dhruv-aklavya

लज्ज़ा - एकलव्य

लज्ज़ा ! वो तोल रही लज्ज़ा ! अपनी वो मोल रही लज्ज़ा ! अपनी वो खोल रही है मन के द्वार वो जला रही करुणा ! अपनी वो छुपा रही पवित्र ! शरीर फटे से चीथड़े ! कपड़ों में वे झाँक रहें हैं नोंचने को मन पापी कर ! प्रबल शरीर वो बेच रही है जीने क…

वे आ रहे है ... - ध्रुव सिंह एकलव्य

वे आ रहे है "वे आ रहें हैं" सत्य को प्रतिष्ठित बनाने मार्ग पर तुमको चलाने चक्षुओं से, चुनके काँटें हृदय से अपने लगाने वे आ रहें हैं......... आसमां के पार से स्वयं फंसे, मझधार से इस धरा पर,धर्म रक्षक हमको बुलाने ! वे आ रहें …

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