दश्त-ए-वहशत का सफ़र लगता है - इम्तियाज़ सागर
दश्त-ए-वहशत का सफ़र लगता है दश्त-ए-वहशत का सफ़र लगता है इश्क़ भी कार-ए-हुनर लगता है शाख़ मौसम के सितम झेलती है फिर कहीं जा के समर लगता है हम की जिस राह पे चल निकले है ये तो सदियों का सफ़र लगता है इक अजब शख़्स बसा है मुझमें आईना देखूँ तो डर लगता…