चाँद का मुँह टेढ़ा है - गजानन माधव मुक्तिबोध

चाँद का मुँह टेढ़ा है - गजानन माधव मुक्तिबोध

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हरिजन गलियों में लटकी है पेड़ पर कुहासे के भूतों की साँवली चूनरी-- चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर टेढ़े-मुँह चांद की ।

हरिजन गलियों में लटकी है पेड़ पर कुहासे के भूतों की साँवली चूनरी-- चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर टेढ़े-मुँह चांद की ।

चाँद का मुँह टेढ़ा है

नगर के बीचों-बीच
आधी रात--अंधेरे की काली स्याह
शिलाओं से बनी हुई
भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए
ऊँचे-ऊँचे कन्धों पर
चांदनी की फैली हुई सँवलायी झालरें।
कारखाना--अहाते के उस पार
धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे
उद्गार--चिह्नाकार--मीनार
मीनारों के बीचों-बीच
चांद का है टेढ़ा मुँह!!
भयानक स्याह सन तिरपन का चांद वह !!
गगन में करफ़्यू है
धरती पर चुपचाप ज़हरीली छिः थूः है !!
पीपल के खाली पड़े घोंसलों में पक्षियों के,
पैठे हैं खाली हुए कारतूस ।
गंजे-सिर चांद की सँवलायी किरनों के जासूस
साम-सूम नगर में धीरे-धीरे घूम-घाम
नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे है !!
चांद की कनखियों की कोण-गामी किरनें
पीली-पीली रोशनी की, बिछाती है
अंधेरे में, पट्टियाँ ।
देखती है नगर की ज़िन्दगी का टूटा-फूटा
उदास प्रसार वह ।

समीप विशालकार
अंधियाले लाल पर
सूनेपन की स्याही में डूबी हुई
चांदनी भी सँवलायी हुई है !!

भीमाकार पुलों के बहुत नीचे, भयभीत
मनुष्य-बस्ती के बियाबान तटों पर
बहते हुए पथरीले नालों की धारा में
धराशायी चांदनी के होंठ काले पड़ गये

हरिजन गलियों में
लटकी है पेड़ पर
कुहासे के भूतों की साँवली चूनरी--
चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर
टेढ़े-मुँह चांद की ।

बारह का वक़्त है,
भुसभुसे उजाले का फुसफुसाता षड्यन्त्र
शहर में चारों ओर;
ज़माना भी सख्त है !!

अजी, इस मोड़ पर
बरगद की घनघोर शाखाओं की गठियल
अजगरी मेहराब--
मरे हुए ज़मानों की संगठित छायाओं में
बसी हुई
सड़ी-बुसी बास लिये--
फैली है गली के
मुहाने में चुपचाप ।
लोगों के अरे ! आने-जाने में चुपचाप,
अजगरी कमानी से गिरती है टिप-टिप
फड़फड़ाते पक्षियों की बीट--
मानो समय की बीट हो !!
गगन में कर्फ़्यू है,
वृक्षों में बैठे हुए पक्षियों पर करफ़्यू है,
धरती पर किन्तु अजी ! ज़हरीली छिः थूः है ।

बरगद की डाल एक
मुहाने से आगे फैल
सड़क पर बाहरी
लटकती है इस तरह--
मानो कि आदमी के जनम के पहले से
पृथ्वी की छाती पर
जंगली मैमथ की सूँड़ सूँघ रही हो
हवा के लहरीले सिफ़रों को आज भी
बरगद की घनी-घनी छाँव में
फूटी हुई चूड़ियों की सूनी-सूनी कलाई-सी
सूनी-सूनी गलियों में
ग़रीबों के ठाँव में--
चौराहे पर खड़े हुए
भैरों की सिन्दूरी
गेरुई मूरत के पथरीले व्यंग्य स्मित पर
टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी,
तिलिस्मी चांद की राज़-भरी झाइयाँ !!
तजुर्बों का ताबूत
ज़िन्दा यह बरगद
जानता कि भैरों यह कौन है !!
कि भैरों की चट्टानी पीठ पर
पैरों की मज़बूत
पत्थरी-सिन्दूरी ईट पर
भभकते वर्णों के लटकते पोस्टर
ज्वलन्त अक्षर !!

सामने है अंधियाला ताल और
स्याह उसी ताल पर
सँवलायी चांदनी,
समय का घण्टाघर,
निराकार घण्टाघर,
गगन में चुपचाप अनाकार खड़ा है !!
परन्तु, परन्तु...बतलाते
ज़िन्दगी के काँटे ही
कितनी रात बीत गयी

चप्पलों की छपछप,
गली के मुहाने से अजीब-सी आवाज़,
फुसफुसाते हुए शब्द !
जंगल की डालों से गुज़रती हवाओं की सरसर
गली में ज्यों कह जाय
इशारों के आशय,
हवाओं की लहरों के आकार--
किन्हीं ब्रह्मराक्षसों के निराकार
अनाकार
मानो बहस छेड़ दें
बहस जैसे बढ़ जाय
निर्णय पर चली आय
वैसे शब्द बार-बार
गलियों की आत्मा में
बोलते हैं एकाएक
अंधेरे के पेट में से
ज्वालाओं की आँत बाहर निकल आय
वैसे, अरे, शब्दों की धार एक
बिजली के टॉर्च की रोशनी की मार एक
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गयी अकस्मात्
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गये हाथ दो
मानो ह्रदय में छिपी हुई बातों ने सहसा
अंधेरे से बाहर आ भुजाएँ पसारी हों
फैले गये हाथ दो
चिपका गये पोस्टर
बाँके तिरछे वर्ण और
लाल नीले घनघोर
हड़ताली अक्षर
इन्ही हलचलों के ही कारण तो सहसा
बरगद में पले हुए पंखों की डरी हुई
चौंकी हुई अजीब-सी गन्दी फड़फड़
अंधेरे की आत्मा से करते हुए शिकायत
काँव-काँव करते हुए पक्षियों के जमघट
उड़ने लगे अकस्मात्
मानो अंधेरे के
ह्रदय में सन्देही शंकाओं के पक्षाघात !!
मद्धिम चांदनी में एकाएक एकाएक
खपरैलों पर ठहर गयी
बिल्ली एक चुपचाप
रजनी के निजी गुप्तचरों की प्रतिनिधि
पूँछ उठाये वह
जंगली तेज़
आँख
फैलाये
यमदूत-पुत्री-सी
(सभी देह स्याह, पर
पंजे सिर्फ़ श्वेत और
ख़ून टपकाते हुए नाख़ून)
देखती है मार्जार
चिपकाता कौन है
मकानों की पीठ पर
अहातों की भीत पर
बरगद की अजगरी डालों के फन्दों पर
अंधेरे के कन्धों पर
चिपकाता कौन है ?
चिपकाता कौन है
हड़ताली पोस्टर
बड़े-बड़े अक्षर
बाँके-तिरछे वर्ण और
लम्बे-चौड़े घनघोर
लाल-नीले भयंकर
हड़ताली पोस्टर !!
टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी भी ख़ूब है
मकान-मकान घुस लोहे के गज़ों की जाली
के झरोखों को पार कर
लिपे हुए कमरे में
जेल के कपड़े-सी फैली है चांदनी,
दूर-दूर काली-काली
धारियों के बड़े-बड़े चौखट्टों के मोटे-मोटे
कपड़े-सी फैली है
लेटी है जालीदार झरोखे से आयी हुई
जेल सुझाती हुई ऐयारी रोशनी !!
अंधियाले ताल पर
काले घिने पंखों के बार-बार
चक्करों के मंडराते विस्तार
घिना चिमगादड़-दल भटकता है चारों ओर
मानो अहं के अवरुद्ध
अपावन अशुद्ध घेरे में घिरे हुए
नपुंसक पंखों की छटपटाती रफ़्तार
घिना चिमगादड़-दल
भटकता है प्यासा-सा,
बुद्धि की आँखों में
स्वार्थों के शीशे-सा !!

बरगद को किन्तु सब
पता था इतिहास,
कोलतारी सड़क पर खड़े हुए सर्वोच्च
गान्धी के पुतले पर
बैठे हुए आँखों के दो चक्र
यानी कि घुग्घू एक--
तिलक के पुतले पर
बैठे हुए घुग्घू से
बातचीत करते हुए
कहता ही जाता है--
"......मसान में...... मैंने भी सिद्धि की । देखो मूठ मार दी मनुष्यों पर इस तरह......
" तिलक के पुतले पर बैठे हुए घुग्घू ने
देखा कि भयानक लाल मूँठ
काले आसमान में
तैरती-सी धीरे-धीरे जा रही

उद्गार-चिह्नाकार विकराल
तैरता था लाल-लाल !!
देख, उसने कहा कि वाह-वाह
रात के जहाँपनाह
इसीलिए आज-कल
दिल के उजाले में भी अंधेरे की साख है
रात्रि की काँखों में दबी हुई
संस्कृति-पाखी के पंख है सुरक्षित !!
...पी गया आसमान
रात्रि की अंधियाली सच्चाइयाँ घोंट के,
मनुष्यों को मारने के ख़ूब हैं ये टोटके !
गगन में करफ़्यू है,
ज़माने में ज़ोरदार ज़हरीली छिः थूः है !!
सराफ़े में बिजली के बूदम
खम्भों पर लटके हुए मद्धिम
दिमाग़ में धुन्ध है,
चिन्ता है सट्टे की ह्रदय-विनाशिनी !!
रात्रि की काली स्याह
कड़ाही से अकस्मात्
सड़कों पर फैल गयी
सत्यों की मिठाई की चाशनी !!

टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी
भीमाकार पुलों के
ठीक नीचे बैठकर,
चोरों-सी उचक्कों-सी
नालों और झरनों के तटों पर
किनारे-किनारे चल,
पानी पर झुके हुए
पेड़ों के नीचे बैठ,
रात-बे-रात वह
मछलियाँ फँसाती है
आवारा मछुओं-सी शोहदों-सी चांदनी
सड़कों के पिछवाड़े
टूटे-फूटे दृश्यों में, ***
गन्दगी के काले-से नाले के झाग पर
बदमस्त कल्पना-सी फैली थी रात-भर
सेक्स के कष्टों के कवियों के काम-सी !
किंग्सवे में मशहूर
रात की है ज़िन्दगी !
सड़कों की श्रीमान्
भारतीय फिरंगी दुकान,
सुगन्धित प्रकाश में चमचमाता ईमान
रंगीन चमकती चीज़ों के सुरभित
स्पर्शों में
शीशों की सुविशाल झाँइयों के रमणीय
दृश्यों में
बसी थी चांदनी
खूबसूरत अमरीकी मैग्ज़ीन-पृष्ठों-सी
खुली थी,
नंगी-सी नारियों के
उघरे हुए अंगों के
विभिन्न पोज़ों मे
लेटी थी चांदनी
सफे़द
अण्डरवियर-सी, आधुनिक प्रतीकों में
फैली थी
चांदनी !

करफ़्यू नहीं यहाँ, पसन्दगी...सन्दली,
किंग्सवे में मशहूर रात की है ज़िन्दगी

अजी, यह चांदनी भी बड़ी मसखरी है !!
तिमंज़ले की एक
खिड़की में बिल्ली के सफे़द धब्बे-सी
चमकती हुई वह
समेटकर हाथ-पाँव
किसी की ताक में
बैठी हुई चुपचाप
धीरे से उतरती है
रास्तों पर पथों पर;
चढ़ती है छतों पर
गैलरी में घूम और
खपरैलों पर चढ़कर
नीमों की शाखों के सहारे
आंगन में उतरकर
कमरों में हलके-पाँव
देखती है, खोजती है--
शहर के कोनों के तिकोने में छुपी हुई
चांदनी
सड़क के पेड़ों के गुम्बदों पर चढ़कर
महल उलाँघ कर
मुहल्ले पार कर
गलियों की गुहाओं में दबे-पाँव
खुफ़िया सुराग़ में
गुप्तचरी ताक में
जमी हुई खोजती है कौन वह
कन्धों पर अंधेरे के
चिपकाता कौन है
भड़कीले पोस्टर,
लम्बे-चौड़े वर्ण और
बाँके-तिरछे घनघोर
लाल-नीले अक्षर ।

कोलतारी सड़क के बीचों-बीच खड़ी हुई
गान्धी की मूर्ति पर
बैठे हुए घुग्घू ने
गाना शुरु किया,
हिचकी की ताल पर
साँसों ने तब
मर जाना
शुरु किया,
टेलीफ़ून-खम्भों पर थमे हुए तारों ने
सट्टे के ट्रंक-कॉल-सुरों में
थर्राना और झनझनाना शुरु किया !
रात्रि का काला-स्याह
कन-टोप पहने हुए
आसमान-बाबा ने हनुमान-चालीसा
डूबी हुई बानी में गाना शुरु किया ।
मसान के उजाड़
पेड़ों की अंधियाली शाख पर
लाल-लाल लटके हुए
प्रकाश के चीथड़े--
हिलते हुए, डुलते हुए, लपट के पल्लू ।
सचाई के अध-जले मुर्दों की चिताओं की
फटी हुई, फूटी हुई दहक में कवियों ने
बहकती कविताएँ गाना शुरु किया ।
संस्कृति के कुहरीले धुएँ से भूतों के
गोल-गोल मटकों से चेहरों ने
नम्रता के घिघियाते स्वांग में
दुनिया को हाथ जोड़
कहना शुरु किया--
बुद्ध के स्तूप में
मानव के सपने
गड़ गये, गाड़े गये !!
ईसा के पंख सब
झड़ गये, झाड़े गये !!
सत्य की
देवदासी-चोलियाँ उतारी गयी
उघारी गयीं,
सपनों की आँते सब
चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!
बाक़ी सब खोल है,
ज़िन्दगी में झोल है !!
गलियों का सिन्दूरी विकराल
खड़ा हुआ भैरों, किन्तु,
हँस पड़ा ख़तरनाक
चांदनी के चेहरे पर
गलियों की भूरी ख़ाक
उड़ने लगी धूल और
सँवलायी नंगी हुई चाँदनी !

और, उस अँधियाले ताल के उस पार
नगर निहारता-सा खड़ा है पहाड़ एक
लोहे की नभ-चुम्भी शिला का चबूतरा
लोहांगी कहाता है
कि जिसके भव्य शीर्ष पर
बड़ा भारी खण्डहर
खण्डहर के ध्वंसों में बुज़ुर्ग दरख़्त एक
जिसके घने तने पर
लिक्खी है प्रेमियों ने
अपनी याददाश्तें,
लोहांगी में हवाएँ
दरख़्त में घुसकर
पत्तों से फुसफुसाती कहती हैं
नगर की व्यथाएँ
सभाओं की कथाएँ
मोर्चों की तड़प और
मकानों के मोर्चे
मीटिंगों के मर्म-राग
अंगारों से भरी हुई
प्राणों की गर्म राख
गलियों में बसी हुई छायाओं के लोक में
छायाएँ हिलीं कुछ
छायाएँ चली दो
मद्धिम चांदनी में
भैरों के सिन्दूरी भयावने मुख पर
छायीं दो छायाएँ
छरहरी छाइयाँ !!
रात्रि की थाहों में लिपटी हुई साँवली तहों में
ज़िन्दगी का प्रश्नमयी थरथर
थरथराते बेक़ाबू चांदनी के
पल्ले-सी उड़ती है गगन-कंगूरों पर ।
पीपल के पत्तों के कम्प में
चांदनी के चमकते कम्प से
ज़िन्दगी की अकुलायी थाहों के अंचल
उड़ते हैं हवा में !!

गलियों के आगे बढ़
बगल में लिये कुछ
मोटे-मोटे कागज़ों की घनी-घनी भोंगली
लटकाये हाथ में
डिब्बा एक टीन का
डिब्बे में धरे हुए लम्बी-सी कूँची एक
ज़माना नंगे-पैर
कहता मैं पेण्टर
शहर है साथ-साथ
कहता मैं कारीगर--
बरगद की गोल-गोल
हड्डियों की पत्तेदार
उलझनों के ढाँचों में
लटकाओ पोस्टर,
गलियों के अलमस्त
फ़क़ीरों के लहरदार
गीतों से फहराओ
चिपकाओ पोस्टर
कहता है कारीगर ।
मज़े में आते हुए
पेण्टर ने हँसकर कहा--
पोस्टर लगे हैं,
कि ठीक जगह
तड़के ही मज़दूर
पढ़ेंगे घूर-घूर,
रास्ते में खड़े-खड़े लोग-बाग
पढ़ेंगे ज़िन्दगी की
झल्लायी हुई आग !
प्यारे भाई कारीगर,
अगर खींच सकूँ मैं--
हड़ताली पोस्टर पढ़ते हुए
लोगों के रेखा-चित्र,
बड़ा मज़ा आयेगा ।
कत्थई खपरैलों से उठते हुए धुएँ
रंगों में
आसमानी सियाही मिलायी जाय,
सुबह की किरनों के रंगों में
रात के गृह-दीप-प्रकाश को आशाएँ घोलकर
हिम्मतें लायी जायँ,
स्याहियों से आँखें बने
आँखों की पुतली में धधक की लाल-लाल
पाँख बने,
एकाग्र ध्यान-भरी
आँखों की किरनें
पोस्टरों पर गिरे--तब
कहो भाई कैसा हो ?
कारीगर ने साथी के कन्धे पर हाथ रख
कहा तब--
मेरे भी करतब सुनो तुम,
धुएँ से कजलाये
कोठे की भीत पर
बाँस की तीली की लेखनी से लिखी थी
राम-कथा व्यथा की
कि आज भी जो सत्य है
लेकिन, भाई, कहाँ अब वक़्त है !!
तसवीरें बनाने की
इच्छा अभी बाक़ी है--
ज़िन्दगी भूरी ही नहीं, वह ख़ाकी है ।
ज़माने ने नगर के कन्धे पर हाथ रख
कह दिया साफ़-साफ़
पैरों के नखों से या डण्डे की नोक से
धरती की धूल में भी रेखाएँ खींचकर
तसवीरें बनाती हैं
बशर्ते कि ज़िन्दगी के चित्र-सी
बनाने का चाव हो
श्रद्धा हो, भाव हो ।
कारीगर ने हँसकर
बगल में खींचकर पेण्टर से कहा, भाई
चित्र बनाते वक़्त
सब स्वार्थ त्यागे जायँ,
अंधेरे से भरे हुए
ज़ीने की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती जो
अभिलाषा--अन्ध है
ऊपर के कमरे सब अपने लिए बन्द हैं
अपने लिए नहीं वे !!
ज़माने ने नगर से यह कहा कि
ग़लत है यह, भ्रम है
हमारा अधिकार सम्मिलित श्रम और
छीनने का दम है ।
फ़िलहाल तसवीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे ।
हम धधकायेंगे ।
मानो या मानो मत
आज तो चन्द्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है !!
वेदना के रक्त से लिखे गये
लाल-लाल घनघोर
धधकते पोस्टर
गलियों के कानों में बोलते हैं
धड़कती छाती की प्यार-भरी गरमी में
भाफ-बने आँसू के ख़ूँख़ार अक्षर !!
चटाख से लगी हुई
रायफ़ली गोली के धड़ाकों से टकरा
प्रतिरोधी अक्षर
ज़माने के पैग़म्बर
टूटता आसमान थामते हैं कन्धों पर
हड़ताली पोस्टर
कहते हैं पोस्टर--
आदमी की दर्द-भरी गहरी पुकार सुन
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह ख़ूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
बूढ़ी माँ के झुर्रीदार
चेहरे पर छाये हुए
आँखों में डूबे हुए
ज़िन्दगी के तजुर्बात
बोलते हैं एक साथ
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
चिल्लाते हैं पोस्टर ।
धरती का नीला पल्ला काँपता है
यानी आसमान काँपता है,
आदमी के ह्रदय में करुणा कि रिमझिम,
काली इस झड़ी में
विचारों की विक्षोभी तडित् कराहती
क्रोध की गुहाओं का मुँह खोले
शक्ति के पहाड़ दहाड़ते
काली इस झड़ी में वेदना की तडित् कराहती
मदद के लिए अब,
करुणा के रोंगटों में सन्नाटा
दौड़ पड़ता आदमी,
व आदमी के दौड़ने के साथ-साथ
दौड़ता जहान
और दौड़ पड़ता आसमान !!

