अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें - अहमद फ़राज़
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार …