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कविता की मौत - धर्मवीर भारती

कविता की मौत लाद कर ये आज किसका शव चले और उस छतनार बरगद के तले किस अभागिन का जनाज़ा है रुका बैठ इसके पाँयते गर्दन झुका कौन कहता है कि कविता मर गई? मर गई कविता नहीं तुमने सुना? हाँ वही कविता, कि जिसकी आग से सूरज बना धरती जमी बरसात लहराई…

बरसों के बाद उसी सूने आँगन में - धर्मवीर भारती

बरसों के बाद उसी सूने आँगन में बरसों के बाद उसी सूने आँगन में जाकर चुपचाप खड़े होना रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना मन का कोना-कोना कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना फिर आकर बाँहों में खो जाना अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी फिर गहरा सन्न…

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