठा रक्खी है आफ़त सर पर
ख़ैरियत गुज़री कि अंगूर के बेटा न हुआ
- अकबर इलाहाबादी



तुझको मासूम कहा जाए कि ज़ालिम ऐ दोस्त
दिल है बच्चों की तरह ज़हन है क़ातिल की तरह
- अकील नोमान



सुब्ह-सवेरा दफ़्तर बीवी बच्चे महफ़िल नींदें रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर
- अखिलेश तिवारी



वो जिस के सेहन में कोई गुलाब खिल न सका
तमाम शहर के बच्चों से प्यार करता था
- अज़हर इनायती



देव परी के क़िस्से सुन कर
भूके बच्चे सो लेते हैं
- अतीक़ इलाहाबादी



महंगे खिलौने दे न सका मैं ये मेरी लाचारी है
लेकिन मेरी बच्ची मुझको जाँ से ज़ियादा प्यारी है
- अतुल अजनबी



नर्सरी का दाख़िला भी सरसरी मत जानिए
आप के बच्चे को अफ़लातून होना चाहिए
- अनवर मसूद



बचपन में हम ही थे या था और कोई
वहशत सी होने लगती है यादों से
- अब्दुल अहद साज़



माज़ी के रेग-ज़ार पे रखना सँभल के पाँव
बच्चों का इस में कोई घरौंदा बना न हो
- अब्दुल हफ़ीज़ नईमी



अभी तो घर में न बैठें कहो बुज़ुर्गों से
अभी तो शहर के बच्चे सलाम करते हैं
- अब्बास ताबिश



फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता
जहाँ बच्चे नहीं होते वो घर अच्छा नहीं लगता
- अब्बास ताबिश



ये ज़िंदगी कुछ भी हो मगर अपने लिए तो
कुछ भी नहीं बच्चों की शरारत के अलावा
- अब्बास ताबिश



इश्क़ के हिज्जे भी जो न जानें वो हैं इश्क़ के दावेदार
जैसे ग़ज़लें रट कर गाते हैं बच्चे स्कूल में
- अमीक़ हनफ़ी



सौंपोगे अपने बा'द विरासत में क्या मुझे
बच्चे का ये सवाल है गूँगे समाज से
- अशअर नजमी



बच्चे खुली फ़ज़ा में कहाँ तक निकल गए
हम लोग अब भी क़ैद इसी बाम-ओ-दर में हैं
- असग़र मेहदी होश



सारी दुनिया को जीतने वाला
अपने बच्चों से हार जाता है
- असग़र शमीम



रास्ता रोक लिया मेरा किसी बच्चे ने
इस में कोई तो 'असर' मेरी भलाई होगी
- असर अकबराबादी



वे जो मज़हब की दुकाने खोलकर बैठे हुए
उनसे कह दो अब न वे बच्चो में डर पैदा करे
- अशोक अंजुम



सुनाऊ कौन से किरदार बच्चो को कि अब उनको
न राजा अच्छा लगता है न रानी अच्छी लगती है
- अशोक मिजाज़



और 'फ़राज़' चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया
- अहमद फ़राज़



हम तिरे शौक़ में यूँ ख़ुद को गँवा बैठे हैं
जैसे बच्चे किसी त्यौहार में गुम हो जाएँ
- अहमद फ़राज़



बाहर इंसानों से नफ़रत है लेकिन
घर में ढेरों बच्चे पैदा करते हैं
- अहमद शनास



मैं ने भी बच्चों को अपनी निस्बत से आज़ाद किया
वो भी अपने हाथों से इंसान बनाना भूल गया
- अहमद शनास



बच्चों को भूके पेट सुलाने के बाद हम
कैसे ग़ज़ल के शे'र सुनाएँ जहाँ-पनाह
- अहया भोजपुरी



उस की बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सर पर
ख़ैरियत गुज़री कि अँगूर के बेटा न हुआ
- आगाह देहलवी



