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मुझे कदम कदम पर - गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे कदम कदम पर मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं बांहें फैलाए! एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं, मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ, बहुत अच्छे लगते हैं उनके तजुर्बे और अपने सपने.... सब सच्चे लगते हैं, अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है, मै…

विचार आते हैं - गजानन माधव मुक्तिबोध

विचार आते हैं विचार आते हैं लिखते समय नहीं बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करते समय चांद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में विचार आते हैं लिखते समय नहीं ...पत्थर ढोते वक़्त पीठ पर उठाते वक़्त बोझ …

वे बाते लौट न आएगी - गजानन माधव मुक्तिबोध

वे बाते लौट न आएगी खगदल हैं ऐसे भी कि न जो आते हैं, लौट नहीं आते वह लिए ललाई नीलापन वह आसमान का पीलापन चुपचाप लीलता है जिनको वे गुँजन लौट नहीं आते वे बातें लौट नहीं आतीं बीते क्षण लौट नहीं आते बीती सुगन्ध की सौरभ भर पर, यादें लौट चली आतीं…

चाँद का मुँह टेढ़ा है - गजानन माधव मुक्तिबोध

चाँद का मुँह टेढ़ा है नगर के बीचों-बीच आधी रात--अंधेरे की काली स्याह शिलाओं से बनी हुई भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए ऊँचे-ऊँचे कन्धों पर चांदनी की फैली हुई सँवलायी झालरें। कारखाना--अहाते के उस पार धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे उ…

डूबता चाँद कब डूबेगा - गजानन माधव मुक्तिबोध

डूबता चाँद कब डूबेगा अँधियारे मैदान के इन सुनसानों में बिल्ली की, बाघों की आँखों-सी चमक रहीं ये राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, मत्सर की आँखें, हरियातूता की ज़हरीली-नीली-नीली ज्वाला, कुत्सा की आँखों में। ईर्ष्या-रूपी औरत की मूँछ निकल आई। इस द्वेष-पुर…

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