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दीपावली पर कुछ अशआर

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दीपो के पर्व दीपावली / दिवाली पर शायरो के कुछ अशआर : अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको - मुनव्वर...


दीपो के पर्व दीपावली / दिवाली पर शायरो के कुछ अशआर :

अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे
रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको - मुनव्वर राना

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रो रहा था गोद में अम्माँ की इक तिफ़्ल-ए-हसीं
इस तरह पलकों पे आँसू हो रहे थे बे-क़रार

जैसे दिवाली की शब हल्की हवा के सामने
गाँव की नीची मुंडेरों पर चराग़ों की क़तार - एहसान दानिश

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मुझ को ख़्वाहिश है उसी शान की दिवाली की
लक्ष्मी देश में उल्फ़त की शब-ओ-रोज़ रहे

देश को प्यार से मेहनत से सँवारें मिल कर
अहल-ए-भारत के दिलों में ये 'कँवल' सोज़ रहे - कँवल डिबाइवी

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happy diwali shayari nazeer banarasi

हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का

सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का - नज़ीर अकबराबादी

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दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है
सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायाँ है शय - नज़ीर अकबराबादी 

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है दसहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'
पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है  - नज़ीर अकबराबादी

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है दिवाली-मिलन में ज़रूरी 'नज़ीर'
हाथ मिलने से पहले दिलों का मिलन - नजीर बनारसी

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दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है
सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायाँ है शय -  नजीर बनारसी

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है दशहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'
पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है - नजीर बनारसी

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घुट गया अँधेरे का आज दम अकेले में
हर नज़र टहलती है रौशनी के मेले में- नजीर बनारसी

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मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है
ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है- नजीर बनारसी

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तमन्नाओं की पामाली रहेगी
जलेंगे अश्क दिवाली रहेगी -  डा.असलम इलाहाबादी

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अब जिसके जी में आए वही पाए रौशनी
हमने तो दिल जला के सरे-आम रख दिया - क़तील शिफ़ाई 

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दिल है गोया चराग किसी मुफलिस का
शाम ही से बुझा सा रहता है - मीर तकी मीर

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बू-ए-गुल, नालह-ए-दिल, दूद-ए-चिराग़-ए-मह्‌फ़िल
जो तिरी बज़्म से निकला सो परेशां निकला - मिर्ज़ा गा़लिब

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यह नर्म नर्म हवा, झिलमिला रहे हैं चराग़
तेरे ख्याल की खुश्बू से बस रहे हैं दिमाग़ – फ़िराक गोरखपुरी 

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नई हुई फिर रस्म पुरानी दिवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दिवाली के दीप जले

धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के
लहराये वो आंचल धानी दिवाली के दीप जले - फ़िराक गोरखपुरी

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मेरे साथ जुगनू है हमसफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या
ये चिराग़ कोई चिराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ - बशीर बद्र

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कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चराग मय्यसर नहीं शहर के लिए – दुष्यंत कुमार

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दिल में दिए जला के अंधेरे में जीना सीख
बुझते हुए चिराग़ का मातम फ़ुज़ूल है - कौसर सद्दीकी

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कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा
कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तो  - अहमद फ़राज़

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हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना.
रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन - अहमद फ़राज़

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आज की शब ज़रा ख़ामोश रहें सारे चराग़
आज महफिल में कोई शम्अर फ़रोजां होगी - नुसरत मेंहदी

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कहने को हर धर्म जुदा है
लेकिन सब का एक ख़ुदा है
इक माटी के पुतले 'हैदर'

इस साँचे में ख़ूब ढले हैं
दीवाली के दीप जले हैं - हैदर बयाबानी

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दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
यह इक चिराग़ कई आँधियों पे भारी है - वसीम बरेलवी

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जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग का अपना मकां नहीं होता - वसीम बरेलवी

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ये किस मुक़ाम पे ले आई जुस्तजू तेरी
कोई चिराग़ नहीं और रोशनी है बहुत - कृष्ण बिहारी नूर

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मेरे मन की अयोध्या में न जाने कब हो दिवाली
अभी तो झलकता है राम का बनवास आँखों में - साग़र पालमपुरी