देखा न तुझे ऐ रब हम ने हाँ दुनिया तेरी देखी है
सड़कों पर भूके बच्चे भी कोठे पर अब्ला नारी भी
- आज़िम कोहली



नीला अम्बर चाँद सितारे बच्चों की जागीरें हैं
अपनी दुनिया में तो बस दीवारें ही ज़ंजीरें हैं
- आज़िम कोहली



चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं
बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देख-भाल से
- आदिल मंसूरी



दिन -भर की थकन ओढ़ के जब बच्चों में पहुंचूं
आती है पसीने से लोबान की खुशबू
- आदील रशीद



मुस्तक़िल फांको ने चेहरों की बशाशत छीन ली
फुल-से मासूम बच्चो को भी ग़ुरबत खा गई
- अनवर जलालपुरी



राज़ ये क्या है मुझको भी तो बतला मेरे 'अज़ीज़'
मेरे बच्चो के होठो की कहा गई मुस्कान
- अज़ीज़ अंसारी



आज-कल तो सब के सब टीवी के दीवाने हुए
वर्ना बच्चे तो लिया करते थे पागल के मज़े
- बद्र वास्ती



उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते
- बशीर बद्र



पहचान अपनी हम ने मिटाई है इस तरह
बच्चों में कोई बात हमारी न आएगी
- बशीर बद्र



यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें
तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है
- बशीर बद्र



हज़ारों शेर मेरे सो गये काग़ज़ की क़ब्रों में,
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता |
- बशीर बद्र



शाम के बाद बच्चो से कैसे मिलू
अब मेरे पास कोई कहानी नहीं
- बशीर बद्र



जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह
तो मेरे फूल से बच्चों ने मुझ को घेर लिया
- बिस्मिल साबरी



भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेचते फिरते हैं गलियों में ग़ुबारे बच्चे
- बेदिल हैदरी



हो गया चर्ख़-ए-सितमगर का कलेजा ठंडा
मर गए प्यास से दरिया के किनारे बच्चे
- बेदिल हैदरी



कितना आसान था बचपन में सुलाना हमको
नींद आ जाती थी परियो की कहानी सुनकर
- भारत भूषण पन्त



हक़ीम ए शहर के बच्चों को पालने के लिए,
हर आदमी ने कोई रोग पाल रक्खा है !
यहाँ वो चिड़िया* भी खुश हैं ये सोच कर सैयाद,
कि उसने दुनिया को पिंजड़े में डाल रक्खा है !
- चराग शर्मा
*चिडिया को "आत्ममुग्ध बौना" पढ़ सकते हैं



हो के मजबूर ये बच्चों को सबक़ देना है
अब क़लम छोड़ के तलवार उठा ली जाए
- दानिश अलीगढ़ी



मुझे ठुकरा दिया तू ने फ़क़त शाइ'र समझ कर आज
मिरी नज़्में तिरे बच्चे सिलेबस में पढ़ें तो फिर
- फख़्र अब्बास



कमरे में आ के बैठ गई धूप मेज़ पर
बच्चों ने खिलखिला के मुझे भी जगा दिया
- फ़ज़्ल ताबिश



इसे बच्चों के हाथों से उठाओ
ये दुनिया इस क़दर भारी नहीं है
- फ़रहत एहसास



बचा के लाएँ किसी भी यतीम बच्चे को
और उस के हाथ से तख़लीक़-ए-काइनात करें
- फ़रहत एहसास



बोसे बीवी के हँसी बच्चों की आँखें माँ की
क़ैद-ख़ाने में गिरफ़्तार समझिए हम को
- फ़ुज़ैल जाफ़री



हम मुसाफ़िर हैं गर्द-ए-सफ़र हैं मगर ऐ शब-ए-हिज्र हम कोई बच्चे नहीं
जो अभी आँसुओं में नहा कर गए और अभी मुस्कुराते पलट आएँगे
- ग़ुलाम हुसैन साजिद



