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अर्धनारीश्वर - रामधारी सिंह दिनकर

अर्धनारीश्वर - रामधारी सिंह दिनकर एक हाथ में डमरू, एक में वीणा मधुर उदार एक नयन में गरल, एक में संजीवन की धार। जटाजूट में लहर पुण्य की शीतलता-सुख-कारी, बालचंद्र दीपित त्रिपुंड पर बलिहारी! बलिहारी! प्रत्याशा में निखिल विश्व है, ध्यान देवता! त्य…

मिर्च का मज़ा - रामधारी सिंह दिनकर

मिर्च का मज़ा एक काबुली वाले की कहते हैं लोग कहानी, लाल मिर्च को देख गया भर उसके मुँह में पानी। सोचा, क्या अच्छे दाने हैं, खाने से बल होगा, यह जरूर इस मौसम का कोई मीठा फल होगा। एक चवन्नी फेंक और झोली अपनी फैलाकर, कुंजड़िन से बोला बेचारा ज्यो…

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है - रामधारी सिंह दिनकर

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही, जाड़े-पाले की कसक सदा सहने …

आशा का दीपक - रामधारी सिंह दिनकर

आशा का दीपक वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है; थक कर बैठ गये क्या भाई! मन्जिल दूर नहीं है। चिन्गारी बन गयी लहू की, बून्द गिरी जो पग से; चमक रहे, पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से। बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है; थक कर बैठ गय…

सच है, विपत्ति जब आती है (वीर) - रामधारी सिंह दिनकर

सच है, विपत्ति जब आती है सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब स…

दिल्ली - रामधारी सिंह दिनकर

दिल्ली - रामधारी सिंह दिनकर यह कैसी चाँदनी अमा के मलिन तमिस्र गगन में! कूक रही क्यों नियति व्यंग्य से इस गोधूलि-लगन में? मरघट में तू साज रही दिल्ली! कैसे शृंगार? यह बहार का स्वांग अरी, इस उजड़े हुए चमन में! इस उजाड़, निर्जन खँडहर में, छिन्न-भि…

चाँद का कुर्ता - रामधारी सिंह दिनकर

चाँद का कुर्ता हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, "सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला। सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ, ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ। आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का, न हो अगर तो ला द…

हे मेरे स्वदेश - रामधारी सिंह दिनकर

हे मेरे स्वदेश छिप जाऊँ कहाँ तुम्हें लेकर? इस विष का क्या उपचार करूँ? प्यारे स्वदेश! खाली आऊँ? या हाथों में तलवार धरूँ? पर, हाय, गीत के खड्ग! धार उनकी भी आज नहीं चलती, जानती जहर का जो उतार, मुझ में वह शिखा नहीं जलती। विश्वास काँपता है रह-…

दिनकर की कविताओं में उनका जीवन संघर्ष - जियाउर रहमान जाफरी

दिनकर की कविताओं में उनका जीवन संघर्ष - डॉ. जियाउर रहमान जाफरी हिंदी में छायावाद के पतन के बाद जिस स्वच्छंदतावाद की नींव पड़ी दिनकर उसके सबसे बड़े कवि थे | दिनकर का गद्य और पद्य दोनों में समान अधिकार था | उनका अपना शब्द भंडार और कविता की अपनी शैली …

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