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यही चिराग़ जो रोशन है बुझ भी सकता था
भला हुआ कि हवाओं का सामना न हुआ - महताब हैदर नक़बी

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हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चिराग़
अब तिरी राहगुज़र, राहगुज़र लगती है - जां निसार अख्तर

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हमने उन तुन्द हवाओं में जलाये हैं चिराग़
जिन हवाओं ने उलट दी हैं बिसातें अक्सर - जां निसार अख्तर

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तूने जलाईं बस्तियाँ ले-ले के मशअलें
अपना चराग़ अपने ही हाथों बुझा के देख.- देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

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रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिए जिया - चिराग जैन

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अंधेरे जश्न मनाने की भूल करते हैं
चिराग़ अब भी हवाओं पे वार करता है- इसहाक़ असर इन्दौरी

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जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को,
सौ चिराग़ अँधेरे में झिलमिलाने लगते हैं - कैफ़ी आज़मी

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चिराग़ हो कि ना हो, दिल जला के रखते हैं
हम आंधियों में भी तेवर बला के रखते हैं मिला - हस्तीमल हस्ती

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कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल
चिराग़-ए-सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ  - इकबाल

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इस एक ज़ौम में जलते हैं ताबदार चराग़
हवा के होश उड़ाएँगे बार - बार चराग़ - बुनियाद हुसैन ज़हीन

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उदास उदास शाम में धुआं धुआं चराग हैं
हमें तेरे ख्याल में मिली फकत चुभन चुभन  - मरयम गजाला

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उन्हें चिराग़ कहाने का हक़ दिया किसने
अँधेरों में जो कभी रौशनी नहीं देते  - द्विजेंद्र द्विज

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आज बिखरी है हवाओं में चरागों की महक
आज रौशन है हवा चाँद-सितारों की तरह - सतपाल ख़याल

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आँखों के चराग़ों मे उजाले न रहेंगे
आ जाओ कि फिर देखने वाले न रहेंगे- खुमार बाराबंकवी

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आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं
आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ- अज़्म शाकरी

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बीस बरस से इक तारे पर मन की जोत जगाता हूँ
दिवाली की रात को तू भी कोई दिया जलाया कर - माजिद-अल-बाक़री 

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हस्ती का नज़ारा क्या कहिए मरता है कोई जीता है कोई
जैसे कि दिवाली हो कि दिया जलता जाए बुझता जाए - नुशूर वाहिदी 

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होने दो चराग़ाँ महलों में क्या हम को अगर दिवाली है
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम मज़दूर की दुनिया काली है -जमील मज़हरी

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जल बुझूँगा भड़क के दम भर में
मैं हूँ गोया दिया दिवाली का  - नादिर शाहजहाँपुरी

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जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दशहरा है
हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं - जमुना प्रसाद राही 

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खिड़कियों से झाँकती है रौशनी
बत्तियाँ जलती हैं घर घर रात में - मोहम्मद अल्वी 

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मेले में गर नज़र न आता रूप किसी मतवाली का
फीका फीका रह जाता त्यौहार भी इस दिवाली का - मुमताज़ गुर्मानी

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प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना
एक भी शम्अ न रौशन हो हवा के डर से  - शकेब जलाली

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राहों में जान घर में चराग़ों से शान है
दीपावली से आज ज़मीन आसमान है - ओबैद आज़म आज़मी

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सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या - हफ़ीज़ बनारसी

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था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दिवाली
न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ - आनिस मुईन 

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वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक़ था
दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से - कैफ़ भोपाली

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'आली' अब के कठिन पड़ा दिवाली का त्यौहार
हम तो गए थे छैला बन कर भय्या कह गई नार  -जमीलुद्दीन आली

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झुटपुटे के वक़्त घर से एक मिट्टी का दिया
एक बुढ़िया ने सर-ए-रह ला के रौशन कर दिया – अल्ताफ हुसैन हाली

Note: ऊपर दिए गए अशआर सिर्फ एक कोशिश थी अगर कुछ अशआर छूट गए हो तो कृपया जरुर अवगत कराये |

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जखीरा, साहित्य संग्रह: दीपावली पर कुछ अशआर
दीपावली पर कुछ अशआर
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