मुहल्ले के मुहाने के उस पार
बहस छिड़ी हुई है,
पोस्टर पहने हुए
बरगद की शाखें ढीठ
पोस्टर धारण किये
भैंरों की कड़ी पीठ
भैंरों और बरगद में बहस खड़ी हुई है
ज़ोरदार जिरह कि कितना समय लगेगा
सुबह होगी कब और
मुश्किल होगी दूर कब
समय का कण-कण
गगन की कालिमा से
बूंद-बूंद चू रहा
तडित्-उजाला बन !!
-गजानन माधव मुक्तिबोध

साभार : चाँद का मुँह टेढ़ा है





Chaand ka muh tedha hai

nagar ke bicho-bich
aadhi raat- andhere ki kali syah
shilao se bani hui
bheeto aur ahato ke, kaanch-tukde jame hue
unche-unche kandho par
chandani ki faili hui sanwlayi jhalre
karkhana-ahate ke us paar
dhumr mukh chimniyo ke unche-unche
udgar-chinhakar-meenar
meenaro ke bicho-beech
chanda ka hai tedha munh!!
bhayanak syah san tirpan ka chand wah!!
gagan me karfyu hai
dharti par chupchap zahrili chhee thoo hai !!
peepal ke khali pade ghoslo me panchiyon ke
pethe hai khali hue kartoos
ganje-sir chand ki sanwalayi kirno ke jasoos
saam-sum nagar me dheere-dheere ghum-gham
nagar ke kono ke tikono me chhipe hai !!
chaand ki kankhiyon ki kon-gami kirne
pili-pili roshni ki, bichhati hai
andhere me, pattiyan
dekhti hai nagar ki zindagi ka tuta-phuta
udas prasar wah

sameep vishalkar
adhiyale laal par
sunepan ki syahi me dubi hui
chandani bhi sanvlayi hui hai !!

bhimakar pulo ke bahut niche, bhaybheet
manushya-basti ke biyaban tato par
bahte hue pathrile naalo ki dhara me
dharashayi chandani ke honth kale pad gaye

harijan galiyon me
latki hai ped par
kuhse ke bhute ki sanvali chunri
chunri me atki hai kanji aankh ganje-sir
tedhe-munh chaand ki

barah ka waqt hai,
bhusbhuse ujale ka phusphusata shadyantr
shahar mein charo aur
zamana bhi sakht hai

aji, is mod par
bargad ki ghanghor shakhao ki ghathiyal
ajgari mehrab--
mare hue zamano ki sangthit chhayao me
basi hui
sadi-busi baas liye
faili hai gali ke
muhane mein chupchap
logo ke are ! aane-jane me chupchap
ajgari kamani se girti hai tip-tip
fadfadate panchhiyon ki beet--
mano samay ki beet ho!!
gagan mein curfue hai,
vriksho me baithe hue panchhiyon par curfue hai
dharti par kintu aji ! zahrili chhee thoo hai

bargad ki daal ek
muhane se aage phail
sadak par bahari
latkati hai is tarah
mano ki aadmi ke janam ke pahle se
prithvi ki chhati par
jangali maimath ki sund sungh rahi ho
hawa ke zahrile sifro ko aaj bhi
bargad ko ghani-ghani chhav me
phuti hui chudhiyon ki suni-suni kalai-si
suni-suni galiyon me
gareebo ke thaav me
chaurah par khade hue
bhairo ki sinduri
gerui murat ke pathrile vynagya smit par
tedhe munh chaand ki aiyari roshni
tilismi chaand ki raaz-bhari jhaaiyan!!
tajurbo ka taboot
zinda wah bargad
janta ki bhaero yah kaun hai!!
ki bhairo ki chattani peeth par
pairo ki majboot
patthari-sinduri eit par
bhabhkate varno ke lakate postar
jwlant akshar!!

samne hai adhiyala taal aur
syah usi taal par
sanvlayi chandani
samay ka ghantaghar
nirakar ghantaghar
gagan me chupchap anakar khada hai !!
parantu, parantu ... batlate
zindagi ke kaante hi
kitni raat beet gayi

chappalo ki chhapchhap
gali ke muhare se ajeeb si aawaz
fusfusate hue shabd
jangal ki daalo se gujarti hawao ki sarsar
gali me jyo kah jaay
isharo ke aashay,
hawao ki lahro ke aakar
kinhi brimharakshaso ke nirakar
anakar
mano bahas chhed dein
bahas jaise badh jaay
nirnay par chali aay
waise shabd baar-baar
galiyon ki aatma mein
bolte hai ekaek
andhere ke pet me se
jwalao ki aant bahar nikal aay
waise, are, shabdo ki dhaar ek
bijli ke tourch ki roshni ki maar ek
bargad ke khurdare ajgari tane par
phail gayi aksmaat
bargad ke khurdare ajgari tane par
phail gaye haath do
mano hriday me chhipi hui baato ne sahsa
andhere se baahar aa bhujaye pasari hon
phaile gaye haath do
chpka gaye postar
baanke tirchhe varn aur
laal nile ghanghor
hadtali akshar
inhi halchalo ke hi karan to sahsa
bargad me pale hue pankho ki dari hui
chauki hui ajeeb-si gandi fadfad
andhere ki aatma se karte hue shikayat
kaanv-kaanv karte hue pakshiyon ke jamghat
udne lage aksmaat
maano andhere ke
hriday me sandehi shankao ke pakshaghat!!
maddhim chandani me ekaek ekaek
khaprailo par thahar gayi
billi ek chupchap
rajani ke niji guptcharo ki pratinidhi
puchh uthaye wah
jangali tej
aankh
phailaye
yamdut-putri-si
(sabhi deh syah, par
panje sirf shwet aur
khoon tapkate hue nakhoon)
dekhti hai marzaar
chipkata kaun hai
makano ki peeth par
ahato ki bheet par
bargad ki ajgari daalo ke fando par
andhere ke kandho par
chipkata kaun hai?
chipkata kaun hai?
hadtali postar
bade-bade akshar
banke-tirchhe varn aur
lambe-chhoude ghanghor
laal-nile bhayankar
hadtali postar!!!
tedhe-munh chaand ki aiyari roshni bhi khub hai
makan-makan ghus lohe ke gazo ki jali
ke jharokho ko paar kar
lipe hue kamre me
jel ke kapde-si phaili hai chandani
door-door kali-kali
ghariyon ke bade-bade choukhatto ke mote-mote
kapde-si phaili hai
leti hai jalidar jharokhe se aayi hui
jel sujhati hui aiyari roshni !!
andhiyale taal par
kale ghine pankho ke baar-baar
chakkro ke mandrate vistaar
ghina chimgadar-dal bhatkata hai charo aur
mano aham ke avruddh
apawan ashuddh ghere me ghire hue
napunsak pankho ki chhatpatati raftar
ghina chimgadad-dal
bhatkata hai pyasa-sa
buddhi ki aankho me
swartho ke shishe-sa

bargad ko kintu sab
pata tha itihas
koltari sadak par khade hue sarvochch
gandhi ke putle par
baithe hue aankho ke do chakra
yani ki ghugghu ek
tilak ke putle par
baithe hue gugghu se
batcheet karte hue
kahta hi jata hai
... msaaan me ... maine bhi siddhi ki, dekho mooth maar di manushyo par is tarah....
tilak ke putle par baithe hue ghugghu ne
dekha ki bhayanak laal mooth
kaale aasmaan me
tairati-si dhire-dhire ja rahi

udgaar-chinhakar vikral
tairata tha lal-lal!!
dekh, usne kahan ki waah-waah
raat ke jahapanah
isiliye aaj-kal
dil ke ujale me bhi andhere ki aankh hia
ratri ki kaankho me dabi hui
sanskriti-pakhi ke pankh hai surakshit
... pi gaya aasmaan
ratri ki andhiyali sachhaiyan ghont ke
manushyon ko marne ke khoob hai yen totke
gagan me curfue hai
zamane me zordar zahrili chhee thoo hai
sarafe me bijli ke budam
khambho par latke hue maddhim
dimag me dhundh hai
chinta hai satte ki hriday-vinashini
ratri ki kali syah
kadahi se aksmaat
sadko par phail gayi
satyo ki mithai ki chashani

tedhe-munh chaand ki aiyari roshani
bhimakar pulo ke
theek niche baithkar
choro-si uchkko si
nalo aur jharno ke tato par
kinare-nikare chal
pani par jhuke hue
pedho ke niche baith
raat-be-raat wah
machliya fasati hai
awara machhuo-si shohdo si chandani
sadko ke pichhwade
tute-phute drishyo me

