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मछुआरा - हरिवंशराय बच्चन

मछुआरा - हरिवंशराय बच्चन बड़े सवेरे उठ मछुआरा सागर तीरे जाता है जाल डाल कर गहरे पानी मछली रोज फसाता है धरे टोकरी सर के ऊपर साथ मछेरिन आती है सोने चाँदी की मछली रख उसमें घर ले जाती है - हरिवंशराय बच्चन Machhuaara bade sawere uth Mach…

अग्निपथ - हरिवंश राय बच्चन

अग्निपथ - हरिवंश राय बच्चन वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े, एक पत्र छाँह भी, माँग मत, माँग मत, माँग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। य…

नव वर्ष - हरिवंशराय बच्चन

नव वर्ष - हरिवंशराय बच्चन वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव। नव उमंग, नव तरंग, जीवन का नव प्रसंग। नवल चाह, नवल राह, जीवन का नव प्रवाह। गीत नवल, प्रीति नवल, जीवन की रीति नवल, जीवन की नीति नवल, जीवन की जीत नवल! - हरिवंशराय बच्चन Nav …

आज फिर से - हरिवंशराय बच्चन

आज फिर से आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ । है कहां वह आग जो मुझको जलाए, है कहां वह ज्वाल पास मेरे आए, रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ; आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ। तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी, नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी, आज तुम मुझको…

सबसे पहले! - हरिवंशराय बच्चन

सबसे पहले! आज उठा मैं सबसे पहले! सबसे पहले आज सुनूँगा, हवा सवेरे की चलने पर, हिल, पत्तों का करना 'हर-हर' देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले, लाल, सुनहले! आज उठा मैं सबसे पहले! सबसे पहले आज सुनूँगा, चिड़िया का डैने फड़का कर चहक-चहकक…

साथी घर-घर आज दिवाली (कविता) - हरिवंशराय बच्चन

साथी, घर-घर आज दिवाली साथी, घर-घर आज दिवाली! फैल गयी दीपों की माला मंदिर-मंदिर में उजियाला, किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली! साथी, घर-घर आज दिवाली! हास उमंग हृदय में भर-भर घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर, किंतु हमारे घर के अंदर डर…

मुठ्ठी में लो इनकी डोर - डॉ हरिवंशराय बच्चन

मुठ्ठी में लो इनकी डोर मुठ्ठी में लो इनकी डोर इन्हें घुमाओ चारो और हाथो से दो उन्हें उछाल लेकिन छूना खूब संभाल पड़ा किसी के ऊपर जोर, एक जोर का होगा शोर गुब्बारा फट जाएगा, खेल खतम हो जाएगा - डॉ हरिवंशराय बच्चन Mutthi mein lo inki dor Mutth…

चंचल तितली - हरिवंश राय बच्चन

चंचल तितली रंग-बिरंगे पर फड़काती, तितली जब बगिया में आती सब बच्चो के मन को भाती, सब बच्चो का जी ललचाता फूलो के ऊपर मंडराती, पत्तों के पीछे छिप जाती रंगत कैसे इतनी पाती नहीं किसी को भी बतलाती जी में आता उसे पकड़कर हम अपने घर मे…

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