ख़्वाब का शायर फैज़ - मंगलेश डबराल | जखीरा, साहित्य संग्रह

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ख़्वाब का शायर फैज़ - मंगलेश डबराल

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सन 1972 में फैज़ को नई दिल्ली में एफ्रो एशियाई लेखक सम्मलेन में पहली बार देखा था, लेकिन ठीक से नही देखा था क्योकि तब हम लोग सम्मलेन का विरोध...

ख़्वाब का शायर फैज़ - मंगलेश डबराल
सन 1972 में फैज़ को नई दिल्ली में एफ्रो एशियाई लेखक सम्मलेन में पहली बार देखा था, लेकिन ठीक से नही देखा था क्योकि तब हम लोग सम्मलेन का विरोध और बहिष्कार कर रहे थे | एफ्रो-एशियाई लेखक सम्मलेन का रिश्ता भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी और उसके प्रगतिशील लेखक संघ से था और हमारी निगाह में ये तीनो संशोधनवादी संघठन थे | | इस सम्मलेन में शमशेर बहादुर सिंह भी मौजूद थे और कुछ समय बाद उन्होंने हम कुछ दोस्तों से कहा था, 'मुझे आप लोगों का कदम बहुत अच्छा लगा था |' लेकिन उसके बाद मैं इंतजार करता रहा कि किसी पत्रिका में आपमें से कोई कवि लिखकर बताएगा कि वास्तविक एफ्रो एशियाई लेखन क्या है लेकिन इतने दिन बाद भी मुझे कोई ऐसा लेख दिखाई नहीं दिया |'

इस सम्मेलन के बारे में इतना याद है कि फेज अपने बहुत सकुचाते हुए और 'लो प्रोफाइल' अंदाज के बावजूद सबसे अहम भूमिका में थे | उनके व्यक्तित्व में कोई शायराना तत्व नजर नहीं आता था | वह बेरुत में रहते थे और एफ्रो एशियाई लेखको की नायाब पत्रिका 'लोटस' का संपादन करते थे जिसमें छपना हिंदी उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का प्रिय सपना हुआ करता था |

फैज़ को दूसरी और आखिरी बार इलाहाबाद में देखा और शायरी पढ़ते हुए सुना इलाहाबाद में कई वर्षों बाद फैज़ और फिराक गोरखपुरी की ऐतिहासिक मुलाकात देखने को मिली | मुलाकात के दौरान फ़िराक अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को घुमाते हुए खूब चहक रहे थे, लेकिन फैज़ को देखकर लगता था कि वे खासे अंतर्मुखी है और अपने बारे में ज्यादा कुछ नहीं बोल रहे हैं | कुछ तरक्की पसंद लेखकों की पहल पर उनके कुछ कविता पाठ भी हुए | एक जगह फैज़ ने अपनी एक मशहूर गजल सुनाई थी
'हम परवरिशे-लोहे-कलम करते रहेंगे
जो दिल पे गुजरती है रक़म करते रहेंगे |


फैज़ के पढ़ने का तरीका कतई आकर्षक नहीं था, वे जैसे किसी रस्म-अदायगी की तरह और खासे निरासक्त तरीके से शायरी पढ़ते थे लेकिन यह शेर इतना पूरअसर था कि वह मुझे तुरंत याद हो गया और अब भी मैं उसे अक्सर अपने अंदर दोहरा लेता हूँ | फैज़ के पढ़ने में यह भावहीनता शायद इसलिए थी कि उनकी शायरी इतनी सहज-सरल और अर्थगर्भित थी कि अपने आप श्रोता तक पहुंच जाती थी उसे ले जाने के लिए आवाज का अभिनय जरूरी नहीं था |

हमारी पीढ़ी जिस तहजीबी साजो-सामा के साथ बड़ी हुई उसमें बहुत सी दूसरी चीजों के अलावा फैज़ की शायरी भी थी | तब तक फेज भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया के शायर, उसकी काव्यात्मक आवाज बन चुके थे | फैज़ के साथ-साथ फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की शायरी भी एशिया में परिवर्तनकारी प्रतिध्वनि के रूप में सुनाई दे रही थी लेकिन दरवेश अपेक्षाकृत नए थे जबकि फैज़ तब तक कुछ कम्युनिस्ट होने के नाते और कुछ पाकिस्तान के फौजी तानाशाहों की मेहरबानी से बहुत कुछ भुगत चुके थे | शायरी और जिंदगी दोनों स्तरों पर वे तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत के समकालीन थे - उन्हीं की तरह क़ैद, दरबदर, पलायन और जिलावतनी भुगते हुए और उन्हीं की तरह आगे आने वाले वक्त और लोगों की तरफ उम्मीद से भरपूर | एक और बात थी नाजिम और फैज़ दोनों की शायरी में उदासी का एक तार, एक धीमा सा संगीत बजता हुआ सुनाई देता था - एकरस और मुसलसल | वह शायरी की पृष्ठभूमि में रहता था और उसके आशावान कथ्य को दबाता या उस पर हावी नहीं होता था, बल्कि उसे एक और आयाम दे देता था

