qateel-shifai

यह सावन है - क़तील शिफ़ाई

यह सावन है यह सावन है मन भावन है छा जाये तो ढमढम ढोल बजे बरसे तो छनकती झाँझन है ये अपने प्यार के छींटों से मन-धरती को जल-थल कर दे जो धड़कन हो मुरझाई, उस धड़कन को चंचल कर दे ये बरसा है मुझ पर जब से मन मेरा गुलशन-गुलशन है यह सावन है मन भावन है…

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको - क़तील शिफ़ाई

अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझ को मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझ से बचा कर दामन मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझ को तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़स…

दीपावली पर बेहतरीन शायरी

दीपो के पर्व दिवाली / दीपावली पर शायरो के कुछ अशआर कुछ ग़रीबों की गली में भी दिए जल जाएँ इस से बेहतर भी दिवाली का उजाला क्या है - अजय सहाब आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ - अज़्म शाकरी था इंतिज़ार मनाएँगे मि…

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह - क़तील शिफ़ाई

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह! दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह! फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह! मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह! सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह! य…

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं - क़तील शिफ़ाई

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद बेकार महफ़िलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं मैं ख़ुदकशी के जुर्म का करता हूँ ऐतराफ…

न कोई ख्वाब हमारे है, न ताबीरे है - क़तील शिफ़ाई

न कोई ख्वाब हमारे है, न ताबीरे है न कोई ख्वाब हमारे है, न ताबीरे है हम तो पानी पे बनाई हुई तस्वीरे है लुट गए मुफ्त में दोनों, तिरी दौलत मिरा दिल ए सखी ! तेरी-मेरी एक सी तकदीरे है कोई अफवाह गला काट न डाले अपना ये जुबाने है कि चलती हुई शमशी…

शाम के सावले चेहरे को निखारा जाए - क़तील शिफ़ाई

शाम के सावले चेहरे को निखारा जाये शाम के सावले चेहरे को निखारा जाये क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई फिर प्यास को दरिया में उतारा जाये अब मेरे शहर आएगी सवारी किसकी अब किस उम्मीद पे रहो को सवारा जाये मेह…

सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी - क़तील शिफ़ाई

सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी सावन के सुहाने मौसम में इक नार मिली बादल जैसी, बे-पंख उड़ाने लेती है, जो अपने ही आँचल जैसी ! लाया है बना कर उसको दुल्हन, ये जोबन, ये अलबेलापन, इस उम्र में सर से पाव तक लगती है ताजमहल जैसी ! चहरे प…

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