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निखारती रही यलग़ार-ए-संग क्या करते - मंज़ूर नदीम

निखारती रही यलग़ार-ए-संग क्या करते निखारती रही यलग़ार-ए-संग क्या करते हम अपना हल्क़ा-ए-अहबाब तंग क्या करते उसे था शौक़ बहुत आसमान छूने का ये कट गई थी हमारी पतंग क्या करते ये दौर दे गया तमग़ात चापलूसों को हम ऐसे दश्त-ए-अना के मलंग क्या करते …

ज़ेहन-ओ-दिल में है जंग या कुछ और - इफ़्तिख़ार राग़िब

ज़ेहन-ओ-दिल में है जंग या कुछ और ज़ेहन-ओ-दिल में है जंग या कुछ और हो रहा हूँ मलंग या कुछ और हाल क्या हो गया समाअ'त का तेरी बातें थीं संग या कुछ और कोई उतरा है झील में दिल की उठ रही है तरंग या कुछ और तेरे हाथों में डोर है या दिल हो गया…

तीन रंग एक रंग - फ़हीम जोज़ी

तीन रंग एक रंग तुम पतंग बन के हवाओं में तैरती फिरो और डोर मिरे हाथों को काटती रहे पर पर ज़ख़्मी और आँखें तेरे रंगों में उलझी रहें लहू बहता रहे और आस तुझे चाहने की आसमान बन के तिरे चारों तरफ़ बिखर जाए शाम उतरे तो तेरी आँखों का रंग मुझे अपनी प…

कटी पतंग की मानिंद डोलते हो तुम - मुनीर अनवर

कटी पतंग की मानिंद डोलते हो तुम कटी पतंग की मानिंद डोलते हो तुम मुझे वतन से निकाले गए लगे हो तुम ये और बात कि अब मस्लहत-शिआ'र हुए क़रीब मेरे भी वर्ना कभी रहे हो तुम कोई रफ़ीक़ न मंज़िल न कोई रख़्त-ए-सफ़र ये किस ख़ुमार में किस सम्त को चले…

कटी पतंग हूँ मैं और बे-सहारा हूँ - बीना गोइंदी

कटी पतंग हूँ मैं और बे-सहारा हूँ कटी पतंग हूँ मैं और बे-सहारा हूँ मुझे कहा नहीं उस ने कि मैं तुम्हारा हूँ ये मुझ में आतिश-ए-बे-सोज़ जलती रहती है मैं रौशनी हूँ मैं जुगनू हूँ इस्तिआ'रा हूँ तिरे हुसूल की गर्दिश में खो गई हूँ मैं मुझे बता कि…

कुछ देर सादगी के तसव्वुर से हट के देख - नज़ीर बाक़री

कुछ देर सादगी के तसव्वुर से हट के देख कुछ देर सादगी के तसव्वुर से हट के देख लिक्खा हुआ वरक़ हूँ मुझे फिर उलट के देख माना कि तुझ से कोई तअल्लुक़ नहीं मगर इक बार दुश्मनों की तरह ही पलट के देख फिर पूछना कि कैसे भटकती है ज़िंदगी पहले किसी पतंग …

परिंदा हद्द-ए-नज़र तक जो आसमान में है - ग़नी एजाज़

परिंदा हद्द-ए-नज़र तक जो आसमान में है परिंदा हद्द-ए-नज़र तक जो आसमान में है परों में ज़ोर कहाँ हौसला उड़ान में है अभी से भीग रहा है हदफ़ पसीने में कि तीर छूटा नहीं है अभी कमान में है गिरेगी कौन सी छत पे ये कब किसे मालूम कटी पतंग हवाओं के इम…

फैला है जाल बाम पे ज़ुल्फ़-ए-दराज़ का - हाशिम अज़ीमाबादी

फैला है जाल बाम पे ज़ुल्फ़-ए-दराज़ का फैला है जाल बाम पे ज़ुल्फ़-ए-दराज़ का तोता उड़े न हाथ से अहल-ए-नियाज़ का देखी नहीं है तुम ने हमारी पतंग अभी क्या नाम ले रहे हो हवाई-जहाज़ का आमद प्रिंसिपल की है होश्यार लड़कियो ये वक़्त है शगुफ़्तन-ए-गु…

किसी गिर्दाब की फेंकी पड़ी है - लियाक़त जाफ़री

किसी गिर्दाब की फेंकी पड़ी है किसी गिर्दाब की फेंकी पड़ी है लब-ए-साहिल जो इक कश्ती पड़ी है हक़ीक़त में वही सीधी पड़ी है मुझे इक चाल जो उल्टी पड़ी है सफ़र उलझा दिए हैं उस ने सारे मिरे पैरों में जो तेज़ी पड़ी है वो हंगामा गुज़र जाता उधर से …

लोग बिल्कुल पतंग जैसे हैं - इक़रा आफ़िया

लोग बिल्कुल पतंग जैसे हैं लोग बिल्कुल पतंग जैसे हैं मैं ज़रा सी जो ढील देती हूँ सर से ऊपर ही उड़ने लगते हैं ~ इक़रा आफ़िया log bilkul patang jaise hain log bilkul patang jaise hain main zara si jo dhil deti hun sar se upar hi udane lagte h…

पतंग उड़ाने से पहले ये जान लेना था - शहराम सर्मदी

पतंग उड़ाने से पहले ये जान लेना था पतंग उड़ाने से पहले ये जान लेना था कि इस की असल है क्या और माहियत क्या है बहुत नहीफ़ सी दो बाँस की खपंचें हैं और उन से लिपटा मुरब्बे में ना-तवाँ काग़ज़ ये जिस के दम पे हवा में कुलेलें भरती है ज़रा सी ज़र्…

पतंग और पतंगबाजी पर कुछ बेहतरीन शेर

पतंग और पतंगबाजी पर कुछ बेहतरीन शेर | संक्रांति शायरी अज़ीज़ क़द्रों पे जाँ-कनी की गिरफ़्त मज़बूत हो गई है पतंग की तरह कट चुके हैं तमाम रिश्ते - मज़हर इमाम अब तो रखा है काट हमारा ये आप ने ग़ैरों से मिल पतंग उड़ाते हो जब न तब - वलीउल्लाह मुहिब अ…

अब बात हुई प्राचीन - वीरेन डंगवाल

अब बात हुई प्राचीन एक शहर था जिसका नाम सहारनपुर है उसमें भी कुछ एक बरस मैंने काटे हैं बात सही सन् सत्तावन-अट्ठावन की होगी मैं छोटा था, पतंग देख कर ख़ुश होता था भूख उन दिनों बेहद सताया करती शायद मेरे, रहे पेट में कीड़े होंगे शायद माँ से हठ कर…

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