दिल्ली में कथाकार असगर वजाहत का पहली बार फैज़ की शायरी सुनने को मिली | उन्हें फैज़ की लगभग सारी कविता याद थी और फैज़ की नज्में, खासकर 'रकीब से' और 'तेरे होठो की चाहत में' उन्हें बहुत प्रिय थी, जिन्हें वे चलते-चलते भी अनायास बुदबुदाने लगते जैसे खुद को सुना रहे हो
तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हम
दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए
तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम
नीम-तारीक राहों में मारे गए

सूलियों पर हमारे लबों से परे
तेरे होंटों की लाली लपकती रही
तेरी ज़ुल्फ़ों की मस्ती बरसती रही
तेरे हाथों की चाँदी दमकती रही

जब घुली तेरी राहों में शाम-ए-सितम
हम चले आए लाए जहाँ तक क़दम
लब पे हर्फ़-ए-ग़ज़ल दिल में क़िंदील-ए-ग़म
अपना ग़म था गवाही तिरे हुस्न की
देख क़ाएम रहे इस गवाही पे हम
हम जो तारीक राहों पे मारे गए


इस नज़्म में कोई जादुई चीज थी वह सीधे दिल जैसी जगह पर असर करती थी लेकिन यह वही नहीं रह जाती थी, बल्कि दिमाग में चली जाती थी | शायद इसीलिए यह किसी एक चीज नहीं बल्कि एक साथ बहुत सी चीजों को, जिंदगी के कई आयामों को संबोधित थी | वह प्रेम कविता लगती थी लेकिन उसी समय अपने वतन के लिए भी लिखी हुई लगती थी और अपने वक्त के लिए भी, किसी स्वप्न के लिए भी और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी | फूलों की चाहत में काठ की सूली पर चढ़ने तक का एक लंबा सफर जैसे इस नज़्म में 'कंडेंस्ड' करके रख दिया गया हो, जैसे मनुष्य के प्रेम से लेकर उसके भविष्य तक के सारे आयाम स्गुफित कर दिये गए हो | इसी तरह रकीब से शीर्षक नज़्म भी थी | यह एक विलक्षण कविता है और शायद ऐसी कविताएं दुनिया की तमाम जबानों में उंगलियों पर गिने जाने लायक ही होगी | इसकी अंतर्वस्तु का प्रारूप ही अजब है | वह ऊपरी तौर पर एक भूतपूर्व प्रेमी का आत्मकथन है जो किसी वर्तमान प्रेमी को संबोधित है - उदासी और मोहभंग की धुंध में लिपटे हुए एक इंसान का बयान जिसमें वह मौजूदा प्रेमी को अपना हाल बताने के लिए आमंत्रित करता है -
'आ के वाबस्ता है उस हुस्न की यादें तुझसे
जिसने इस दिल को परी खाना बना रक्खा था
जिसकी उल्फ़त में बुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफसाना बना रखा था
तूने देखी है वह पेशानी, वो रुखसार वो होठ
जिनके तसव्वुर में लुटा दी हमने
तुझपे उट्ठी है वह खोयी हुई साहिर आँखे
तुझको मालूम है क्यों उम्र गवा दी हमने


यह नज्में बेहद नाजुक उदास शमशेर के शब्दों में काफी दर्द को हमारे सामने रखती है बल्कि अपने अद्भुत चित्रमयता के साथ उसे दिखाती है, उसकी एकालाप की लय चिंतनपरक मन स्थिति को और भी शिद्दत दे देती है और अपनी एक गहरी गूंज हमारे भीतर छोड़ जाती है | आश्चर्य नहीं कि यह लय और मनोदशा शमशेर की ही एक मशहूर कविता 'टूटी हुई-बिखरी हुई' के संगीत से कुछ मिलती-जुलती है,
'हाँ, मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियां लहरों से करती है
जिनमें वे फसने नहीं आती
जिनको ये गहराई तक दबा नहीं पाती
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूं |
'

