तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे - राजेंद्र नाथ रहबर
तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे प्यार की आख़िरी पूँजी भी लुटा आया हूँ अपनी हस्ती को भी लगता है मिटा आया हूँ उम्र-भर की जो कमाई थी गँवा आया हूँ तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ तू ने लिख्खा था जला दूँ…