दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्…