झूठे सपनों के छल से निकल - शंकर शैलेन्द्र
झूठे सपनों के छल से निकल झूठे सपनों के छल से निकल चलती सड़कों पर आ! अपनों से न रह यों दूर-दूर आ क़दम से क़दम मिला! हम सबकी मुश्किलें एक सी हैं, ये भूख, रोग, बेकारी, कुछ सोच कि सब कुछ होते हुए हम क्यों बन चले भिखारी, क्यों बाँझ हो चली यह धरती…