कल यही बच्चे समुंदर को मुक़ाबिल पाएँगे
आज तैराते हैं जो काग़ज़ की नन्ही कश्तियाँ
- हसन अकबर कमाल



बड़ों ने उस को छीन लिया है बच्चों से
ख़बर नहीं अब क्या हो हाल खिलौने का
- हसन अकबर कमाल



बच्चों के साथ आज उसे देखा तो दुख हुआ
उन में से कोई एक भी माँ पर नहीं गया
- हसन अब्बास रज़ा



ये कार-ए-इश्क़ तो बच्चों का खेल ठहरा है
सो कार-ए-इश्क़ में कोई कमाल क्या करना
- हसन अब्बास रज़ा



ग़रीब बच्चों की ज़िद भी न कर सका पूरी
तमाम उम्र खिलौनों के भाव करता रहा
- हसीब सोज़



वो लम्हा जब मिरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे
मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई
- हुमैरा रहमान



मुसलसल जागने के बाद ख़्वाहिश रूठ जाती है
चलन सीखा है बच्चे की तरह उस ने मचलने का
- इक़बाल साजिद



ये तिरे अशआर तेरी मानवी औलाद हैं
अपने बच्चे बेचना 'इक़बाल-साजिद' छोड़ दे
- इक़बाल साजिद



दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन में
सो ज़ख़्म खाते रहे और दुआ दिए गए हम
- इफ़्तिख़ार आरिफ़



जो तीर बूढ़ों की फ़रियाद तक नहीं सुनते
तो उन के सामने बच्चों का मुस्कुराना क्या
- इरफ़ान सिद्दीक़ी



'जमाल' हर शहर से है प्यारा वो शहर मुझ को
जहाँ से देखा था पहली बार आसमान मैं ने
- जमाल एहसानी



इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूँढता फिरा उस को वो नगर नगर तन्हा
- जावेद अख़्तर



मुझ को यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं
- जावेद अख़्तर



मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था
मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी
- जावेद अख़्तर



हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे
- जावेद अख़्तर



ये दर-ओ-दीवार पर बे-नाम से चुप-चाप साए
फूलों रस्तों और बच्चों की हिफ़ाज़त चाहते हैं
- ज़ुल्फ़ेक़ार अहमद ताबिश



मेरे रोने का जिस में क़िस्सा है
उम्र का बेहतरीन हिस्सा है
- जोश मलीहाबादी



हम भी इन बच्चों की मानिंद कोई पल जी लें
एक सिक्का जो हथेली पे सजा लाते हैं
- कफ़ील आज़र अमरोहवी



मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई
- कैफ़ी आज़मी



घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
- क़ैसर-उल जाफ़री



बच्चे मेरी उँगली थामे धीरे धीरे चलते थे
फिर वो आगे दौड़ गए मैं तन्हा पीछे छूट गया
- ख़ालिद महमूद



लहू तेवर बदलता है कहाँ तक
मिरा बेटा सियाना हो तो देखूँ
- खुर्शीद अकबर



क़लम उठाऊँ कि बच्चों की ज़िंदगी देखूँ
पड़ा हुआ है दोराहे पे अब हुनर मेरा
- लईक़ आजिज़



एक हाथी एक राजा एक रानी के बग़ैर
नींद बच्चों को नहीं आती कहानी के बग़ैर
- मक़सूद बस्तवी



बच्चों का सा मिज़ाज है तख़्लीक़-कार का
अपने सिवा किसी को बड़ा मानता नहीं
- मतीन नियाज़ी



मिरे दिल में कोई मासूम बच्चा
किसी से आज तक रूठा हुआ है
- मनीश शुक्ला



'ख़िज़ाँ' कभी तो कहो एक इस तरह की ग़ज़ल
कि जैसे राह में बच्चे ख़ुशी से खेलते हैं
- महबूब ख़िज़ां