नज़्म के आखिरी हिस्सों में फैज़ प्रेम के उस अनुभव का कायांतरण कर देते हैं और उस खोये हुए और टूटे हुए अनुभव के हासिल को बयान करते हैं
'आजिजी सीखी गरीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिरमान के, दुःख-ओ-दर्द के मानी सीखा
जैरदस्तो के मुसाइब को समझना सीखा
सर्द आहो के, रूखे ज़र्द के मानी सीखे
'

इस तरह प्रेम का यह हासिल किसी निजी दुःख में न बदलकर एक विस्तार पा लेता है और व्यापक मनुष्यता के दुख को समझने के विवेक में बदल जाता है | यह फैज़ की सबसे बड़ी खूबी है कि वे व्यक्तिगत को सामाजिक अनुभव तक पंहुचा देते है और उर्दू शायरी के अति परिचित और लगभग तैयारशुदा इश्क़ को एक उदात्तता तक ले जाते है |

और यह रक़ीब कौन है जिसे कवि इतनी कशिश के साथ अपनी दास्तान सुना रहा है? वह उससे नफरत नहीं करता, रश्क नहीं करता, बल्कि प्रेम ही करता है | क्या रक़ीब की इस कल्पना में एक नयी पीढ़ी की व्यंजना है जिसे फैज़ संबोधित करते हुए एक स्वप्न को अंजाम तक नहीं ले जा सके, वह अब तुम्हारे हवाले है | इससे मिलता-जुलता एक अनुभव जर्मनी के महान कवि और नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता 'अगली पीढ़ी से' में मिलता है,
तुम जो कि इस बाढ़ से उबरोगे
जिससे हम डूब गए
जब हमारी कमजोरियों की बात करो
तो उस अँधेरे के बारे में भी सोचना
जिससे तुम बचे रहे
जूता से ज्यादा देश बदलते हुए
हम बैचेनी के साथ वर्ग संघर्षो से गुजरते रहे
जब सिर्फ अन्याय था और प्रतिरोध कहीं नहीं था |
'

उर्दू शायरी अपनी ज़बान से जानी जाती है यानी कहीं गयी बात से अहम बात यह है कि उसे किस तरह कहा गया है | बड़े शायर अपनी ज़बान की ऊचाई के लिए भी जाने जाते है | मीर, सौदा, ग़ालिब, मोमिन और इकबाल का अंदाज़े-बयां बहुत अलग-अलग है और ये सभी ज़बान के लिहाज़ से भी महान है | ज़बान की अहमियत इस कदर है कि बहुत से शायर ज़बान की उस्तादाना हिकमत के कारण भी बड़े मान लिये गये और कई बड़े शायर ऐसे भी थे जो ज़बान की तराश के लिये उन उस्तादों से सलाह लेते थे जो शायर के तोर पर अहमं नहीं थे | फैज़ ने कोई नयी ज़बान इजाद नहीं की बल्कि वे उपलब्ध भाषा और बिबो से, यहाँ तक कि शायरी के घिसे-पिटे सिक्को से काम चलाते रहे | शामे-गम, गमे-उल्फत, शामे-सितम, शमा और परवाने, रक्से-मय, रुखसार, पेशानी, हिज्र और वस्ल, मैखाना, कारवा, कफस और परवाज़ जैसे अल्फाज़ उसकी शायरी में बहुतायत से है, लेकिन फैज़ का कारनामा यह है कि उन्होंने इन पुराने शब्दों, बिबो और प्रतीकों को एकदम नयी व्यंजनाओ से भर दिया और उनमे अर्थो के कई स्तर और विस्तार पैदा कर दिये | इससे ज़बान में बौद्धिकता भले न पैदा हुई हो, लेकिन एक बेजोड़ पारदर्शिता तामीर हुई जिसमे कोई धुंध नहीं थी, कोई गुबार नहीं था | उर्दू की व्यक्तिपरक उस्तादी के बरक्स यह शायरी की ज़बान को लोकतांत्रिक बनाने का काम था | शायद इसी से फैज़ की शायरी में एक अद्भुत दृश्यात्मकता और चित्रमयता आयी | मसलन
'जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक-महक उठी
जब तेरा गम जागा लिया, रात मचल-मचल गयी