Gandagee ke kaale-se naale ke jhaag par
badamast kalpanaa-see failee thee raat-bhar
sex ke kaston ke kaviyon ke kaam-see !
Kingsave men mashahoor
raat kee hai zaindagee !
Sadkon kee shreemaan
bhaarateey firangi dukaan,
sugandhit prakaash men chamachamaataa iimaan
rngeen chamakatee cheezaon ke surabhit
sparshon men
sheeshon kee suvishaal jhaaniyon ke ramanaeey
drishyon men
basee thee chaandanee
khoobasoorat amareekee maigzaeen-pristhon-see
khulee thee,
nngee-see naariyon ke
ughare hue angon ke
vibhinn pozaon me
letee thee chaandanee
safed
underwear-si, aadhunik prateekon men
failee thee
chaandani !
curfue naheen yahaan, pasandagee... Sandalee,
kingsave men mashahoor raat kee hai zaindagee

ajee, yah chaandanee bhee badee masakharee hai !!
Timnzale kee ek
khidkee men billee ke safed dhabbe-see
chamakatee huii vah
sametakar haath-paanv
kisee kee taak men
baithee huii chupachaap
dheere se utaratee hai
raaston par pathon par;
chadhtee hai chhaton par
gailaree men ghoom aur
khaparailon par chadhkar
neemon kee shaakhon ke sahaare
aangan men utarakar
kamaron men halake-paanv
dekhatee hai, khojatee hai--
shahar ke konon ke tikone men chhupee huii
chaandanee
sadk ke pedon ke gumbadon par chadhkar
mahal ulaangh kar
muhalle paar kar
galiyon kee guhaa_on men dabe-paanv
khuphaiyaa suraaga men
guptacharee taak men
jamee huii khojatee hai kaun vah
kandhon par andhere ke
chipakaataa kaun hai
bhadkeele postar,
lambe-chaude varna aur
baanke-tirachhe ghanaghor
laal-neele aksar.
Kolataaree sadk ke beechon-beech khadee huii
gaandhee kee moorti par
baithe hue ghugghoo ne
gaanaa shuru kiyaa,
hichakee kee taal par
saanson ne tab
mar jaanaa
shuru kiyaa,
teleephaoon-khambhon par thame hue taaron ne
satte ke trnk-kŏl-suron men
tharraanaa aur jhanajhanaanaa shuru kiyaa!
Raatri kaa kaalaa-syaah
kan-top pahane hue
aasamaan-baabaa ne hanumaan-chaaleesaa
daoobee huii baanee men gaanaa shuru kiyaa.
Masaan ke ujaad
pedon kee andhiyaalee shaakh par
laal-laal latake hue
prakaash ke cheethade--
hilate hue, daulate hue, lapat ke palloo.
Sachaa_ii ke adh-jale murdon kee chitaa_on kee
fatee huii, footee huii dahak men kaviyon ne
bahakatee kavitaa_en gaanaa shuru kiyaa.
Snskriti ke kuhareele dhuen se bhooton ke
gol-gol matakon se cheharon ne
namrataa ke ghighiyaate svaang men
duniyaa ko haath jod
kahanaa shuru kiyaa--
buddh ke stoop men
maanav ke sapane
gad gaye, gaade gaye !! Iisaa ke pnkh sab
jhad gaye, jhaade gaye !! Saty kee
devadaasee-choliyaan utaaree gayee
ughaaree gayeen,
sapanon kee aante sab
cheeree gayeen, faadee gayeen !! Baaqaee sab khol hai,
zaindagee men jhol hai !! Galiyon kaa sindooree vikaraal
khadaa huaa bhairon, kintu,
hns padaa khataranaak
chaandanee ke chehare par
galiyon kee bhooree khaak
udne lagee dhool aur
snvalaayee nngee huii chaandanee !
Aur, us andhiyaale taal ke us paar
nagar nihaarataa-saa khadaa hai pahaad ek
lohe kee nabh-chumbhee shilaa kaa chabootaraa
lohaangee kahaataa hai
ki jisake bhavy sheers par
badaa bhaaree khanadaahar
khanadaahar ke dhvnson men buzaurg darakhat ek
jisake ghane tane par
likkhee hai premiyon ne
apanee yaadadaashten,
lohaangee men havaa_en
darakhat men ghusakar
patton se fusafusaatee kahatee hain
nagar kee vyathaa_en
sabhaa_on kee kathaa_en
morchon kee tadp aur
makaanon ke morche
meetingon ke marm-raag
angaaron se bharee huii
praanaon kee garm raakh
galiyon men basee huii chhaayaa_on ke lok men
chhaayaa_en hileen kuchh
chhaayaa_en chalee do
maddhim chaandanee men
bhairon ke sindooree bhayaavane mukh par
chhaayeen do chhaayaa_en
chharaharee chhaa_iyaan !!
Raatri kee thaahon men lipatee huii saanvalee tahon men
zaindagee kaa prashnamayee tharathar
tharatharaate beqaaboo chaandanee ke
palle-see udtee hai gagan-kngooron par.
Peepal ke patton ke kamp men
chaandanee ke chamakate kamp se
zaindagee kee akulaayee thaahon ke anchal
udte hain havaa men !! Galiyon ke aage badh
bagal men liye kuchh
mote-mote kaagazaon kee ghanee-ghanee bhongalee
latakaaye haath men
daibbaa ek teen kaa
daibbe men dhare hue lambee-see koonchee ek
zamaanaa nnge-pair
kahataa main penatar
shahar hai saath-saath
kahataa main kaareegar--
baragad kee gol-gol
hadadaiyon kee pattedaar
ulajhanon ke dhaanchon men
latakaa_o postar,
galiyon ke alamast
phaqaeeron ke laharadaar
geeton se faharaa_o
chipakaa_o postar
kahataa hai kaareegar . Mazae men aate hue
penatar ne hnsakar kahaa--
postar lage hain,
ki theek jagah
tadke hee mazadoor
padhenge ghoor-ghoor,
raaste men khade-khade log-baag
padhenge zaindagee kee
jhallaayee huii aag ! Pyaare bhaa_ii kaareegar,
agar kheench sakoon main--
hadtaalee postar padhte hue
logon ke rekhaa-chitr,
badaa mazaa aayegaa.
Kattha_ii khaparailon se uthate hue dhuen
rngon men
aasamaanee siyaahee milaayee jaay,
subah kee kiranon ke rngon men
raat ke grih-deep-prakaash ko aashaa_en gholakar
himmaten laayee jaayn,
syaahiyon se aankhen bane
aankhon kee putalee men dhadhak kee laal-laal
paankh bane,
ekaagr dhyaan-bharee
aankhon kee kiranen
postaron par gire--tab
kaho bhaa_ii kaisaa ho ?
Kaareegar ne saathee ke kandhe par haath rakh
kahaa tab--
mere bhee karatab suno tum,
dhuen se kajalaaye
kothe kee bheet par
baans kee teelee kee lekhanee se likhee thee
raam-kathaa vyathaa kee
ki aaj bhee jo saty hai
lekin, bhaa_ii, kahaan ab vaqat hai !!
Tasaveeren banaane kee
ichchhaa abhee baaqaee hai--
zaindagee bhooree hee naheen, vah khaakee hai.
Zamaane ne nagar ke kandhe par haath rakh
kah diyaa saapha-saapha
pairon ke nakhon se yaa daanadae kee nok se
dharatee kee dhool men bhee rekhaa_en kheenchakar
tasaveeren banaatee hain
basharte ki zaindagee ke chitr-see
banaane kaa chaav ho
shraddhaa ho, bhaav ho.
Kaareegar ne hnsakar
bagal men kheenchakar penatar se kahaa, bhaa_ii
chitr banaate vaqat
sab svaarth tyaage jaayn,
andhere se bhare hue
zaeene kee seedhiyaan chadhtee-utaratee jo
abhilaasaa--andh hai
oopar ke kamare sab apane lie band hain
apane lie naheen ve !!
Zamaane ne nagar se yah kahaa ki
galat hai yah, bhram hai
hamaaraa adhikaar sammilit shram aur
chheenane kaa dam hai.
Phailahaal tasaveeren
is samay ham
naheen banaa paayenge
alabattaa postar ham lagaa jaayenge.
Ham dhadhakaayenge.
Maano yaa maano mat
aaj to chandr hai, savitaa hai,
postar hee kavitaa hai !! Vedanaa ke rakt se likhe gaye
laal-laal ghanaghor
dhadhakate postar
galiyon ke kaanon men bolate hain
dhadkatee chhaatee kee pyaar-bharee garamee men
bhaaf-bane aansoo ke khaoonkhaar aksar !!
Chataakh se lagee huii
raayaphalee golee ke dhadaakon se takaraa
pratirodhee aksar
zamaane ke paigambar
tootataa aasamaan thaamate hain kandhon par
hadtaalee postar
kahate hain postar--
aadamee kee dard-bharee gaharee pukaar sun
padtaa hai daud jo
aadamee hai vah khaoob
jaise tum bhee aadamee
vaise main bhee aadamee,
boodhi maan ke jhurreedaar
chehare par chhaaye hue
aankhon men daoobe hue
zaindagee ke tajurbaat
bolate hain ek saath
jaise tum bhee aadamee
vaise main bhee aadamee,
chillaate hain postar.
Dharatee kaa neelaa pallaa kaanpataa hai
yaanee aasamaan kaanpataa hai,
aadamee ke hraday men karunaa ki rimajhim,
kaalee is jhadee men
vichaaron kee viksobhee tadait karaahatee
krodh kee guhaa_on kaa munh khole
shakti ke pahaad dahaadte
kaalee is jhadee men vedanaa kee tadait karaahatee
madad ke lie ab,
karunaa ke rongaton men sannaataa
daud padtaa aadamee,
v aadamee ke daudne ke saath-saath
daudtaa jahaan
aur daud padtaa aasamaan !!