निगाह पड़ने न पाए यतीम बच्चों की
ज़रा छुपा के खिलौने दुकान में रखना
- महबूब ज़फ़र



जिस के लिए बच्चा रोया था और पोंछे थे आँसू बाबा ने
वो बच्चा अब भी ज़िंदा है वो महँगा खिलौना टूट गया
- महशर बदायुनी



क़त्ल अमीर-ए-शहर का लाडला बेटा कर गया
जुर्म मगर ग़रीब के लख़्त-ए-जिगर के सर गया
- मिर्ज़ा शारिक़ लाहरपुरी



अश्क-ए-ग़म दीदा-ए-पुर-नम से सँभाले न गए
ये वो बच्चे हैं जो माँ बाप से पाले न गए
- मीर अनीस



बाप का है फ़ख़्र वो बेटा कि रखता हो कमाल
देख आईने को फ़रज़ंद-ए-रशीद-ए-संग है
- मीर मोहम्मदी बेदार



बचपन में आकाश को छूता सा लगता था
उस पीपल की शाखें अब कितनी नीची हैं
- मुज़फ्फ़र हनफ़ी



असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
कहाँ गया मिरा बचपन ख़राब कर के मुझे
- मुज़्तर ख़ैराबादी



खिलौनों की दुकानों की तरफ़ से आप क्यूँ गुज़रे
ये बच्चे की तमन्ना है ये समझौता नहीं करती
- मुनव्वर राना



खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे
तुझे ऐ मुफ़्लिसी कोई बहाना ढूँढ लेना है
- मुनव्वर राना



दौलत से मोहब्बत तो नहीं थी मुझे लेकिन
बच्चों ने खिलौनों की तरफ़ देख लिया था
- मुनव्वर राना



निकलने ही नहीं देती हैं अश्कों को मिरी आँखें
कि ये बच्चे हमेशा माँ की निगरानी में रहते हैं
- मुनव्वर राना



फ़रिश्ते आ कर उन के जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं
- मुनव्वर राना



बच्चों की फ़ीस उन की किताबें क़लम दवात
मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया
- मुनव्वर राना



बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सब से कह रही है कि बेटा मज़े में है
- मुनव्वर राना



भले लगते हैं स्कूलों की यूनिफार्म में बच्चे
कँवल के फूल से जैसे भरा तालाब रहता है
- मुनव्वर राना



मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी
तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई
- मुनव्वर राना



मुझे भी उस की जुदाई सताती रहती है
उसे भी ख़्वाब में बेटा दिखाई देता है
- मुनव्वर राना



मेरे बच्चे नामुरादी में जवाँ भी हो गये
मेरी ख़्वाहिश सिर्फ़ बाज़ारों को तकती रह गयी
- मुनव्वर राना



मैं हूँ, मेरा बच्चा है , खिलौनों की दुकाँ है
अब मेरे पास बहाना भी नहीं है
- मुनव्वर राना



ये फितरत का तकाजा है सज़ा देने से क्या हासिल
कि ज़िद करते है बच्चे जब गुब्बारा देख लेते है
- मुनव्वर राना



ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ
इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा
- मुनव्वर राना



शर्म आती है मजदूरी बताते हुए हमको
इतने में तो बच्चे का गुब्बारा नहीं मिलता
- मुनव्वर राना



कदमो पे ला के डाल दी सब नैमते मगर,
सौतेली माँ को बच्चो से नफरत वही रही
- मुनव्वर राना



रेत पर खेलते बच्चो को अभी क्या मालूम
कोई सैलाब घरोंदा नहीं रहने देता
- मुनव्वर राना



दौरे तरक्की में बच्चों को आसाईश हैं हम से ज्यादा,
अलबत्ता इस दौर का बच्चा बूढ़ा जल्दी हो जाता है |
बाहर क्या अपने घर में भी हद से बढ कर पाबन्दी पर,
बेटी सरकश हो जाती है बेटा बागी हो जाता है |
- मुज़फ़्फ़र हनफ़ी



