मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ - मोहम्मद मुमताज़ हसन
मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ थोड़ी- बहुत ख़ुद में जान देखता हूँ लड़ाई वजूद की वजूद पे है आई, ख़ुदा का भी ये इम्तिहान देखता हूँ उजड़ गया आपस के झगड़े में घर, गली कूचे नया अब मकान देखता हूँ तल्ख़ लहजे ने तोड़ी थी र…