khat-letters

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे - राजेंद्र नाथ रहबर

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे प्यार की आख़िरी पूँजी भी लुटा आया हूँ अपनी हस्ती को भी लगता है मिटा आया हूँ उम्र-भर की जो कमाई थी गँवा आया हूँ तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ तू ने लिख्खा था जला दूँ…

नेहरू के नाम मंटो का खत - सआदत हसन मंटो

नेहरू के नाम मंटो का खत पंडित जी, अस्सलाम अलैकुम। यह मेरा पहला खत है जो मैं आपको भेज रहा हूँ। आप माशा अल्लाह अमरीकनों में बड़े हसीन माने जाते हैं। लेकिन मैं समझता हूँ कि मेरे नाक-नक्श भी कुछ ऐसे बुरे नहीं हैं। अगर मैं अमरीका जाऊँ तो शायद मु…

वो खत के पुर्जे उड़ा रहा था - गुलज़ार

वो खत के पुर्जे उड़ा रहा था वो खत के पुर्जे उड़ा रहा था हवाओ का रुख दिखा रहा था बताऊ कैसे वो बहता दरिया जब आ रहा था तो जा रहा था कुछ और भी हो गया नुमायाँ मै अपना लिखा मिटा रहा था धुआँ-धुआँ हो गयी थी आँखे चराग को जब बुझा रहा था मुंडेर से झ…

ग़ालिब के खत - 5

ग़ालिब के खत - 5 28 मार्च सन् 1853 ई. भाई, आज मुझको बड़ी तशवीश है। और यह खत मैं तुमको कमाल सरासीमगी में लिखता हूँ। जिस दिन मेरा ख़त पहुँचे, अगर वक्त डाक का हो, तो उसी वक्त जवाब लिखकर रवाना करो और अगर वक्त न रहा हो, तो नाचार दूसरे दिन जवाब भेजो। मंश…

ग़ालिब के खत - 4

ग़ालिब के खत - 4 परसों तुम्हारा ख़त आया। हाल जो मालूम था, वह फिर मालूम हुआ। ग़ज़लें देख रहा था। आज शाम को देखना तमाम हुआ था। ग़ज़लों को रख दिया था। चाहता था कि इनको बंद करके रहने दूँ, कल नौ बजे, दस बजे डाक में भेज दूँ, ख़त कुछ जरूरी नहीं। मैं इसी ख्य…

ग़ालिब के खत - 3

ग़ालिब के खत - 3 जनवरी सन् 1856 ई. असदुल्ला क्यों महाराज? कोल में आना और मुंशी नबी बख्श साहिब के साथ ग़ज़ल ख़ानी करनी और हमको याद न लाना। मुझसे पूछो कि मैंने क्योंकर जाना कि तुम मुझको भूल गए। कल में आए और मुझको अपने आने की इत्तिला न दी। न लिखा कि …

ग़ालिब के खत -2

ग़ालिब के खत -2 फरवरी सन् 1852 ई.असदुल्ला शफ़ीक़ बित-तहक़ीक़ मुंशी हरगोपाल तफ्ता हमेशा सलामत रहें, आपका वह ख़त जो आपने कानपुर से भेजा था, पहुँचा। बाबू साहिब के सैर-ओ-सफ़र का हाल और आपका लखनऊ जाना और वहाँ के शुअ़रा से मिलना, सब मालूम हुआ। अशआ़र जनाब…

ग़ालिब के खत -1

ग़ालिब के खत -1 (अगस्त सन् 1849 ई) महाराज, आपका मेहरबानीनामा पहुँचा। दिल मेरा अगर्चे खुश न हुआ, लेकिन नाखुश भी न रहा। बहरहाल, मुझको कि नालायक़ व ज़लीलतरीन ख़लनायक़ हूँ, अपना दुआग़ो समझते रहो। क्या करूँ? अपना शेवा तर्क नहीं किया जाता। वह रविश हिंदु…

प्यार का पहला खत लिखने में वक़्त तो लगता है - हस्तीमल हस्ती

प्यार का पहला खत लिखने में वक़्त तो लगता है प्यार का पहला खत लिखने में वक़्त तो लगता है, नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था, लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्…

ग़ालिब के खत

ग़ालिब के खत ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के एक प्रभावशाली कवि हुए हैं। फ़ारसी की शायरी पर उन्हें बड़ा गर्व था। परंतु वह अपनी उर्दू शायरी की बदौलत बहुत मशहूर हुए। पहले-पहल फ़ारसी में पत्र ‍लिखते थे, परंतु 1850 के लगभग उन्होंने उर्दू में पत्र लिखना आरंभ…

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