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यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं - मजरूह सुल्तानपुरी

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें दे…

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया - मजरूह सुल्तानपुरी

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज…

बरियाबी नज़्म - मज़रूह सुल्तानपुरी

बरियाबी नज़्म तेरी इन उलझी हुई साँसों के ज़ीर-ओ-बम के साथ अपने टूटे साज़ पर इक गीत गा सकता हूँ मै इन सियाह बिखरी हुई जुल्फों की तारीकी में आज अपने कुछ बीते हुए लम्हे चुरा सकता हूँ मै हाँ इन्ही लरजे हुए हाथो से और तेरे समेत रात की दोशीज़गी …

वो जो मुह फेर कर गुजर जाए - मजरूह सुल्तानपुरी

वो जो मुह फेर कर गुजर जाए वो जो मुह फेर कर गुजर जाए हश्र का भी नशा उतर जाए अब तो ले ले जिन्दगी यारब क्यों ये तोहमत भी अपने सर जाए आज उठी इस तरह निगाहें करम जैसे शबनम से फूल भर जाए अजनबी रात अजनबी दुनिया तेरा मजरूह अब किधर जाये - मजरूह सुल…

पहले सौ बार इधर और उधर देखा है - मजरूह सुल्तानपुरी

पहले सौ बार इधर और उधर देखा है पहले सौ बार इधर और उधर देखा है तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं हम ने उस शोख को ऐ दीदा-ए-तर देखा है आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो उस ने लोगों बड़ी मुश्किल से …

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