Muhalle ke muhaane ke us paar
bahas chhidee huii hai,
postar pahane hue
baragad kee shaakhen dheeth
postar dhaarana kiye
bhainron kee kadee peeth
bhainron aur baragad men bahas khadee huii hai
zaoradaar jirah ki kitanaa samay lagegaa
subah hogee kab aur
mushkil hogee door kab
samay kaa kana-kana
gagan kee kaalimaa se
boond-boond choo rahaa
tadait-ujaalaa ban !!
- Gajnan Madhav Muktibodh

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a-r-azad,1,aadil-rasheed,1,aalam-khurshid,2,aale-ahmad-suroor,1,aam,1,aanis-moin,6,aankhe,1,aas-azimabadi,1,aashmin-kaur,1,aashufta-changezi,1,aatif,1,aatish-indori,4,aawaz,4,abbas-ali-dana,1,abbas-tabish,1,abdul-ahad-saaz,3,abdul-hameed-adam,3,abdul-malik-khan,1,abdul-qavi-desnavi,1,abhishek-kumar,1,abhishek-kumar-ambar,5,abid-ali-abid,1,abid-husain-abid,1,abrar-danish,1,abrar-kiratpuri,3,abu-talib,1,achal-deep-dubey,2,ada-jafri,2,adam-gondvi,7,adil-hayat,1,adil-lakhnavi,1,adnan-kafeel-darwesh,2,afsar-merathi,4,agyeya,5,ahmad-faraz,11,ahmad-hamdani,1,ahmad-kamal-parwazi,3,ahmad-nadeem-qasmi,6,ahmad-nisar,3,ahmad-wasi,1,ahsaan-bin-danish,1,ajay-agyat,2,ajay-pandey-sahaab,3,ajmal-ajmali,1,ajmal-sultanpuri,1,akbar-allahabadi,5,akhtar-ansari,2,akhtar-nazmi,2,akhtar-shirani,7,akhtar-ul-iman,1,akib-javed,1,ala-chouhan-musafir,1,aleena-itrat,1,alhad-bikaneri,1,ali-sardar-jafri,6,alif-laila,63,allama-iqbal,9,alok-shrivastav,9,alok-yadav,1,aman-akshar,1,aman-chandpuri,1,ameer-qazalbash,2,amir-meenai,2,amir-qazalbash,3,amn-lakhnavi,1,amrita-pritam,3,amritlal-nagar,1,aniruddh-sinha,2,anjum-rehbar,1,anton-chekhav,1,anurag-sharma,1,anuvad,2,anwar-jalalabadi,2,anwar-jalalpuri,6,anwar-masud,1,aqeel-nomani,2,armaan-khan,2,arpit-sharma-arpit,3,arsh-malsiyani,5,arthur-conan-doyle,1,article,52,arzoo-lakhnavi,1,asar-lakhnavi,1,asgar-gondvi,2,asgar-wajahat,1,asharani-vohra,1,ashok-anjum,1,ashok-babu-mahour,3,ashok-chakradhar,2,ashok-lal,1,ashok-mizaj,9,asim-wasti,1,aslam-allahabadi,1,aslam-kolsari,1,asrar-ul-haq-majaz-lakhnavi,10,atal-bihari-vajpayee,2,ataur-rahman-tariq,1,ateeq-allahabadi,1,athar-nafees,1,atul-ajnabi,3,atul-kannaujvi,1,audio-video,63,avanindra-bismil,1,ayodhya-singh-upadhyay-hariaudh,4,azad-gulati,2,azad-kanpuri,1,azhar-hashmi,1,azhar-sabri,2,azharuddin-azhar,1,aziz-ansari,2,aziz-azad,2,aziz-qaisi,2,azm-bahjad,1,baba-nagarjun,3,bachpan,3,badnam-shayar,1,bahadur-shah-zafar,7,bahan,7,bal-kahani,4,bal-kavita,75,bal-sahitya,82,baljeet-singh-benaam,7,balmohan-pandey,1,balswaroop-rahi,2,baqar-mehandi,1,barish,12,bashar-nawaz,2,bashir-badr,24,basudeo-agarwal-naman,5,bedil-haidari,1,beena-goindi,1,bekal-utsahi,7,bekhud-badayuni,1,betab-alipuri,2,bewafai,12,bhagwati-charan-verma,1,bhagwati-prasad-dwivedi,1,bhaichara,7,bharat-bhushan,1,bharat-bhushan-agrawal,1,bhartendu-harishchandra,3,bhawani-prasad-mishra,1,bholenath,5,bimal-krishna-ashk,1,biography,37,birthday,3,bismil-allahabadi,1,bismil-azimabadi,1,bismil-bharatpuri,1,braj-narayan-chakbast,2,chaand,1,chai,11,chand-sheri,7,chandra-moradabadi,2,chandrabhan-kaifi-dehelvi,1,chandrakant-devtale,5,charagh-sharma,2,charkh-chinioti,1,charushila-mourya,3,chinmay-sharma,1,christmas,4,corona,6,d-c-jain,1,daagh-dehlvi,16,darvesh-bharti,1,deepak-mashal,1,deepak-purohit,1,deepawali,19,delhi,3,deshbhakti,37,devendra-arya,1,devendra-dev,23,devendra-gautam,7,devesh-dixit-dev,11,devesh-khabri,1,devkinandan-shant,1,devotional,7,dhruv-aklavya,1,dhumil,2,dikshit-dankauri,1,dil,104,dilawar-figar,1,dinesh-darpan,1,dinesh-kumar,1,dinesh-pandey-dinkar,1,dohe,2,doodhnath-singh,3,dosti,16,dr-urmilesh,1,dua,1,dushyant-kumar,9,dwarika-prasad-maheshwari,3,dwijendra-dwij,1,ehsan-saqib,1,eid,14,elizabeth-kurian-mona,5,faheem-jozi,1,fahmida-riaz,2,faiz-ahmad-faiz,16,faiz-ludhianvi,2,fana-buland-shehri,1,fana-nizami-kanpuri,1,fani-badayuni,2,fareed-javed,1,fareed-khan,1,farhat-abbas-shah,1,farooq-anjum,1,farooq-nazki,1,fathers-day,8,fatima-hasan,2,fauziya-rabab,1,fayyaz-gwaliyari,1,fazal-tabish,1,fazil-jamili,1,fazlur-rahman-hashmi,2,fikr,2,filmy-shayari,1,firaq-gorakhpuri,6,firaq-jalalpuri,1,firdaus-khan,1,gajanan-madhav-muktibodh,5,gajendra-solanki,1,gamgin-dehlavi,1,gandhi,10,ganesh,2,ganesh-bihari-tarz,1,ganesh-gaikwad-aaghaz,1,garmi,9,ghalib-serial,1,ghani-ejaz,1,ghazal,1077,ghazal-jafri,1,ghulam-hamdani-mushafi,1,girijakumar-mathur,2,golendra-patel,1,gopal-babu-sharma,1,gopal-krishna-saxena-pankaj,1,gopaldas-neeraj,8,gulzar,17,gurpreet-kafir,1,gyanendrapati,2,gyanprakash-vivek,2,habeeb-kaifi,1,habib-jalib,5,habib-tanveer,1,hafeez-jalandhari,3,hafeez-merathi,1,haidar-ali-aatish,5,haidar-ali-jafri,1,haidar-bayabani,2,hamd,1,hameed-jalandhari,1,hamidi-kashmiri,1,hanif-danish-indori,1,hanumant-sharma,1,hanumanth-naidu,2,harendra-singh-kushwah-ehsas,1,hariom-panwar,1,harishankar-parsai,4,harivansh-rai-bachchan,4,harshwardhan-prakash,1,hasan-abidi,1,hasan-naim,1,haseeb-soz,2,hashim-azimabadi,1,hashmat-kamal-pasha,1,hasrat-mohani,3,hastimal-hasti,5,hazal,2,heera-lal-falak-dehlvi,1,hilal-badayuni,1,himayat-ali-shayar,1,hindi,15,hiralal-nagar,2,holi,26,humaira-rahat,1,ibne-insha,8,iftikhar-naseem,1,iftikhar-raghib,1,imam-azam,1,imran-aami,1,imran-badayuni,6,imtiyaz-sagar,1,insha-allah-khaan-insha,1,iqbal-ashhar,1,iqbal-azeem,1,iqbal-bashar,1,iqra-afiya,1,irfan-ahmad-mir,1,irfan-siddiqi,1,irtaza-nishat,1,ishq,98,ismail-merathi,2,ismat-chughtai,2,izhar,5,jagan-nath-azad,5,jaishankar-prasad,4,jameel-malik,2,jamiluddin-aali,4,jamuna-prasad-rahi,1,jan-nisar-akhtar,11,janan-malik,1,jauhar-rahmani,1,jaun-elia,11,javed-akhtar,15,jawahar-choudhary,1,jazib-afaqi,2,jazib-qureshi,2,jigar-moradabadi,10,johar-rana,1,josh-malihabadi,7,julius-naheef-dehlvi,1,jung,7,k-k-mayank,2,kabir,1,kafeel-aazar-amrohvi,1,kaif-ahmed-siddiqui,1,kaif-bhopali,6,kaifi-azmi,10,kaifi-wajdaani,1,kaka-hathrasi,1,kalim-ajiz,1,kamala-das,1,kamlesh-bhatt-kamal,1,kamlesh-sanjida,1,kamleshwar,1,kanhaiya-lal-kapoor,1,kanval-dibaivi,1,kashif-indori,1,kausar-siddiqi,1,kavi-kulwant-singh,1,kavita,177,kavita-rawat,1,kedarnath-agrawal,4,kedarnath-singh,1,khalid-mahboob,1,khalil-dhantejvi,1,khat-letters,10,khawar-rizvi,2,khazanchand-waseem,1,khudeja-khan,1,khumar-barabankvi,4,khurram-tahir,1,khurshid-rizvi,1,khwaja-meer-dard,4,kishwar-naheed,2,krishankumar-chaman,1,krishn-bihari-noor,9,krishna,9,krishna-kumar-naaz,5,kuldeep-salil,1,kumar-pashi,1,kumar-vishwas,2,kunwar-bechain,9,kunwar-narayan,5,lala-madhav-ram-jauhar,2,lata-pant,1,lavkush-yadav-azal,3,leeladhar-mandloi,1,liaqat-jafri,1,lori,2,lovelesh-dutt,1,maa,23,madhavikutty,1,madhavrao-sapre,1,madhusudan-choube,1,mahadevi-verma,3,mahaveer-uttranchali,5,mahboob-khiza,1,mahendra-matiyani,1,mahesh-chandra-gupt-khalish,2,mahmood-zaki,1,mahwar-noori,1,maikash-amrohavi,1,mail-akhtar,1,maithilisharan-gupt,2,majdoor,12,majnoon-gorakhpuri,1,majrooh-sultanpuri,5,makhanlal-chaturvedi,2,makhdoom-moiuddin,7,makhmoor-saeedi,1,mangal-naseem,1,manglesh-dabral,4,manish-verma,3,mannan-qadeer-mannan,1,manoj-ehsas,1,manzoor-hashmi,2,manzoor-nadeem,1,maroof-alam,20,masooda-hayat,2,masoom-khizrabadi,1,matlabi,3,mazhar-imam,2,meena-kumari,14,meer-anees,1,meer-taqi-meer,10,meeraji,1,mehr-lal-soni-zia-fatehabadi,5,meraj-faizabadi,3,milan-saheb,2,mirza-ghalib,60,mirza-muhmmad-rafi-souda,1,mirza-salaamat-ali-dabeer,1,mithilesh-baria,1,miyan-dad-khan-sayyah,1,mohammad-ali-jauhar,1,mohammad-alvi,6,mohammad-deen-taseer,3,mohammad-khan-sajid