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मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ - मोहम्मद मुमताज़ हसन

मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ थोड़ी- बहुत ख़ुद में जान देखता हूँ लड़ाई वजूद की वजूद पे है आई, ख़ुदा का भी ये इम्तिहान देखता हूँ उजड़ गया आपस के झगड़े में घर, गली कूचे नया अब मकान देखता हूँ तल्ख़ लहजे ने तोड़ी थी र…

आँखों में अश्कों के समंदर रो रहे हैं! - मोहम्मद मुमताज़ हसन

आँखों में अश्कों के समंदर रो रहे हैं! आँखों में अश्कों के समंदर रो रहे हैं! ग़म मुहब्बत के कई मेरे अंदर रो रहे हैं! मिट गया झगड़े में नामोनिशान घर का, बैठ कर दहलीज़ पर खंडहर रो रहे हैं! हवस में तरक़्क़ी की गांव का मिट गया वजूद, कंक्रीट की बस्ती म…

हादसों के ज़द में क्या मुस्कुराना छोड़ दें - मोहम्मद मुमताज़ हसन

हादसों के ज़द में क्या मुस्कुराना छोड़ दें हादसों के ज़द में क्या मुस्कुराना छोड़ दें ज़ख्म खामोश हैं मरहम लगाना छोड़ दें हवा के ख़ौफ़ में है दरख़्तों का वजूद, कह दो परिंदों से आशियां बनाना छोड़ दें वक़्त के मझदार में रिश्तों की बुलन्दी है, किसी क…

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