chandrakant-devtale

एकदम अपने बुख़ार में - चंद्रकांत देवताले

एकदम अपने बुख़ार में जब इंदौर में होता हूँ शुभचिंतक बता देते हैं कि उज्जैन गया हूँ और उज्जैन में होने पर वहाँ के मेरे दुश्मन पता देते हैं इंदौर का इस तरह मैं कइयों के वास्ते कहीं नहीं होता और कभी-कभी मैं भी जहाँ होता हूँ नहीं होता कुछ लोग वे …

नींबू माँगकर - चंद्रकांत देवताले

नींबू माँगकर - चंद्रकांत देवताले बेहद कोफ्त होती है इन दिनों इस कॉलोनी में रहते हुए जहाँ हर कोई एक-दूसरे को जासूस कुत्ते की तरह सूँघता है अपने-अपने घरों में बैठे लोग वहीं से कभी-कभार टेलीफोन के जरिए अड़ोस-पड़ोस की तलाशी लेते रहते हैं पर चेहरे…

स्त्री के साथ - चंद्रकांत देवताले

स्त्री के साथ मैं आकाश में इतने ऊपर कभी नहीं उड़ा कि स्त्री दिखाई ही न दे इसलिए मैं उन लोगों के बारे में कुछ नहीं जानता कि वे किस तरह सोचते हैं जो ईश्वर के साथ रहते हैं वैसे मेरी आत्मा आकाश में बहुत ऊँचे तक उड़ी है पर डोर हमेशा किसी स्त्री के…

अपने को देखना चाहता हूँ - चंद्रकांत देवताले

अपने को देखना चाहता हूँ मैं अपने को खाते हुए देखना चाहता हूँ किस जानवर या परिंदे की तरह खाता हूँ मैं मिट्ठू जैसी हरी मिर्च कुतरता है या बंदर गड़ाता है भुट्टे पर दाँत या साँड़ जैसे मुँह मारता है छबड़े पर मैं अपने को सोए हुए देखना चाहता हूँ माँ…

करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें - चंद्रकांत देवताले

करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें औद्योगिक मेले के बाद अब यह पुस्तकों का मेला लगा है अपने महानगर में और भीड़ टूटेगी ही किताबों पर जबकि रो रहे हैं बरसों से हम कि नहीं रहे किताबों को चाहने वाले कि नहीं बची अब सम्मानित जगह दिवंगत आत्माओं के लि…

Load More
That is All
preload preload preload preload preload