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तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो - गोपालदास नीरज

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो, मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊँगा! सूनी है मांग निशा की चंदा उगा नहीं हर द्वार पड़ा खामोश सवेरा रूठ गया, है गगन विकल, आ गया सितारों का पतझर तम ऐसा है कि उजाले का दिल टूट गया,…

अंधियार ढल कर ही रहेगा - गोपालदास नीरज

अंधियार ढल कर ही रहेगा अंधियार ढल कर ही रहेगा आंधियां चाहें उठाओ, बिजलियां चाहें गिराओ, जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा। रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये, वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये, वह पसीने की हंसी है, वह शहीद…

सभ्यता कहाँ आ गई? कहाँ खड़ा है विश्व? - गोपालदास नीरज

सभ्यता कहाँ आ गई? कहाँ खड़ा है विश्व? सभ्यता कहाँ आ गई? कहाँ खड़ा है विश्व? जा रहा है किधर गति-रथ विज्ञान कलाओ का? किस दिशी उन्मुख इतिहास? दे रहा क्या विकास? क्या शोर समय का है? क्या ज़ोर हवाओ का? क्या यही सभ्यता का वह सुन्दर सुखद स्वर्ग? है पड़ा…

एक जुग बाद शबे-गम की सहर देखी है - गोपाल दास नीरज

एक जुग बाद शबे-गम की सहर देखी है एक जुग बाद शबे-गम की सहर देखी है देखने की न उम्मीद थी मगर देखी है जिसमे मजहब के हर एक रोग का लिखा है इलाज वो किताब हमने किसी रिंद के घर देखी है ख़ुदकुशी करती है आपस की सियासत कैसे हमने ये फिल्म नयी खूब इधर दे…

गर कलम न छीनी गई तो हिन्दुस्तान बदलकर छोडूँगा -गोपालदास नीरज

गर कलम न छीनी गई तो हिन्दुस्तान बदलकर छोडूँगा गर कलम न छीनी गई तो हिन्दुस्तान बदलकर छोडूँगा इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!! मै देख रहा हूँ भूख उग रही है गलियों बाजारों में, मै देख रहा हूँ ढूंढ रही बेकारी कफ़न मज़ारों में, मै देख …

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए - गोपाल दास नीरज

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए ! जिसकी खुशबू से महक जाये पडोसी का भी घर, फुल इस किस्म का हर सिम्त खिलाया जाए ! आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी, कोई बताए कहा जाके नहाया जाए !…

अब बुलाऊ भी तुम्हे तो तुम न आना ! - गोपालदास नीरज

अब बुलाऊ भी तुम्हे तो तुम न आना अब बुलाऊ भी तुम्हे तो तुम न आना ! टूट जाए शीघ्र जिससे आस मेरी छुट जाए शीघ्र जिससे साँस मेरी, इसलिए यदि तुम कभी आओ इधर तो, द्वार तक आकर हमारे लौट जाना ! अब बुलाऊ भी तुम्हे ...! देख लूँ मै भी की तुम कितने निष्ठ…

कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे - गोपालदास नीरज

कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे स्वप्न भरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बाबुल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे ॥ नींद भी खुली न थी कि हाय धुप ढल गई, पाँव जब तलक उठे कि जिन्दगी फिसल गई…

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