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दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्…

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है करते हैं जिस पे ता'न कोई जुर्म तो नहीं शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ उल्फ़त-ए-नाकाम ही तो है दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है ऐ ज…

ख़्वाब का शायर फैज़ फ़ैज़ - मंगलेश डबराल

ख़्वाब का शायर फ़ैज़ - मंगलेश डबराल सन 1972 में फ़ैज़ को नई दिल्ली में एफ्रो एशियाई लेखक सम्मलेन में पहली बार देखा था, लेकिन ठीक से नही देखा था क्योकि तब हम लोग सम्मेलन का विरोध और बहिष्कार कर रहे थे | एफ्रो-एशियाई लेखक सम्मलेन का रिश्ता भारतीय कम्यु…

हम जो तारीक राहों में मारे गए - फैज़ अहमद फैज़

हम जो तारीक राहों में मारे गए तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हम दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम नीम-तारीक राहों में मारे गए सूलियों पर हमारे लबों से परे तेरे होंटों की लाली लपकती रही तेरी ज़ुल्फ़ों की मस्ती…

रक़ीब से! - फैज़ अहमद फैज़

रक़ीब से! आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन पर उस की मदहोश जवानी ने इनायत क…

तुम अपनी करनी कर गुज़रो - फैज़ अहमद फैज़

तुम अपनी करनी कर गुज़रो अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो जब दिल टुकड़े हो जाएगा और सारे ग़म मिट जाएँगे जो कुछ पाया खो जाएगा जो मिल न सका वो पाएँगे ये दिन तो वही पहला दिन है जो पहला दिन था चाहत का हम जिस की तमन्ना करते रहे और जिस से हर दम डरते …

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे - फैज़ अहमद फैज़

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम क…

बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है मता-ए-दर्द बहम है तो बेश-ओ-कम क्या है हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है करे न जग में अलाव तो शेर किस मक़सद करे …

ऐ रौशनियों के शहर - फैज़ अहमद फैज़

ऐ रौशनियों के शहर सब्ज़ा सब्ज़ा सूख रही है, फीकी ज़र्द दोपहर दीवारों को चाट रहा है, तन्हाई का ज़हर दूर उफ़क़ तक घटती बढ़ती, उठती गिरती रहती है कुहर की सूरत बे-रौनक़, दर्दों की गदल लहर बस्ता है इस कुहर के पीछे, रौशनियों का शहर ऐ रौशनियों …

आपकी याद आती रही रात भर - पुरूषोत्तम अब्बी "आज़र"

आपकी याद आती रही रात भर पुरुषोत्तम अब्बी आज़र साहब की यह ग़ज़ल मखदूम मोहिउद्दीन साहब की " आपकी याद आती रही " ग़ज़ल की बहर पर लिखी गई है इस बहर पर फैज़ ने भी मखदूम की याद में नाम से ग़ज़ल लिखी है आपकी याद आती रही रात भर नींद नखरे दिखाती रही रा…

मख़दूम की याद में - 2 - फैज़ अहमद फैज़

मख़दूम की याद में - 2 - फैज़ अहमद फैज़ याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब मखदूम की याद में पहली कड़ी याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब दिल में बिख़री कोई ख़ुशबू-ए-क़बा आख़िरे-शब सुब्‍ह फूटी तो वो पहलू से उठा आख़िरे-शब वो जो इक उम्र से आया…

हम देखेंगे – फैज़ अहमद फैज़

हम देखेंगे हम देखेंगे यह नज़्म फैज़ अहमद फैज़ की अन्य नज़्मो में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है और यह नज्म इक़बाल बानो ने अपने पुरे शबाब पर गाई है | हम देखेंगे लाजिम है के हम भी देखेंगे वो दिन के जिसका वादा है जो लौह-ए-अजल में लिक्खा है हम देखेंगे… …

परिचय - फैज़ अहमद फैज़

फैज़ अहमद फैज़ परिचय फैज़ अहमद फैज़ के बारे में क्या बताया जाये और क्या ना बताया जाए यह तय कर पाना काफी मुश्किल है | फिर भी यह शुरुवात की जाए | 13 फ़रवरी, 1911 को गाव काला कादर, सियालकोट (पंजाब, अब पाकिस्तान में) में जन्मे फैज़ को अदबी रुझान विरासत में…

आपकी याद आती रही रात भर - मखदूम, फैज़

आपकी याद आती रही रात भर गमन फिल्म जो कि सन 1978 में आई थी, इसका एक गीत सीने में जलन   शहरयार साहब का लिखा हुआ काफी मशहूर हुआ था और एक अन्य गीत “ आपकी याद आती रही रात भर ” मखदूम मोइउद्दीन का लिखा हुआ है वैसे यह गीत सुनकर फैज़ अहमद फैज़ साहब की ग़ज़ल …

मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न मांग - फैज़ अहमद फैज़

मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न मांग मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न मांग मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात तेरा ग़म है तो गम-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है …

कब याद मे तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं - फैज़

कब याद मे तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं कब याद मे तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं सद शुक्र की अपनी रातो में अब हिज्र की कोई रात नहीं मुश्किल है अगर हालात वह, दिल बेच आए, जा दे आए दिल वालो कुंचा-ए-जाना में, क्या ऐसे भी हालात नह…

हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाकी - फैज़ अहमद फैज़

हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाकी - फैज़ अहमद फैज़ हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाकी ज़ब्त का हौसला नहीं बाकी इक तेरी दीद छीन गई मुझसे वरना दुनिया में क्या नहीं बाकी अपनी मश्के-सितम से हाथ न खीच मै नहीं या वफ़ा नहीं बाकी तेरी चश्मे-अलम-नवाज की खैर दिल में…

फिर हरीफ-ए-बहार हो बैठे - फैज़ अहमद फैज़

फिर हरीफ-ए-बहार हो बैठे फिर हरीफ़-ए-बहार हो बैठे जाने किस किस को आज रो बैठे थी मगर इतनी राएगाँ भी न थी आज कुछ ज़िंदगी से खो बैठे तेरे दर तक पहुँच के लौट आए इश्क़ की आबरू डुबो बैठे सारी दुनिया से दूर हो जाए जो ज़रा तेरे पास हो बैठे न गई …

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