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जीवन की ही जय है - मैथिलीशरण गुप्त

जीवन की ही जय है मृषा मृत्यु का भय है जीवन की ही जय है । जीव की जड़ जमा रहा है नित नव वैभव कमा रहा है यह आत्मा अक्षय है जीवन की ही जय है। नया जन्म ही जग पाता है मरण मूढ़-सा रह जाता है एक बीज सौ उपजाता है सृष्टा बड़ा सदय है जीवन की ही ज…

नर हो, न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त

नर हो, न निराश करो मन को नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन को सँभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ…

होली - मैथिलीशरण गुप्त

होली - मैथिलीशरण गुप्त जो कुछ होनी थी, सब होली! धूल उड़ी या रंग उड़ा है, हाथ रही अब कोरी झोली। आँखों में सरसों फूली है, सजी टेसुओं की है टोली। पीली पड़ी अपत, भारत-भू, फिर भी नहीं तनिक तू डोली! - मैथिलीशरण गुप्त Holi - Maithilisharan Gup…

चारुचंद्र की चंचल किरणें - मैथिलीशरण गुप्त

चारुचंद्र की चंचल किरणें भगवान श्रीराम, पत्नी सीता व भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के वनवास पर जा चुके हैं। वहां वह पंचवटी में पत्तों की कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। एक रात्रि श्रीराम व सीता जी विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मण बाहर कुटी का पहरा दे रहे है…

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