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हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है - रामकुमार कृषक

हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है आजकल अपना यही चीज़ों से नाता है पेट काटा, हो गई खासी बचत घर में है कहाँ चेहरा, मुखौटा मुस्कुराता है नाम इसका और उसके दस्तख़त हम पर चेक बियरर है जिसे मिलते भुनाता है है ख़र…

हे राम - रामकुमार कृषक

हे राम तुम्हारे नाम की हो रही है लूट हे राम ! तुम्हारे नाम को जप रहा है झूठ हे राम ! तुम्हारे नाम से भर रहे हैं पेट हे राम ! तुम्हारे नाम पर ठग रहे हैं सेठ हे राम ! तुम्हारे नाम पर सजे हुए हैं बाज़ार हे राम ! तुम्हारे नाम पर जम गया है ब्…

जीवन सिंह और हिन्दी ग़ज़ल किताब 'दसख़त' समीक्षा

जीवन सिंह और हिन्दी ग़ज़ल किताब 'दसख़त' समीक्षा ये वक्त हिन्दी ग़ज़ल के लिये इस अर्थ में बेहतर है कि आज हिन्दी ग़ज़ल आलोचना के केन्द्र में भी हैं | ग़ज़ल पर आलोचना की जितनी किताबें आ रही हैं और इसे पढी जा रही है | ये इस बात का प्रमाण है कि …

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