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फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो - जाँ निसार अख्तर

फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो ये न सोचो कि अभी उम्र पड़ी है यारो अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको ज़िन्दगी शम्अ लिए दर पे खड़ी है यारो हमने सदियों इन्हीं ज़र्रो से मोहब्बत की है चाँद-तारों से तो क…

मौज-ए-गुल, मौज-ए-सबा, मौज-ए-सहर लगती है - जाँ निसार अख्तर

मौज-ए-गुल, मौज-ए-सबा, मौज-ए-सहर लगती है मौज-ए-गुल, मौज-ए-सबा, मौज-ए-सहर लगती है सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है हमने हर गाम सजदों ए जलाये हैं चिराग़ अब तेरी राहगुज़र राहगुज़र लगती है लम्हे लम्हे बसी है तेरी यादों की महक आज की रात तो ख…

पिछली प्रीत - जाँ निसार अख्तर

पिछली प्रीत हवा जब मुंह अँधेरे प्रीत की बंसी बजाती है कोई राधा किसी पनघट के ऊपर गुनगुनाती है मुझे इक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है उफ़क पर आसमान झुककर ज़मीं को प्यार करता है ये मंज़र एक सोई याद को बेदार करता है मुझे एक बार फिर अपनी मोहब्बत य…

आवाज़ दो हम एक हैं - जाँ निसार अख़्तर

आवाज़ दो हम एक हैं एक है अपनी ज़मीं ,एक है अपना गगन एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं आवाज़ दो हम एक हैं ये वक़्त खोने का नहीं, ये वक़्त सोने का नहीं जागो वतन खतरे में है, सारा चमन खतरे में है फूलों के …

दर्दे-दिल, दर्दे-वफ़ा, दर्दे-तमन्ना क्या है - जाँ निसार अख़्तर

दर्दे-दिल, दर्दे-वफ़ा, दर्दे-तमन्ना क्या है दर्दे-दिल, दर्दे-वफ़ा, दर्दे-तमन्ना क्या है आप क्या जानें मोहब्बत का तकाज़ा क्या है बेमुरव्वत बेवफ़ा बेगाना-ए-दिल आप हैं आप माने या न माने मेरे क़ातिल आप हैं बेमुरव्वत बेवफ़ा ... आप से शिकवा है मुझ को ग़ै…

कौन कहता है तुझे मैंने भुला रखा है - जाँ निसार अख्तर

कौन कहता है तुझे मैंने भुला रखा है कौन कहता है तुझे मैंने भुला रखा है तेरी यादों को कलेजे से लगा रखा है लब पे आहें भी नहीं आँख में आँसू भी नहीं दिल ने हर राज़ मुहब्बत का छुपा रखा है तूने जो दिल के अंधेरे में जलाया था कभी वो दिया आज भी सीने …

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है - जाँ निसार अख्तर

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है …

मेरे मेहमान - मजाज़ लखनवी -2

मेरे मेहमान - मजाज़ लखनवी -2 इसकी पिछली कड़ी आप यहाँ पढ़ सकते है | जो लोग मजाज़ को उसकी बेरोजगारी के लिए निशाना बनाते है, वो नहीं जानते की इस बेरोजगारी के पीछे उसकी नाकाम जद्दोजहद की कटनी लंबी दास्तान है | उसने कई मुलाज़मते की, लेकिन मुलाज़मत की …

मेरा मेहमान मजाज़

मेरा मेहमान मजाज़ यादे याद रह जाती है और यही हमें कुछ वक्त के बाद सताती है, रुलाती है और चेहरे पर मुस्कराहट का कारण भी बन जाती है कुछ इसी तरह की यादे जाँनिसार अख्तर साहब इस लेख में बता रहे है अपने अज़ीज़ दोस्त मजाज़ लखनवी के बारे में... ये सन 45 की…

रुखो के चाँद, लबो के गुलाब मांगे है - जाँ निसार अख़्तर

रुखो के चाँद, लबो के गुलाब मांगे है रुखो के चाँद, लबो के गुलाब मांगे है बदन की प्यास बदन की शराब मांगे है मै कितने लम्हे न जाने कहा गवा आया तेरी निगाह तो सारा हिसाब मांगे है मै किस से पूछने जाऊ की आज हर कोई मेरे सवाल का मुझ से जवाब मांगे ह…

चौंक चौंक उठती है महलों की फिजा रात गए - जाँ निसार अख़्तर

चौंक चौंक उठती है महलों की फिजा रात गए चौंक चौंक उठती है महलों की फिजा रात गए कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए ये हकाइक की चट्टानों से तराशी दुनिया ओढ़ लेती है तिलिस्मो की रिदा रात गए चुभ के रह जाती है सीने में बदन की खुशबु खोल देता है क…

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