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हिन्दी गज़ल और कृष्ण बिहारी नूर - कृष्ण कुमार नाज़

हिन्दी गज़ल और कृष्ण बिहारी नूर हिन्दी ग़ज़ल के विकास में वही ग़ज़लकार सही अर्थों में सहयोग दे सकते हैं, जो ग़ज़ल के शिल्प और उसकी कोमलता से परिचित हैं। इस कार्य को बख़ूबी अंजाम दिया श्री कृष्णबिहारी 'नूर' ने। नूर साहब चूँकि मूलरूप से ग़ज़लकार …

मुसाफिर हूँ इक अनजानी डगर का - कृष्ण कुमार नाज़

मुसाफिर हूँ इक अनजानी डगर का मुसाफिर हूँ इक अनजानी डगर का कुछ अंदाजा नहीं होता सफर का मेरे ख्वाबो मेरी नींदे सजा दो कि मै जागा हुआ हूँ उम्र भर का है मुझमे खामियां यूँ तो बहुत -सी मगर पैकर हूँ मै इल्म-ओ -हुनर का मुझे रख लों पनाहों में तुम …

बस गया हो ज़हन में जैसे कोई डर आजकल - कृष्ण कुमार नाज़

बस गया हो ज़हन में जैसे कोई डर आजकल बस गया हो ज़हन में जैसे कोई डर आजकल सब इकट्ठा कर रहे हैं छत पे पत्थर आजकल शहरभर की नालियाँ गिरती हैं जिस तालाब में वो समझने लग गया खु़द को समंदर आजकल फ़ाइलों का ढेर, वेतन में इज़ाफ़ा कुछ नहीं हाँ, अगर बढ़…

शाम का वक्त है शाख़ों को हिलाता क्यूँ है? - कृष्ण कुमार नाज़

शाम का वक्त है शाख़ों को हिलाता क्यूँ है ? शाम का वक्त है शाख़ों को हिलाता क्यूँ है ? तू थके मांदे परिन्दों को उड़ाता क्यूँ है ? वक्त को कौन भला रोक सका है पगले, सूइयां घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यूँ है ? स्वाद कैसा है पसीने का, ये मज़दूर स…

आधुनिक शायरी में जनजीवन - डॉ. कृष्ण कुमार नाज़

आधुनिक शायरी में जनजीवन - डॉ. कृष्ण कुमार नाज़ स्वर्गीय नूर साहब का यह मज़मून उनके प्रिय शिष्य डॉ. कृष्ण कुमार 'नाज़' ने हमें उपलब्ध कराया, जो उर्दू में नूर साहब की हस्तलिपि में था। नूर साहब ने ज़िंदगी-भर शायरी की और मुशायरे पढ़े, नस्र (गद्य) में…

क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया - कृष्ण कुमार नाज़

क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया हमको भी हालात के साँचे में ढलना आ गया रोशनी के वास्ते धागे को जलते देखकर ली नसीहत मोम ने उसको पिघलना आ गया शुक्रिया ऎ पत्थरो, बेहद तुम्हारा शुक्रिया सर झुकाकर जो मुझे …

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