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मुझ पर इनायतें हैं कई साहिबान की - अशोक मिज़ाज

मुझ पर इनायतें हैं कई साहिबान की मुझ पर इनायतें हैं कई साहिबान की कुछ हैं ज़मीन वालों की कुछ आसमान की अपने सफ़र का तन्हा मुसाफ़िर नहीं हूँ मैं इज़्ज़त जुड़ी है मुझ से मिरे ख़ानदान की वो मुझ को आज़मा के कड़ी धूप में रहा मुझ को ख़िज़ाँ बहार लग…

मई गुजर के जल्दी से जून आ जाए - अशोक मिजाज़

मई गुजर के जल्दी से जून आ जाए मई गुजर के जल्दी से जून आ जाए, हवाए चलने लगे मानसून आ जाए जरा सी देर में उठकर टहलने लगता हूँ किसी बहाने ज़रा सा सुकून आ जाए कही से आये वो बारिश की सौंधी-सौंधी महक मेरी शिकस्ता रगों में जुनून आ जाए मै आँखे बंद …

हम लोग अपनी राह की दीवार हो गए - अशोक मिज़ाज

हम लोग अपनी राह की दीवार हो गए इस ग़ज़ल के पहले शेर यानी मतले में दो तरह की पंक्तियाँ प्रसिद्द है पहली जो की नीचे ग़ज़ल में लिखी गई है और एक और है जो कुछ यूँ है "* इक दूसरे के वास्ते तलवार हो गए " जिसे प्रारंभिक तौर पर पत्रिकाओं में छपी थी ज…

बहुत से मोड़ हो जिसमें कहानी अच्छी लगती है - अशोक मिजाज़

बहुत से मोड़ हो जिसमें कहानी अच्छी लगती है बहुत से मोड़ हो जिसमें कहानी अच्छी लगती है निशानी छोड़ जाये वो जवानी अच्छी लगती है सुनाऊ कौन से किरदार बच्चो को कि अब उनको न राजा अच्छा लगता है न रानी अच्छी लगती है खुदा से या सनम से या किसी पत्थर की…

शराफत हम से कहती है, शराफत से जिया जाए - अशोक मिजाज़

शराफत हम से कहती है, शराफत से जिया जाए शराफत हम से कहती है, शराफत से जिया जाए, कोई हद भी तो होती है, कहाँ तक चुप रहा जाए। ग़ज़ल से गुफ़्तगू हमने इशारों में बहुत कर ली, मगर अब दिल ये कहता है कि कुछ खुल कर कहा जाये। अभी जिंदा है हम साँसे भी अपनी च…

जरा सा नाम पा जाए, उसे मंजिल समझते है - अशोक मिजाज़

जरा सा नाम पा जाए, उसे मंजिल समझते है जरा सा नाम पा जाए, उसे मंजिल समझते है बड़े नादान है मझदार को साहिल समझते है अगर वो होश में रहते तो दरिया पार कर लेते ज़रा सी बात है लेकिन कहा गाफिल समझते है अकेलापन कभी हमको अकेला कर नहीं सकता अकेलेपन को …

बदल रहे है यहाँ सब, रिवाज़ क्या होगा - अशोक मिजाज़

बदल रहे है यहाँ सब, रिवाज़ क्या होगा बदल रहे है यहाँ सब, रिवाज़ क्या होगा मुझे ये फ़िक्र है, कल का समाज क्या होगा लहू तो कम है मगर रक्तचाप भारी है अब ऐसे रोग का आखिर इलाज क्या होगा दिलो दिमाग के बीमार है जहा देखो मै सोचता हू यहाँ राम राज क्या ह…

कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है - अशोक मिज़ाज

कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है कभी पीने पिलाने मे ये शीशे टूट जाते है हम इस धरती के वासी है अगर टूटे तो क्या ग़म है फलक पर हमने देखा है सितारे टूट जाते है बहुत कम लोग ऐसे है, जिन्हें रहजन मिले…

ऐसा लगता है कि ये उम्र पहन आया है - अशोक मिज़ाज

ऐसा लगता है कि ये उम्र पहन आया है ऐसा लगता है कि ये उम्र पहन आया है अब मेरे सर पे भी कुछ रंगे कफ़न आया है उम्र मर-मर के गुजारी है, अभी तक हमने अब कहा कही जा के हमें जीने का फन आया है लोग क्यों चाहते है उम्र से भी कम दिखना कैसी तहजीब है ये, क…

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