फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो - जाँ निसार अख्तर
फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो ये न सोचो कि अभी उम्र पड़ी है यारो अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको ज़िन्दगी शम्अ लिए दर पे खड़ी है यारो हमने सदियों इन्हीं ज़र्रो से मोहब्बत की है चाँद-तारों से तो क…