short-story

आत्ममंथन - महावीर उत्तरांचली

आत्ममंथन - महावीर उत्तरांचली सम्पूर्ण विश्व में मेरा ही वर्चस्व है, भूख ने भयानक स्वर में गर्जना की। मै कुछ समझी नहीं, प्यास बोली। मुझसे व्याकुल होकर ही लोग नाना प्रकार के उद्योग करते हैं। यहाँ तक कि कुछ अपना ईमान तक बेच देते हैं, भूख ने उसी घ…

साया - महावीर उत्तराचली

साया - महावीर उत्तराचली रात के घने अँधेरे में एक हाथ जो द्वार खटकने के उद्देश्य से आगे बढ़ा था। वह भीतर का वार्तालाप सुनकर ज्यों-का-त्यों रुक गया। "चलो अच्छा हुआ कल्लू की माँ, जो दंगों में लापता लोगों को भी सरकार ने दंगों में मरा हुआ मान लि…

दो नाक वाले लोग - हरिशंकर परसाई

दो नाक वाले लोग - हरिशंकर परसाई मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो। पर वे बुजुर्ग कह रहे थे - आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी। नाक उनकी काफी लंबी थी। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाजत सबसे ज…

एक टोकरी भर मिट्टी - माधवराव सप्रे

एक टोकरी भर मिट्टी - माधवराव सप्रे किसी श्रीमान ज़मीदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। ज़मीदार साहब को अपने महल का हाता उस झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी। …

दिवाली के दीये - सआदत हसन मंटो

दिवाली के दीये - सआदत हसन मंटो छत की मुंडेर पर दिवाली के दीये हाँपते हुए बच्चों के दिल की तरह धड़क रहे थे। मुन्नी दौड़ती हुई आई। अपनी नन्ही सी घगरी को दोनों हाथों से ऊपर उठाए छत के नीचे गली में मोरी के पास खड़ी हो गई। उसकी रोती हुई आँखों में मुंडे…

शिकार को निकला शेर - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

शिकार को निकला शेर If you cannot see the audio controls, your browser does not support the audio element एक शेर एक रोज जंगल में शिकार के लिए निकला। उसके साथ एक गधा और कुछ दूसरे जानवर थे। सब के बीच मे यह मत ठहरा कि शिकार का बराबर हिस्सा लिया जाएगा…

सांप - डॉ. जिया उर रहमान जाफरी

सांप - डॉ. जिया उर रहमान जाफरी उसे शरारत सुझी | उसने अपने मित्र के बिस्तर पर एक बनावटी सांप रख दिया...... मित्र ने जैसे देखा सांप -सांप चिल्लाने लगा.... उसे ये देखकर हंसी आ गई..... उसने कहा --"कहाँ है सांप.. ? " यह कहकर उसने सांप को…

सआदत हसन मंटो की पांच लघुकथाए

सआदत हसन मंटो की पांच लघुकथाए 1 ) करामात लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, कानूनी गिरफ्त…

चोरी का अर्थ - विष्णु प्रभाकर

चोरी का अर्थ एक लम्बे रास्ते पर सड़क के किनारे उसकी दुकान थी। राहगीर वहीं दरख्तों के नीचे बैठकर थकान उतारते और सुख-दुख का हाल पूछता। इस प्रकार तरोताजा होकर राहगीर अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाते। एक दिन एक मुसाफिर ने एक आने का सामान लेकर दुक…

असली हक़दार - दिनेश दर्पण

असली हक़दार एक स्थान पर कुछ बच्चे बहस में उलझे हुए थे | तभी वह से एक साधू महात्मा गुजर रहे थे | उन्होंने देखा कि बच्चे किसी बहस में उलझे हुए है, तो सोचकर वे उनके पास जा पहुचे कि कदाचित उन बच्चो की कुछ मदद कर सके या शायद बच्चो को उनकी सलाह की आवश्यक…

भगत सिंह - मिथिलेश बरिया

भगत सिंह मार्च 23 1931 ... करीब... अस्सी साल बीत गए थे... वो लाहोर जेल के बाहर आज फिर खडा था... अब भी उसे वो दिन याद था... बहुत भीड़ थी जेल के बाहर.... दो और साथी भी थे उसके... फाँसी पर हँसते हँसते चढ़ा था वह.. वही हंसी आज भी उसके चेहरे पर थी.. देश …

पदचिह्न - अहमद निसार

लघुकथा: पदचिह्न Padchinh Short story स्कूल के बच्चों का एक दल दिल्ली भ्रमण पर आया था। साथ में अध्यापक महोदय भी थे। दल एक के बाद एक ऐतिहासिक इमारतों और स्थलों की खाक छानता घूम रहा था। मास्टर जी उसका इतिहास भी बता रहे थे और बच्चों के जिज्ञासा भरे प…

पानी की जाति - विष्णु प्रभाकर

पानी की जाति बी.ए. की परीक्षा देने वह लाहौर गया था। उन दिनों स्वास्थ्य बहुत खराब था। सोचा, प्रसिद्ध डा0 विश्वनाथ से मिलता चलूँ। कृष्णनगर से वे बहुत दूर रहे थे। सितम्बर का महीना था और मलेरिया उन दिनों यौवन पर था। वह भी उसके मोहचक्र में फँस गया। जिस …

फर्क - विष्णु प्रभाकर

फर्क - विष्णु प्रभाकर उस दिन उसके मन में इच्छा हुई कि भारत और पाक के बीच की सीमारेखा को देखा जाए, जो कभी एक देश था, वह अब दो होकर कैसा लगता है? दो थे तो दोनों एक-दूसरे के प्रति शंकालु थे। दोनों ओर पहरा था। बीच में कुछ भूमि होती है जिस पर किसी का अध…

कीमत - दीपक मशाल

कीमत - दीपक मशाल दीपक मशाल जी का असल नाम दीपक चौरसिया है आप मशाल उपनाम लिखते है | कोंच, उरई उत्तर प्रदेश, भारत के रहने वाले है | आपको अक्षरम, दिल्ली एवं प्रवासी दुनिया द्वारा वर्ष 2012 का प्रवासी युवा साहित्य सम्मान मिल चुके है । रमा के मामा रमेश क…

विवशता - हीरालाल नागर

विवशता - हीरालाल नागर कॉलेज छोड़ने के बाद यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। मित्र को न जाने कैसे पता चल गया कि मैं इस कॉलोनी में हूँ। कमरे में बैठते ही मैंने आवाज़ लगाई, ''सुनीता! देख, आज कौन आया है?'' पत्नी संभवतः घर पर नहीं थी। उत्तर नही…

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