या
दर्द का चाँद बुझ गया, हिज्र की रात ढल गयी

जैसी इन पंक्तियों में हम दर्द के चाँद को बुझते हुए और वियोग की रात को ढलते हुए 'देख' सकते है लेकिन यह सिर्फ दृश्यात्मकता नहीं है, सिर्फ बिब नहीं है, बल्कि ये पंक्तियाँ सहसा फ़्रांस के उत्तर सरचनावादी दार्शनिक जाक देरिदा कि एक उक्ति की याद दिलाती है कि 'शब्द सिर्फ अर्थ नहीं होते, बल्कि वे वही वस्तु होते है जिसे वे अभिव्यक्त करते है |' उर्दू में शायद अकेले फैज़ ही है जो शायरी की शमा को तैयारशुदा मैखानो और महफिलो से बाहर एक बड़े समाज के बीच ले गये और उसे उन्होंने एक नयी रौशनी से भर दिया | फैज़ का मैखाना भी मजलूमो, महरूमो और खाक़नशीनो का समाज है
रक्से-मय तेज करो, साज की लय तेज करो
सूए-मयखाना सफिराने हरम आते है |


इसमें कोई शक नहीं कि फैज़ एक बहुत लंबे समय तक एशिया महाद्वीप की सबसे लोकप्रिय शायराना शख्सियत बने रहे | पकिस्तान के फौजी तानाशाहों को अपने अदीबा और उनकी आवाज़ से बहुत डर लगता रहा है और वहा के अदीबो ने भी अपनी प्रतिबद्धता पर, आवाम के प्रति अपनी जिम्मेदारी पर कायम रहते हुए ऐसे जोखिम उठाये है और ऐसी तकलीफे सही है जो हिन्दी के लेखकों-कवियों को नहीं सहनी पड़ी | पाकिस्तान के अदीब और शायर अपने प्रतिरोध और आज़ादख्याली के लिये भी दुनिया में जाने गये | फैज़ के इर्द-गिर्द भी ऐसी ही कई घटनाए है जिनमे एक यह है कि किस तरह जब मशहूर गायिका इकबाल बानो ने हजारों श्रोताओ के सामने करीब दो घंटे तक फैज़ को गया तो एक बड़ी हलचल और थरथराहट फ़ैल गयी | उनके केसेट को सुननेवाले जानते है कि जब इकबाल बानो ने फैज़ की वह मशहूर नज़्म 'लाज़िम है कि हम भी देखेंगे' को गाना शुरू किया तो श्रोता भी पुरे आवेग के साथ गाने लगे और इसके बाद फौजी शासक जियाउल हक़ ने फैज़ और इकबाल बानो पर पाबन्दी लगा दी | भारत और पकिस्तान में ऐसा कोई ग़ज़ल गायक नहीं है जिसने फैज़ की रचनाए न गायी हो और नैयारा नूर जैसी गायिका ने तो फैज़ को इस तरह धीमे गायन के साथ पढ़ा है कि वह एक यादगार अदायगी बन गयी है |

फैज़ हिन्दुस्तान और पकिस्तान के आवाम के सबसे ज्यादा काम आने वाले शायरों में से रहे है | उनकी शायरी बहुत अधिक इस्तेमाल में आयी है | बर्तोल्त ब्रेख्त ने अपनी एक कविता में कहा था कि, 'मै अपनी कब्र पर कोई समाधि लेख नहीं चाहता हूँ लेकिन अगर कुछ लिखना ही हो तो यह लिखा जाए कि उसने सुझाव दिये और हमने उनका इस्तेमाल किया |' फैज़ पर यही बात लागू होती है | कवि की इस भूमिका के बारे में खुद फैज़ ने ही लिखा था, 'हमने जो तर्जे-फुगा की थी कफस में ईजाद, फैज़ गुलशन में वही तर्जे-बयां ठहरी है |'

फैज़ ने दुख की जो भाषा ईजाद की, वह एक बड़े समाज की अभिव्यक्ति में बदल गयी | यही एक बड़े कवि का काम होता है कि वह अपने दर्द और अपने ख़्वाब को सबका दर्द और ख़्वाब बना देता है | कभी-कभी लगता है कि अगर लोगो में अब भी एक नयी सहर का इंसानी ज़ज्बा बचा हुआ है तो यह बहुत कुछ इस वजह से भी है कि फैज़ को बहुत पढ़ा गया है, बहुत गाया गया है और बहुत इस्तेमाल किया गया है |

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जखीरा, साहित्य संग्रह: ख़्वाब का शायर फैज़ - मंगलेश डबराल
ख़्वाब का शायर फैज़ - मंगलेश डबराल
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