मिरे बच्चे तिरा बचपन तो मैं ने बेच डाला
बुज़ुर्गी ओढ़ कर काँधे तिरे ख़म हो गए हैं
- मुसव्विर सब्ज़वारी



मुझ को थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
- मेराज फ़ैज़ाबादी



दिन भर बच्चों ने मिल कर पत्थर फेंके फल तोड़े
साँझ हुई तो पंछी मिल कर रोने लगे दरख़्तों पर
- मोहम्मद अल्वी



मुँह-ज़बानी क़ुरआन पढ़ते थे
पहले बच्चे भी कितने बूढ़े थे
- मोहम्मद अल्वी



लोग कहते हैं कि मुझ सा था कोई
वो जो बच्चों की तरह रोया था
- मोहम्मद अल्वी



वो अक्सर दिन में बच्चों को सुला देती है इस डर से
गली में फिर खिलौने बेचने वाला न आ जाए
- मोहसिन नक़वी



बच्चे ने तितली🦋 पकड़ कर छोड़ दी
आज मुझ को भी ख़ुदा अच्छा लगा
- नज़ीर क़ैसर



भूके बच्चों की तसल्ली के लिए
माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
- नवाज़ देवबंदी



जब भी लौटा गाँव के बाज़ार से
मुझ को सब बच्चों ने देखा प्यार से
- नवाब अहसन



अब तक हमारी उम्र का बचपन नहीं गया
घर से चले थे जेब के पैसे गिरा दिए
- नश्तर ख़ानक़ाही



घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया😊 जाए
- निदा फ़ाज़ली



जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया
- निदा फ़ाज़ली



बच्चा बोला देख कर मस्जिद आली-शान
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान
- निदा फ़ाज़ली



बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे
- निदा फ़ाज़ली



बड़ी हसरत से इंसाँ बचपने को याद करता है
ये फल पक कर दोबारा चाहता है ख़ाम हो जाए
- नुशूर वाहिदी



ख़याली दोस्तों के अक्स से खेलोगे कब तक
मेरे बच्चे कभी मिल लो भरे घर में किसी से
- नोमान शौक़



बच्चों को हम न एक खिलौना भी दे सके
ग़म और बढ़ गया है जो त्यौहार आए हैं
- ओबैदुर रहमान



शोख़ी किसी में है न शरारत है अब 'उबैद'
बच्चे हमारे दौर के संजीदा हो गए
- ओबैदुर रहमान



आ गया वह फिर खिलौने बेचने
सारे बच्चों को रुलाकर जाएगा
- ओम प्रकाश यती



उस के बच्चे नहीं थकते मुझे मामूँ कहते
जिस की जानिब मिरा रुज्हान था अच्छा-ख़ासा
- ओसामा मुनीर



जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें
बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए
- परवीन शाकिर



तितलियाँ🦋 पकड़ने में दूर तक निकल जाना
कितना अच्छा लगता है फूल जैसे बच्चों पर
- परवीन शाकिर



तनख्वा दूर, खिलौनों की ज़िद और बहाने बचे नहीँ
आज देर से घर जाउंगा बच्चे जब सो जायेंगे
- पवन दीक्षित



वो बेशक न सुने बूढ़े बाप की अपने
पर टालता नहीं कभी औलाद की बात
- प्रदीप तिवारी



और कुछ यूँ हुआ कि बच्चों ने
छीना-झपटी में तोड़ डाला मुझे
- रसा चुग़ताई



उसे हम पर तो देते हैं मगर उड़ने नहीं देते
हमारी बेटी बुलबुल है मगर पिंजरे में रहती है
- रहमान मुसव्विर



दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं
- राजेश रेड्डी



दिल भी बच्चे की तरह ज़िद पे अड़ा था अपना
जो जहाँ था ही नहीं उस को वहीं ढूँढना था
- राजेश रेड्डी



