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सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है - असरार-उल-हक़ मजाज़

सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है आज किन हाथों में दिल का साज़ है तू जहाँ है ज़मज़मा-पर्दाज़ है दिल जहाँ है गोश-बर-आवाज़ है हाँ ज़रा जुरअत दिखा ऐ जज़्ब-ए-दिल हुस्न को पर्दे पे अपने नाज़ है हम-नशीं दिल की हक़ीक़त क्या कहूँ …

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं - असरार-उल-हक़ मजाज़

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह तुम्हारा …

बोल! अरी ओ धरती बोल! - असरार-उल-हक़ मजाज़ लखनवी

बोल! अरी ओ धरती बोल! बोल! अरी ओ धरती बोल! राज सिंघासन डाँवाडोल बादल, बिजली, रैन, अँधयारी, दुख की मारी प्रजा सारी, बूढ़े बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं दुखिया नारी, बस्ती बस्ती लूट मची है, सब बनिए हैं सब ब्योपारी, बोल! अरी ओ धरती बोल!…

खूब पहचान लो असरार हूँ मै - मजाज़ लखनवी

खूब पहचान लो असरार हूँ मै खूब पहचान लो असरार हूँ मै जीन्स-ए-उल्फत का तलबगार हूँ मै इश्क ही इश्क है दुनिया मेरी फितना-ए-अक्ल से बेज़ार हूँ मै छेड़ती है जिसे मिजराब-ए-आलम साज़-ए-फितरत का वही तार हूँ मै ऐब जो हाफ़िज़-ओ- ख्य्याम में था हां कुछ इस…

खूब पहचान लो असरार हूँ मै लेख

खूब पहचान लो 'असरार' हूँ मै लेख यह लेख मजाज़ पर लिखी गयी किताब मजाज़ और उनकी शायरी का एक अंश है आधुनिक शायरी का यह प्रिय शायर 19 अक्टूम्बर सन 1911 में अवध के एक प्रसिद्द कस्बे रदौली में पैदा हुआ | पिता सिराजुल हक रदौली के पहले व्यक्ति थे जि…

हमारा झंडा - मजाज़ लखनवी

हमारा झंडा शेर हैं चलते हैं दर्राते हुए बादलों की तरह मंडलाते हुए ज़िंदगी की रागिनी गाते हुए आज झंडा है हमारे हाथ में हाँ यह सच है भूक से हैरान हैं पर यह मत समझो कि हम बेजान हैं इस बुरी हालत में भी तूफ़ान हैं आज झंडा है हमारे हाथ में हम वह ह…

नन्ही पुजारन - मजाज़ लखनवी

नन्ही पुजारन मजाज़ साहब की एक ऐसी नज़्म जिसे महात्मा गांधी भी पसंद करते थे और मजाज़ ने उनके सामने यह नज्म पढ़ी थी । एक नन्ही मुन्नी सी पुजारन पतली बाहें, पतली गर्दन भोर भये मंदिर आई है आई नहीं है, माँ लायी है वक़्त से पहले जाग उठी है नींद भी आ…

मेरे मेहमान - मजाज़ लखनवी -2

मेरे मेहमान - मजाज़ लखनवी -2 इसकी पिछली कड़ी आप यहाँ पढ़ सकते है | जो लोग मजाज़ को उसकी बेरोजगारी के लिए निशाना बनाते है, वो नहीं जानते की इस बेरोजगारी के पीछे उसकी नाकाम जद्दोजहद की कटनी लंबी दास्तान है | उसने कई मुलाज़मते की, लेकिन मुलाज़मत की …

मेरा मेहमान मजाज़

मेरा मेहमान मजाज़ यादे याद रह जाती है और यही हमें कुछ वक्त के बाद सताती है, रुलाती है और चेहरे पर मुस्कराहट का कारण भी बन जाती है कुछ इसी तरह की यादे जाँनिसार अख्तर साहब इस लेख में बता रहे है अपने अज़ीज़ दोस्त मजाज़ लखनवी के बारे में... ये सन 45 की…

हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था - मजाज़ लखनवी

हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था ख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा था तिरी नीची नज़र ख़ुद तेरी इस्मत की मुहाफ़िज़ है तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था तिरी चीन-ए-जबी…

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