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बरसो हे सावन मनभावन - कृष्ण मुरारी पहारिया

बरसो हे सावन मनभावन बरसो हे सावन मनभावन धरती को कर दो वृन्दावन रचो आस के रास हृदय में गाकर म्रुदु गर्जन की लय में उबरें मन डूबे संशय में आओ हे सुधियों के धावन हर लो तीनों ताप मनुज के मिटें कष्ट मानस के रुज के हों निर्बन्ध पराक्रम भुज के …

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है - निदा फाजली

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने किस राह से बचन…

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की - परवीन शाकिर

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की …

यह सावन है - क़तील शिफ़ाई

यह सावन है यह सावन है मन भावन है छा जाये तो ढमढम ढोल बजे बरसे तो छनकती झाँझन है ये अपने प्यार के छींटों से मन-धरती को जल-थल कर दे जो धड़कन हो मुरझाई, उस धड़कन को चंचल कर दे ये बरसा है मुझ पर जब से मन मेरा गुलशन-गुलशन है यह सावन है मन भावन है…

बादलों की तरह बारिश की कहानी में रहो - शकील आज़मी

बादलों की तरह बारिश की कहानी में रहो बादलों की तरह बारिश की कहानी में रहो तुम मिरा ग़म हो मिरी आँख के पानी में रहो मुझको मालूम है तुम इश्क़ नहीं कर सकते तो हवस बनके मिरे जिस्म के मानी में रहो दोस्ती तुम से दोबारा तो नहीं हो सकती तुम मिरे साथ…

किस कदर नादानियां दिन रात कर जाते हैं लोग - रुखसाना सिद्दीकी

किस कदर नादानियां दिन रात कर जाते हैं लोग किस कदर नादानियां दिन रात कर जाते हैं लोग ज़ख्म देते है दवा की बात कर जाते हैं लोग आंखों में बस जाते हैं वो रोज़ काजल की तरह बिन किसी मौसम के भी बरसात कर जाते हैं लोग अब हमें रुसवाइयों का ख़ौफ़ क्योंकर हो…

सारे मौसम बदल गए शायद - अलीना इतरत

सारे मौसम बदल गए शायद सारे मौसम बदल गए शायद और हम भी सँभल गए शायद झील को कर के माहताब सुपुर्द अक्स पा कर बहल गए शायद एक ठहराव आ गया कैसा ज़ाविए ही बदल गए शायद अपनी लौ में तपा के हम ख़ुद को मोम बन कर पिघल गए शायद काँपती लौ क़रार पाने लगी…

उसका अंदाज है अभी तक लड़कपन वाला - कैफ़ भोपाली

उसका अंदाज है अभी तक लड़कपन वाला उसका अंदाज है अभी तक लड़कपन वाला मीठा लगता है उसे नीम वो आँगन वाला अब भी मेरे लिए चिलमन से निकल आता है सावला फूल सा इक हाथ वो कंगन वाला बिजलियाँ आँखों की जुल्फों की घटाए लेकर तुम चले आओ तो मौसम रहे सावन वाला …

कुछ तो रात का ग़म था लोगों कुछ मेरी तन्हाई थी - रुखसाना सिद्दीकी

कुछ तो रात का ग़म था लोगों कुछ मेरी तन्हाई थी कुछ तो रात का ग़म था लोगों कुछ मेरी तन्हाई थी दिल तो मेरा अपना ही था लेकिन प्रीत पराई थी अबके बरस ये कैसा मौसम कैसी रूत ये आई थी बाहर सावन बरस रहा था अंदर मैं भर आई थी। रस्ता जिसका तकते–तकते सावन सा…

कितना अच्छा था वह बचपन - अतीक इलाहाबादी

कितना अच्छा था वह बचपन उनके आँगन बरसा सावन गिनना छोडो दिल की धडकन उसके आंसू मेरा दामन गम है लाज़िम कैसी उलझन उनके चर्चे गुलशन गुलशन बस्ती में है घर-घर रावन कितना अच्छा था वह बचपन - अतीक इलाहाबादी kitna achcha tha wah bachpan u…

बरसते हुए सावन में - बदनाम शायर वरुण मित्तल

बरसते हुए सावन में बरसते हुए सावन में आज वो पुराने दरख्त टूट गए वो जिनकी तन्हाइयो की छाया में कई राहगीरों की रहगुजर थी वो जिनके बिखरे साये में किसी के बचपन की कहानिया थी पर बरसते हुए सावन में आज वो पुराने दरख़्त टूट गए मैंने देखा था कितनी…

पाकर चन्दन तन की खुशबू - चाँद शेरी

पाकर चन्दन तन की खुशबू पाकर चन्दन तन की खुशबू महकी घर आँगन की खुशबू लेकर आई रुत मतवाली अधरों से चुम्बन की खुशबू मीरा के गीतों-छंदों से आती है मोहन की खुशबू माँ के उस पावन आँचल में है मेरे बचपन की खुशबू सूखे बरगद से भी एक दिन आएगी सावन…

हवाए दिलसिता जब राग सावन के सुनाती है - जोश मलीहाबादी

हवाए दिलसिता जब राग सावन के सुनाती है हवाए दिलसिता जब राग सावन के सुनाती है किसी काफ़िर की जब रह-रह के दिल में याद आती है सिमट जाती है, जब बिजली दिखा कर अब्र से झलकी फलक पर दफ़तन जब सांस रुक जाती है बदल की मअन एक हूर इस रोजन में आ कर मुस्कुरा…

ख़त है या बदलती रूत, या गीतों भरा सावन - निदा फ़ाज़ली

ख़त है या बदलती रूत, या गीतों भरा सावन ख़त है या बदलती रूत, या गीतों भरा सावन इठलाती हुई गलिया, शरमाते हुए आँगन शीशे-सा धुला चौका, मौती से चुने बर्तन खिलता हुआ एक चेहरा, हँसते हुए सौ दर्पण सिमटी हुई चौखट पर, कुछ धुप गिलहरी सी नींबू की क्यार…

सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी - क़तील शिफ़ाई

सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी, बे-पंख उड़ाने लेती है, जो अपने ही आँचल जैसी ! लाया है बना कर उसको दुल्हन, ये जोबन, ये अलबेलापन, इस उम्र में सर से पाव तक लगती है ताजमहल जैसी ! चहरे प…

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