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मेरे ख्वाबो मेरी नींदे सजा दो - कृष्ण कुमार नाज़

मुसाफिर हूँ इक अनजानी डगर का
कुछ अंदाजा नहीं होता सफर का

मेरे ख्वाबो मेरी नींदे सजा दो
कि मै जागा हुआ हूँ उम्र भर का

है मुझमे खामियां यूँ तो बहुत -सी
मगर पैकर हूँ मै इल्म-ओ -हुनर का

मुझे रख लों पनाहों में तुम अपनी
भरोसा क्या भला दीवारों-दर का

सुनो मुझसे अंधेरो कि कहानी
दिया हूँ रात के पिछले पहर का

वो जिसने जिंदगीभर छाव बांटी
मै पत्ता हूँ उसी बूढ़े शज़र का

न जाने कौन मेरा मुन्तजिर है
बुलावा है मुझे आठो पहर का

बना बैठे उसी को देवता हम
जो पत्थर था हमारी रहगुजर का - कृष्ण कुमार नाज़

मायने
पैकर = प्रतिकृति,  शज़र = पेड

Roman

musafir hun ek anjani dagar ka
kuch andaja nahi hota safar ka

mere khwabo meri ninde saja do
ki mai jaga hua hun umra bhar ka

hai mujhme khamiyaN yuN yo Bahut-si
magar paikar hun mai ilm-o-hunar ka

mujhe rakh lo panaaho me tum apni
bharosa kya bhala deewaro-dar ka

suno mujhse andhero ki kahani
diya huN raat ke pichhle pahar ka

wo jisne zindgi bhar chhav baati
mai patta hun usi budhe Shazar ka

n jane koun mera muntzir hai
bulawa hai mujhe aatho pahar ka

bana baithe usi ko devta ham
jo patthar tha hamari rahgujar ka - Krishn Kumar Naaz
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