मेरे दिल के किसी कोने में, एक मासूम सा बच्चा,
बडो की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है |
- राजेश रेड्डी



शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
- राजेश रेड्डी



मेरी अल्लाह से बस इतनी दुआ है 'राशिद'
मैं जो उर्दू में वसीयत लिखूँ बेटा पढ़ ले
- राशिद आरफ़ी



अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूँ
जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला
- राशिद राही



अटा है शहर बारूदी धुएँ से
सड़क पर चंद बच्चे रो रहे हैं
- रासिख़ इरफ़ानी



मेरे बच्चो मुझे दिल खोल के खर्च करो,
मै अकला ही कमाने के लिए काफी हूँ
- राहत इंदौरी



कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिए
चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है
- राहत इंदौरी



जो भीक माँगते हुए बच्चे के पास था
उस कासा-ए-सवाल ने सोने नहीं दिया
- रेहाना रूही



तो क्या हुआ जो जन्मी थी परदेस में कभी
बेटी है 'अर्शिया' भी तो हिन्दोस्तान की
- सय्यदा अरशिया हक़



कैसी सुहानी कैसी रसीली बच्चों की मुस्कान
हँसते और मुस्काते बच्चे भारत देस की शान
- सय्यदा फ़रहत



कुएँ की सम्त बुला ले न कोई ख़्वाब मुझे
मैं अपने बाप का सब से हसीन बेटा हूँ
- सरफ़राज़ ज़ाहिद



तिलिस्म तोड़ दिया इक शरीर बच्चे ने
मिरा वजूद उदासी का इस्तिआरा था
- सरफ़राज़ दानिश



सुरूर-ए-जाँ-फ़ज़ा देती है आग़ोश-ए-वतन सब को
कि जैसे भी हों बच्चे माँ को प्यारे एक जैसे हैं
- सरफ़राज़ शाहिद



मोहल्ले वाले मेरे कार-ए-बे-मसरफ़ पे हँसते हैं
मैं बच्चों के लिए गलियों में ग़ुब्बारे बनाता हूँ
- सलीम अहमद



देवता मेरे आँगन में उतरेंगे कब ज़िंदगी भर यही सोचता रह गया
मेरे बच्चों ने तो चाँद को छू लिया और मैं चाँद को पूजता रह गया
- साग़र आज़मी



वस्ल को माँ के तरसते हैं मिरे बच्चे भी
कैफ़ियत हिज्र की मुझ पर ही नहीं तारी है
- साबिर आफ़ाक़



अभी शरारत करने दो इन बच्चो को
उम्र बढ़ेगी चंचल कम हो जाएंगे
- सतलज राहत



शायरी फूल खिलाने के सिवा कुछ भी नहीं है तो 'ज़फ़र'
बाग़ ही कोई लगाता कि जहाँ खेलते बच्चे जा कर
- साबिर ज़फ़र



किताबों से निकल कर तितलियाँ🦋 ग़ज़लें सुनाती हैं
टिफ़िन रखती है मेरी माँ तो बस्ता मुस्कुराता है
- सिराज फ़ैसल ख़ान



अपने ख़ून से इतनी तो उम्मीदें हैं
अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे
- शकील जमाली



अब काम दुआओं के सहारे नहीं चलते
चाबी न भरी हो तो खिलौने नहीं चलते
- शकील जमाली



अब खेल के मैदान से लौटो मेरे बच्चो
ता उम्र बुजुर्गों के असासे नहीं चलते
- शकील जमाली



कोई स्कूल की घंटी बजा दे,
ये बच्चा मुस्कुराना😊 चाहता है |
- शकील जमाली



दुःख का पहला पाठ पढ़ाया ग़ुरबत ने
कल बच्चे ने छुआ नहीं गुब्बारे को
- शकील जमाली



मैंने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग
अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए
- शकील जमाली



