निखारती रही यलग़ार-ए-संग क्या करते - मंज़ूर नदीम
निखारती रही यलग़ार-ए-संग क्या करते निखारती रही यलग़ार-ए-संग क्या करते हम अपना हल्क़ा-ए-अहबाब तंग क्या करते उसे था शौक़ बहुत आसमान छूने का ये कट गई थी हमारी पतंग क्या करते ये दौर दे गया तमग़ात चापलूसों को हम ऐसे दश्त-ए-अना के मलंग क्या करते …