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बाक़ी कविता - कुंवर नारायण

बाक़ी कविता पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है। जीवन को पूरी तरह पाने और पूरी तरह दे जाने के बीच एक पूरा मृत्यु-चिह्न है। बाक़ी कविता शब्दों से नहीं लिखी जाती, पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह कहीं भी…

कुछ ऐसे भी यह दुनिया जानी जाती है - कुँवर नारायण

कुछ ऐसे भी यह दुनिया जानी जाती है पागल-से, लुटे-लुटे, जीवन से छुटे-छुटे ऊपर से सटे-सटे, अंदर से हटे-हटे, कुछ ऐसे भी यह दुनिया जानी जाती है : अपनी ही रची सृष्टि, अपनी ही ब्रह्म-दृष्टि, ऊपर से रचे-रचे, अंदर से बचे-बचे, कुछ ऐसे भी दुनिया पहि…

सन्नाटा या शोर - कुँवर नारायण

सन्नाटा या शोर कितना अजीब है अपने ही सिरहाने बैठकर अपने को गहरी नींद में सोते हुए देखना। यह रोशनी नहीं मेरा घर जल रहा है। मेरे ज़ख्मी पाँवों को एक लम्बा रास्ता निगल रहा है। मेरी आँखें नावों की तरह एक अंधेरे महासागर को पार कर रही हैं। यह पत…

अंतिम ऊँचाई - कुंवर नारायण

अंतिम ऊँचाई कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका होता | मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को दस सिरों से सोचने और बीस …

अबकी बार लौटा तो - कुंवर नारायण

अबकी बार लौटा तो अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूंगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी बार लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा घर से निकलते …

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