मौत को हम ने कभी कुछ नहीं समझा मगर आज
अपने बच्चों की तरफ़ देख के डर जाते हैं
- शकील जमाली



ये सरकशी कहाँ है हमारे ख़मीर में,
लगता है अस्पताल में बच्चे बदल गये |
- शकील जमाली



अभी से छोटी हुई जा रही हैं दीवारें
अभी तो बेटी ज़रा सी मिरी बड़ी हुई है
- शबाना यूसुफ़



हालात 'शहाब' आँख उठाने नहीं देते
बच्चों को मगर ईद मनाने की पड़ी है
- शहाब सफ़दर



कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था
खेल में भी तो आधा आधा आँगन था
- शारिक़ कैफ़ी



अजब क्या है जो नौ-ख़ेज़ों ने सब से पहले जानें दीं
कि ये बच्चे हैं इन को जल्द सो जाने की आदत है
- शिबली नोमानी



सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है
इस लिए बच्चे ने काग़ज़ पे घरौंदा लिख्खा
- शीन काफ़ निज़ाम



फिर कोइ बच्चा, बडा हो रहा है, कान्धो के ऊपर, खडा हो रहा है
गया था जमात मे, वो इल्म लेने, दोस्तो से वो, बदगुमा हो गया है
- श्याम बिस्वानी



बच्चो को सभी माफ़, बच्चो का क्या, काज़ी पे कोई, सज़ा ही नही
जहाने अदालत मे, वो काज़ी नही, बच्चो कि गलती, पे फासी नही
- श्याम बिस्वानी



सातों आलम सर करने के बा'द इक दिन की छुट्टी ले कर
घर में चिड़ियों के गाने पर बच्चों की हैरानी देखो
- शुजा ख़ावर



मैं अपने बचपने में छू न पाया जिन खिलौनों को
उन्ही के वास्ते अब मेरा बेटा भी मचलता है
- तनवीर सिप्रा



रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं
अश्क बच्चों की तरह घर से निकल जाते हैं
- तौक़ीर तक़ी



वक़्त बदला सोच बदली बात बदली
हम से बच्चे कह रहे हैं हम नए हैं
- उबैद हारिस



अपनी - अपनी ज़िद पे अड़ने को हुए बच्चे जवाँ
और बुज़ुर्गों का मकाँ नादानियों में बँट गया
- वसीम बरेलवी



घरों की तरबीयत क्या आ गयी टी वी के हाथों में
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता
- वसीम बरेलवी



तेरे ख़्याल के हाथों कुछ ऐसा बिखरा हूँ
कि जैसे बच्चा किताबे इधर -उधर कर दे
- वसीम बरेलवी



नयी कॉलोनी में बच्चों की जिदें ले तो गयीं
बाप -दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ
- वसीम बरेलवी



जो बेशुमार दिलो की नजर में रहता है
वह अपने बच्चो को एक घर न दे सका यारो
- वसीम बरेलवी



कैसे बच्चो को बताऊ रास्तो के पेचो-ख़म
जिन्दगी भर तो किताबो का सफ़र मैंने किया
- वसीम बरेलवी



फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे
मिट भी जाएँगे तो हम इक दास्ताँ हो जाएँगे
- वाली आसी



खूँटी पर ईमान तक , दिया बाप ने टांग।
फिर भी बाकी रह गई , बच्चों की कुछ माँग।
- विजेँद्र शर्मा



मेहनत कर के हम तो आख़िर भूके भी सो जाएँगे
या मौला तू बरकत रखना बच्चों की गुड़-धानी में
- विलास पंडित मुसाफ़िर



रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल
मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए
- ज़फ़र गोरखपुरी



किसी बच्चे से पिंजरा खुल गया है
परिंदों की रिहाई हो रही है
- ज़िया ज़मीर



जब बच्चों को देखता हूँ तो सोचता हूँ
मालिक इन फूलों की उम्र दराज़ करे
- ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क


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