,1,mohit-negi-muntazir,3,mohsin-bhopali,1,mohsin-kakorvi,1,mohsin-naqwi,2,moin-ahsan-jazbi,2,momin-khan-momin,4,motivational,2,mout,3,mrityunjay,1,mubarik-siddiqi,1,muhammad-asif-ali,1,muktak,1,mumtaz-hasan,3,mumtaz-rashid,1,munawwar-rana,26,munikesh-soni,2,munir-anwar,1,munir-niazi,3,munshi-premchand,10,murlidhar-shad,1,mushfiq-khwaza,1,mustafa-akbar,1,mustafa-zaidi,2,mustaq-ahmad-yusufi,1,muzaffar-hanfi,24,muzaffar-warsi,2,naat,1,naiyar-imam-siddiqui,1,naqaab,1,narayan-lal-parmar,3,naresh-chandrakar,1,naresh-saxena,4,naseem-ajmeri,1,naseem-azizi,1,naseem-nikhat,1,naseer-turabi,1,nasir-kazmi,8,naubahar-sabir,1,navin-c-chaturvedi,1,navin-mathur-pancholi,1,nazeer-akbarabadi,16,nazeer-baaqri,1,nazeer-banarasi,5,nazim-naqvi,1,nazm,177,nazm-subhash,2,neeraj-ahuja,1,neeraj-goswami,2,new-year,14,nida-fazli,30,nirankar-dev-sewak,1,nirmal-verma,3,nizam-fatehpuri,24,nomaan-shauque,4,nooh-aalam,2,nooh-naravi,1,noon-meem-rashid,2,noor-bijnauri,1,noor-indori,1,noor-mohd-noor,1,noor-muneeri,1,noshi-gilani,1,noushad-lakhnavi,1,nusrat-karlovi,1,obaidullah-aleem,3,om-prakash-yati,1,omprakash-yati,1,pandit-harichand-akhtar,4,parasnath-bulchandani,1,parveen-fana-saiyyad,1,parveen-shakir,12,parvez-muzaffar,5,parvez-waris,3,pash,7,patang,13,pawan-dixit,1,payaam-saeedi,1,perwaiz-shaharyar,2,phanishwarnath-renu,2,poonam-kausar,1,prabhudayal-shrivastava,1,pradeep-kumar-singh,1,pradeep-tiwari,1,prakhar-malviya-kanha,2,pratap-somvanshi,5,pratibha-nath,1,prem-lal-shifa-dehlvi,1,prem-sagar,1,purshottam-abbi-azar,2,pushyamitra-upadhyay,1,qaisar-ul-jafri,3,qamar-ejaz,2,qamar-jalalabadi,3,qamar-moradabadi,1,qateel-shifai,8,quli-qutub-shah,1,quotes,2,raaz-allahabadi,1,rabindranath-tagore,2,rachna-nirmal,3,rahat-indori,28,rahi-masoom-raza,6,rais-amrohvi,2,rajeev-kumar,1,rajendra-nath-rehbar,1,rajesh-joshi,1,rajesh-reddy,7,rajmangal,1,rakhi,4,ram,33,ram-meshram,1,ram-prakash-bekhud,1,rama-singh,1,ramapati-shukla,4,ramchandra-shukl,1,ramcharan-raag,2,ramdhari-singh-dinkar,5,ramesh-chandra-shah,1,ramesh-dev-singhmaar,1,ramesh-kaushik,1,ramesh-siddharth,1,ramesh-tailang,1,ramesh-thanvi,1,ramkrishna-muztar,1,ramkumar-krishak,1,ramnaresh-tripathi,1,ranjan-zaidi,2,ranjeet-bhattachary,1,rasaa-sarhadi,1,rashid-kaisrani,1,rauf-raza,4,ravinder-soni-ravi,1,rawan,3,rayees-figaar,1,raza-amrohvi,1,razique-ansari,13,rehman-musawwir,1,rekhta-pataulvi,7,review,11,rounak-rashid-khan,2,roushan-naginvi,1,rukhsana-siddiqui,2,saadat-hasan-manto,8,saadat-yaar-khan-rangeen,1,saaz-jabalpuri,1,saba-sikri,1,sabir-indoree,1,sachin-shashvat,2,sadanand-shahi,2,saeed-kais,2,safdar-hashmi,4,safir-balgarami,1,saghar-khayyami,1,saghar-nizami,2,sahir-hoshiyarpuri,1,sahir-ludhianvi,18,sajid-hashmi,1,sajjad-zaheer,1,salahuddin-ayyub,1,salam-machhli-shahri,2,salman-akhtar,4,samar-pradeep,6,sameena-raja,1,sanjay-dani-kansal,1,sanjay-grover,3,sansmaran,9,saqi-faruqi,3,sara-shagufta,5,saraswati-kumar-deepak,2,saraswati-saran-kaif,2,sardaar-anjum,2,sardar-aasif,1,sardi,1,sarfaraz-betiyavi,1,sarshar-siddiqui,1,sarveshwar-dayal-saxena,6,satire,15,satish-shukla-raqeeb,1,satlaj-rahat,3,satpal-khyal,1,seema-fareedi,1,seemab-akbarabadi,2,seemab-sultanpuri,1,shabeena-adee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जखीरा, साहित्य संग्रह | उर्दू हिन्दी साहित्य संग्रह: चाँद का मुँह टेढ़ा है - गजानन माधव मुक्तिबोध
चाँद का मुँह टेढ़ा है - गजानन माधव मुक्तिबोध
हरिजन गलियों में लटकी है पेड़ पर कुहासे के भूतों की साँवली चूनरी-- चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर टेढ़े-मुँह चांद की ।
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जखीरा, साहित्य संग्रह | उर्दू हिन्दी साहित्य संग्रह
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