भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं - हसरत मोहानी
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं इलाही तर्के-उल्फ़त पर वो क्योंकर याद आते हैं न छेड़ ऐ हम नशीं कैफ़ीयते-सहबा के अफ़साने शराबे-बेख़ुदी के मुझको साग़र याद आते हैं रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाये न…